बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 16:30

बाइबल
यह वचन CSI COIMBATORE DIOCESE द्वारा समर्पित है

पाठ

दरोगा, जो कुछ ही क्षण पहले तलवार खींचकर अपनी जान लेने को तैयार था, अब काँपता हुआ दीया माँगता है, भीतर आता है और उन्हीं दो कैदियों के पाँवों पर गिर पड़ता है जिनके पाँव उसी ने काठ में ठोंके थे। फिर वह उन्हें कोठरी से बाहर लाकर पूछता है, "हे सज्जनों, उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?" एक ही वाक्य में पूरी स्थिति उलट जाती है: जेल का अधिकारी याचक बन गया है, और बन्दी उसके लिए मार्गदर्शक। प्रश्न किसी धार्मिक जिज्ञासा से नहीं उठता, बल्कि उस रात की दहशत से, जब भूकम्प ने नींव हिला दी और मृत्यु उसके अपने हाथ में थी।

मूल बात

यह प्रश्न प्रेरितों के काम में दूसरी बार गूँजता है। पिन्तेकुस्त के दिन, पतरस के उपदेश के बाद, भीड़ ने ठीक यही पूछा था कि अब हम क्या करें, और वहाँ भी उत्तर मनुष्य के किए हुए किसी काम की ओर नहीं, बल्कि परमेश्वर के किए हुए काम की ओर मुड़ गया। यहाँ भी वैसा ही होता है: दरोगा पूछता है "मैं क्या करूँ", और पौलुस उसे कोई काम नहीं, एक व्यक्ति देता है। यही सुसमाचार की चुभन है। धर्म सदा एक सूची थमाता है; अनुग्रह एक नाम थमाता है। ध्यान दीजिए, दासी ने भी चिल्लाकर कहा था कि ये लोग "उद्धार के मार्ग" की कथा सुनाते हैं, पर वह शब्द तब तक खोखला था। अब वही शब्द एक टूटे हुए आदमी के मुँह में जीवित हो उठता है, क्योंकि अब उसके पीछे असली आवश्यकता खड़ी है।

सूत्र

"मैं क्या करूँ" इस सवाल की एक लम्बी परछाईं है। सुसमाचारों में एक धनी युवक दौड़कर यीशु के पास आता है और लगभग यही पूछता है: अनन्त जीवन पाने के लिए मैं क्या करूँ। वहाँ यीशु उसे एक सूची देते हैं, और सूची उसे तोड़ देती है, क्योंकि वह वही एक चीज़ नहीं छोड़ सकता जिससे उसकी सुरक्षा बँधी है। यहाँ फिलिप्पी की कोठरी में उल्टा होता है: जिस आदमी की सारी सुरक्षा आधी रात में ढह चुकी है, उसे कोई सूची नहीं दी जाती। उसके पास खोने को कुछ बचा ही नहीं। क्रूस के इस ओर खड़े होकर पौलुस वह दे सकता है जो युवक को नहीं मिला था, क्योंकि अब "करना" किसी और ने पूरा कर दिया है। धनी युवक उदास होकर लौट गया; दरोगा उसी रात भोजन परोसकर आनन्द करता है।

दर्पण

आपके भीतर भी एक सूची चलती रहती है। सुबह की प्रार्थना छूट गई तो दिनभर एक हल्का अपराधबोध; बच्चों पर चिल्लाने के बाद वह चुपचाप हिसाब कि अब कितना अच्छा बनकर इसकी भरपाई करनी है; दफ़्तर में वह बेचैनी कि अगर प्रदर्शन गिरा तो मैं कौन रह जाऊँगा। हम सब दरोगा हैं, जिसकी पूरी पहचान इस पर टिकी थी कि कैदी भीतर रहें। जिस रात दरवाज़े खुल गए, उसकी तलवार तुरन्त बाहर आ गई, क्योंकि जिस आदमी की कीमत उसके काम से नापी जाती है, उसके लिए असफलता और मृत्यु में फ़ासला बहुत कम होता है। इस पद की करुणा यह है कि परमेश्वर उस टूटे हुए सवाल को ठुकराते नहीं, पर उसका उत्तर सूची में नहीं देते।

आज, अकेले में, ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से वह एक डर कहिए जिसे आप सबसे ज़्यादा छिपाते हैं, और फिर उसी स्वर में पद 31 के शब्द अपने नाम के साथ दोहराइए: "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर।" दस मिनट में हो जाएगा।

प्रश्न

क्या भूकम्प के बाद का विश्वास सचमुच विश्वास है? यह आदमी काँप रहा है, वह अभी-अभी आत्महत्या से बचा है, और इसी हालत में वह घुटने टेकता है। आज हम ऐसे निर्णय पर शक करते हैं और उसे सदमे की प्रतिक्रिया कहते हैं। लूका इस असुविधा को मिटाता नहीं; वह साफ़ लिखता है कि दरोगा काँपता हुआ गिरा। परमेश्वर ने यहाँ दबाव का इस्तेमाल किया, और यह बात हमें खटकती है। पर सवाल उल्टा भी पूछा जा सकता है: क्या हमारी शान्त, सुविधाजनक धार्मिकता इसलिए गहरी है, या सिर्फ़ इसलिए कि हमारी नींव अभी हिली नहीं? मैं इसे सुलझाकर नहीं रख सकता। इतना ही कह सकता हूँ कि सच्चाई की परख अगली सुबह हुई: घाव धोए गए, भोजन परोसा गया, घराना बपतिस्मा ले चुका था।

संदर्भ

फिलिप्पी "रोमियों की बस्ती" थी, यानी सेवानिवृत्त सैनिकों का उपनिवेश, जहाँ रोमी होना गर्व की सबसे बड़ी पूँजी थी। दरोगा लगभग निश्चित रूप से पूर्व सैनिक था, और रोमी व्यवस्था में कैदी भाग जाए तो रखवाले को वही दण्ड भुगतना पड़ता था जो कैदी को मिलता। इसलिए उसकी तलवार नाटक नहीं, व्यवस्था का तर्क थी: अपमानजनक फाँसी से बेहतर सम्मानजनक आत्महत्या। उसी नगर में कुछ घंटे पहले पौलुस और सीलास को बिना मुकदमे के सार्वजनिक रूप से बेंत मारे गए थे, क्योंकि भीड़ ने उन्हें "यहूदी" कहकर बाहरी ठहरा दिया था। सत्ता, नागरिकता और इज़्ज़त का यह पूरा ढाँचा आधी रात को एक कोठरी के भीतर उलट जाता है।

विवरण

वह उन्हें "हे सज्जनों" कहकर पुकारता है। यूनानी में यह शब्द है κύριοι (कुरिओइ), जिसका अर्थ है "स्वामी", "प्रभु"। जिस आदमी के हाथ में चाबियाँ थीं, जिसने इनके पाँव काठ में ठोंके थे, वह अब अपने कैदियों को स्वामी कहकर सम्बोधित करता है। और ठीक अगले वाक्य में पौलुस उस शब्द को आगे बढ़ा देता है, उसी शब्द के असली मालिक तक: "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर।" दरोगा ने अनजाने में सही पता पूछ लिया, बस दरवाज़ा एक घर आगे था। यह पूरा दृश्य इसी एक शब्द की फिसलन पर टिका है: मनुष्य जिन्हें स्वामी समझता है, वे उसे असली स्वामी की ओर मोड़ देते हैं।

चिंतन

आपकी अपनी "क्या करूँ" की सूची में इस समय सबसे ऊपर क्या लिखा है, और उसे किसी नाम से बदलने में क्या चीज़ रोक रही है?

आपके जीवन में वह कौन है जिस पर आपका अधिकार है, जैसे दरोगा का कैदियों पर था, और उसके सामने घुटने टेकना आपको सबसे कठिन लगेगा?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

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Acts

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Acts 16:30 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 16:30 का क्या अर्थ है?
दरोगा, जो कुछ ही क्षण पहले तलवार खींचकर अपनी जान लेने को तैयार था, अब काँपता हुआ दीया माँगता है, भीतर आता है और उन्हीं दो कैदियों के पाँवों पर गिर पड़ता है जिनके पाँव उसी ने काठ में ठोंके थे। फिर वह उन्हें कोठरी से बाहर लाकर पूछता है, "हे सज्जनों, उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?
प्रेरितों के काम 16:30 किस विषय में है?
"मैं क्या करूँ" इस सवाल की एक लम्बी परछाईं है। सुसमाचारों में एक धनी युवक दौड़कर यीशु के पास आता है और लगभग यही पूछता है: अनन्त जीवन पाने के लिए मैं क्या करूँ। वहाँ यीशु उसे एक सूची देते हैं, और सूची उसे तोड़ देती है, क्योंकि वह वही एक चीज़ नहीं छोड़ सकता जिससे उसकी सुरक्षा बँधी है। यहाँ फिलिप्पी की कोठरी में उल्टा होता है: जिस आदमी की सारी सुरक्षा आधी रात में ढह चुकी है, उसे कोई सूची नहीं दी जाती। उसके पास खोने को कुछ बचा ही नहीं। क्रूस के इस ओर खड़े होकर पौलुस वह दे सकता है जो युवक को नहीं मिला था, क्योंकि अब "करना" किसी और ने पूरा कर दिया है। धनी युवक उदास होकर लौट गया; दरोगा उसी रात भोजन परोसकर आनन्द करता है।
प्रेरितों के काम 16:30 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज, अकेले में, ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से वह एक डर कहिए जिसे आप सबसे ज़्यादा छिपाते हैं, और फिर उसी स्वर में पद 31 के शब्द अपने नाम के साथ दोहराइए: "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर।" दस मिनट में हो जाएगा।
प्रेरितों के काम 16:30 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पी "रोमियों की बस्ती" थी, यानी सेवानिवृत्त सैनिकों का उपनिवेश, जहाँ रोमी होना गर्व की सबसे बड़ी पूँजी थी। दरोगा लगभग निश्चित रूप से पूर्व सैनिक था, और रोमी व्यवस्था में कैदी भाग जाए तो रखवाले को वही दण्ड भुगतना पड़ता था जो कैदी को मिलता। इसलिए उसकी तलवार नाटक नहीं, व्यवस्था का तर्क थी: अपमानजनक फाँसी से बेहतर सम्मानजनक आत्महत्या। उसी नगर में कुछ घंटे पहले पौलुस और सीलास को बिना मुकदमे के सार्वजनिक रूप से बेंत मारे गए थे, क्योंकि भीड़ ने उन्हें "यहूदी" कहकर बाहरी ठहरा दिया था। सत्ता, नागरिकता और इज़्ज़त का यह पूरा ढाँचा आधी रात को एक कोठरी के भीतर उलट जाता है।
प्रेरितों के काम 16:30 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी अपनी "क्या करूँ" की सूची में इस समय सबसे ऊपर क्या लिखा है, और उसे किसी नाम से बदलने में क्या चीज़ रोक रही है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 16 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 19

धन्यवाद यीशु, कि उस दासी की आज़ादी आपके लिए किसी की कमाई से बड़ी थी। जब उसके स्वामियों की "कमाई की आशा जाती रही", तब भी आपने एक जीवन को बंधन से छुड़ाया। धन्यवाद कि पौलुस और सीलास घसीटे जाने को तैयार थे, ताकि एक आत्मा मुक्त हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 28

दरवाज़े खुले थे, बेड़ियाँ खुल चुकी थीं, पर पौलुस भागा नहीं। अंधेरे में उसने दारोगा की आत्महत्या की तैयारी को भाँप लिया और चिल्लाया, "अपने आपको कुछ हानि न पहुँचा, क्योंकि हम सब यहीं हैं।" उसने अपनी आज़ादी से ज़्यादा उस आदमी की जान को कीमती समझा जिसने उसे पीटकर बंदी बनाया था। तेरी आज़ादी किसके काम आ रही है?

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