बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 17:21

बाइबल
यह वचन Spiritual Life Ministries द्वारा समर्पित है

पाठ

लूका बीच में कहानी रोककर एक टिप्पणी जोड़ देता है, लगभग कानाफूसी की तरह: एथेंस के लोग और वहाँ बसे परदेशी "नई-नई बातें कहने और सुनने के सिवाय और किसी काम में समय नहीं बिताते थे।" यह कोई तारीफ नहीं है। पौलुस को अरियुपगुस तक ले जाने वाली वह भीड़, जो इतनी शिष्टता से पूछती है "क्या हम जान सकते हैं, कि यह नया मत जो तू सुनाता है, क्या है?", असल में सत्य की खोज में नहीं, बल्कि ताज़गी की तलाश में है। लूका हमें पहले ही बता देता है कि इस शानदार मंच पर पौलुस किस तरह के श्रोताओं के सामने खड़ा होने वाला है: उत्सुक, शिक्षित, और भीतर से खाली।

मूल बात

यह आयत मनुष्य के बारे में एक असहज सच्चाई खोलती है: हम सुनने को ही आज्ञाकारिता समझ बैठते हैं। एथेंस वालों के पास जानकारी की कमी नहीं थी, समय की भी नहीं; उनके पास वही कमी थी जो नई बात को सुनकर रुक जाने से पैदा होती है, यानी निर्णय। परमेश्वर अपना वचन मनोरंजन के लिए नहीं भेजते। कुछ ही पंक्तियों बाद पौलुस कहेगा कि परमेश्वर "अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है" और एक निश्चित दिन ठहराया गया है। आज्ञा और न्याय, ये दो शब्द किसी चर्चा-मंडली के विषय नहीं हैं। बिरीया के लोग इसी से भिन्न थे: उन्होंने "बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया" और प्रतिदिन जाँचते रहे। एक ही वचन, दो नतीजे: एक जगह जीवन बदला, दूसरी जगह बस समय बीता।

जोड़ने वाला सूत्र

परमेश्वर का वचन इतिहास में कभी भी केवल सूचना नहीं रहा। अदन में वह आज्ञा था, सीनै पर व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में चेतावनी और वादा। और जब वह वचन देह बनकर आया, तो लोग उसे भी एक दिलचस्प विषय बना लेना चाहते थे: चिह्न दिखाओ, प्रश्न का उत्तर दो, कुछ नया कहो। यीशु मसीह के साथ वही हुआ जो अरियुपगुस पर पौलुस के साथ हुआ, जब पुनरुत्थान का नाम आते ही "कितने तो उपहास करने लगे, और कितनों ने कहा, यह बात हम तुझ से फिर कभी सुनेंगे।" यही मसीह की खबर की अनोखी धार है: वह जिज्ञासा को संतुष्ट नहीं करती, वह हमें घुटनों पर ले आती है। क्रूस और खाली कब्र को आप बौद्धिक संग्रह में नहीं रख सकते; या तो वे झूठे हैं, या वे आपके पूरे जीवन के स्वामी बन जाते हैं।

दर्पण

ईमानदारी से पूछिए: पिछले महीने आपने कितने उपदेश, पॉडकास्ट, लेख और बाइबल अध्ययन निगले, और उनमें से किस एक ने आपके बजट, आपके कैलेंडर या आपके किसी रिश्ते में सचमुच कुछ बदला? एथेंस की बीमारी धर्मनिरपेक्ष लोगों की बीमारी नहीं है, वह गंभीर पाठकों की बीमारी है। हम नोट्स लेते हैं जबकि माफ़ी माँगना बाकी है। हम दान पर अच्छी शिक्षा सुनते हैं और खाता वैसा का वैसा रहता है। हम "समय नहीं मिलता" कहते हैं, पर समय मिलता है; वह नई-नई बातों में बह जाता है। सुनना सस्ता है, मानना महँगा है, और हमारा मन इस अंतर को छिपाने में बड़ा चतुर है।

आज ही एक काग़ज़ लीजिए। पिछले रविवार या आज सुबह के पाठ से वह एक वाक्य लिखिए जो आपको चुभा था, और उसके ठीक नीचे एक पंक्ति में लिखिए: मैं इस सप्ताह किस दिन, किसके साथ, क्या करूँगा। फिर वह काग़ज़ वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।

संदर्भ

पौलुस एथेंस में अकेला है, और उसकी मर्ज़ी से नहीं। थिस्सलुनीके में दंगा हुआ, बिरीया में भड़काने वाले पीछे आ गए, और भाइयों ने उसे जल्दी से समुद्र के रास्ते निकाल दिया। वह सीलास और तीमुथियुस की प्रतीक्षा कर रहा है। एथेंस पहली सदी में राजनीतिक रूप से रोम के अधीन एक दूसरे दर्जे का शहर था, पर बौद्धिक रूप से अब भी विश्वविख्यात: दर्शन का तीर्थ, पर्यटकों और छात्रों से भरा। अरियुपगुस परिषद शहर की धार्मिक और नैतिक निगरानी करती थी, इसलिए पौलुस का वहाँ ले जाया जाना केवल शिष्टाचार नहीं, हल्की-सी पूछताछ भी थी। और आसपास क्या है? "नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल उठा।" यह संवाद किसी ठंडे सेमिनार हॉल में नहीं, एक जलते हृदय और पत्थर के देवताओं के बीच हो रहा है।

मुख्य पात्र

इस आयत में असली पात्र एथेंस की भीड़ है, और लूका उसका चित्र बिना क्रोध के, पर बिना दया के भी खींचता है। ये लोग मूर्ख नहीं हैं; वे खुले हैं, विनम्र हैं, सुनने को तैयार हैं। उनकी त्रासदी यही है कि उनका खुलापन कभी बंद नहीं होता, इसलिए कुछ भीतर टिकता ही नहीं। वे हर नए विचार के मेहमान हैं और किसी के भी सेवक नहीं। आत्मिक रूप से यह ऊब का एक सुसंस्कृत रूप है: इतनी जानकारी कि कुछ भी चौंकाता नहीं, इतनी विविधता कि कुछ भी बाध्य नहीं करता। और फिर भी परमेश्वर इस भीड़ को छोड़ नहीं देते; उसी दिन दियुनुसियुस और दमरिस विश्वास करते हैं। जिज्ञासा का दरवाज़ा छोटा है, पर अनुग्रह उससे भी भीतर आ जाता है।

श्रोताओं की पहचान

लूका यह वृत्तांत उन पाठकों के लिए लिख रहा है जो इसी यूनानी-रोमी दुनिया में रहते थे, जहाँ सुसमाचार को अक्सर "एक और शिक्षा" की तरह आँका जाता था। उन्होंने इस टिप्पणी में वह व्यंग्य तुरंत पहचाना होगा जो हमसे छूट जाता है: बाज़ार में खड़े होकर दिनभर बहस करना एथेंस की शान थी, और लूका उसी शान को समय की बर्बादी कह देता है। उन्हें यह भी साफ़ दिखा होगा कि बिरीया के लोग, जो कुलीन नहीं बल्कि रोज़ शास्त्र खोजने वाले साधारण लोग थे, असली बुद्धिमान ठहरे। पहली सदी के पाठक के लिए यह राहत की बात थी: परमेश्वर का वचन सुनने का सही तरीका चतुराई नहीं, आज्ञाकारिता है।

चिंतन

पिछले तीन महीनों में परमेश्वर के वचन से सीखी किस एक बात ने आपके पैसे, समय या किसी रिश्ते में वास्तव में बदलाव किया, और अगर कोई नहीं, तो क्यों नहीं?

आप नई आत्मिक सामग्री इसलिए खोजते हैं कि आप बढ़ना चाहते हैं, या इसलिए कि जो पहले सुन चुके हैं उस पर अमल करना टाल रहे हैं?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

Ajith Fernando

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Acts 17:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 17:21 का क्या अर्थ है?
लूका बीच में कहानी रोककर एक टिप्पणी जोड़ देता है, लगभग कानाफूसी की तरह: एथेंस के लोग और वहाँ बसे परदेशी "नई-नई बातें कहने और सुनने के सिवाय और किसी काम में समय नहीं बिताते थे।" यह कोई तारीफ नहीं है। पौलुस को अरियुपगुस तक ले जाने वाली वह भीड़, जो इतनी शिष्टता से पूछती है "क्या हम जान सकते हैं, कि यह नया मत जो तू सुनाता है, क्या है?
प्रेरितों के काम 17:21 किस विषय में है?
परमेश्वर का वचन इतिहास में कभी भी केवल सूचना नहीं रहा। अदन में वह आज्ञा था, सीनै पर व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में चेतावनी और वादा। और जब वह वचन देह बनकर आया, तो लोग उसे भी एक दिलचस्प विषय बना लेना चाहते थे: चिह्न दिखाओ, प्रश्न का उत्तर दो, कुछ नया कहो। यीशु मसीह के साथ वही हुआ जो अरियुपगुस पर पौलुस के साथ हुआ, जब पुनरुत्थान का नाम आते ही "कितने तो उपहास करने लगे, और कितनों ने कहा, यह बात हम तुझ से फिर कभी सुनेंगे।" यही मसीह की खबर की अनोखी धार है: वह जिज्ञासा को संतुष्ट नहीं करती, वह हमें घुटनों पर ले आती है। क्रूस और खाली कब्र को आप बौद्धिक संग्रह में नहीं रख सकते; या तो वे झूठे हैं, या वे आपके पूरे जीवन के स्वामी बन जाते हैं।
प्रेरितों के काम 17:21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही एक काग़ज़ लीजिए। पिछले रविवार या आज सुबह के पाठ से वह एक वाक्य लिखिए जो आपको चुभा था, और उसके ठीक नीचे एक पंक्ति में लिखिए: मैं इस सप्ताह किस दिन, किसके साथ, क्या करूँगा। फिर वह काग़ज़ वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।
प्रेरितों के काम 17:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस आयत में असली पात्र एथेंस की भीड़ है, और लूका उसका चित्र बिना क्रोध के, पर बिना दया के भी खींचता है। ये लोग मूर्ख नहीं हैं; वे खुले हैं, विनम्र हैं, सुनने को तैयार हैं। उनकी त्रासदी यही है कि उनका खुलापन कभी बंद नहीं होता, इसलिए कुछ भीतर टिकता ही नहीं। वे हर नए विचार के मेहमान हैं और किसी के भी सेवक नहीं। आत्मिक रूप से यह ऊब का एक सुसंस्कृत रूप है: इतनी जानकारी कि कुछ भी चौंकाता नहीं, इतनी विविधता कि कुछ भी बाध्य नहीं करता। और फिर भी परमेश्वर इस भीड़ को छोड़ नहीं देते; उसी दिन दियुनुसियुस और दमरिस विश्वास करते हैं। जिज्ञासा का दरवाज़ा छोटा है, पर अनुग्रह उससे भी भीतर आ जाता है।
प्रेरितों के काम 17:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले तीन महीनों में परमेश्वर के वचन से सीखी किस एक बात ने आपके पैसे, समय या किसी रिश्ते में वास्तव में बदलाव किया, और अगर कोई नहीं, तो क्यों नहीं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 17 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

यासोन ने कुछ खास नहीं किया था, बस अपना दरवाज़ा खोला था। और उसी एक काम की कीमत उसे चुकानी पड़ी: "तब उन्होंने यासोन और बाकी लोगों से ज़मानत लेकर उन्हें छोड़ दिया।" अपनी जमा पूँजी गिरवी रखकर उसने पौलुस को जाने दिया। कभी सोचा है, मसीह के किसी जन को अपने घर में जगह देना तुम्हें कितना महँगा पड़ सकता है? और क्या तुम फिर भी दरवाज़ा खोलोगे?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 33

एथेंस में पौलुस का उपदेश किसी बड़ी जयजयकार पर नहीं, एक सादे वाक्य पर खत्म होता है, "इस पर पौलुस उनके बीच में से चला गया।" कुछ हँसे, कुछ ने कहा फिर कभी सुनेंगे। फिर भी वह रुककर बहस नहीं करता, चुपचाप निकल जाता है। और अगली ही आयत में दो नाम हैं जिन्होंने विश्वास किया। तेरी सेवा का फल हमेशा भीड़ में नहीं, कभी कभी दो लोगों में गिना जाता है। क्या तू इतने से संतुष्ट रह पाएगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

पौलुस एथेंस की मूर्तियों को देखकर भीतर से बेचैन हुआ, पर उसने न शिकायत की, न दूरी बनाई। वह लोगों के बीच गया, "अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से और चौक में जो लोग मिलते थे, उनसे प्रतिदिन वाद-विवाद किया करता था।"

चौक यानी बाज़ार, जहाँ लोग सौदा करते, गपशप करते थे। मसीह की बात वहीं पहुँची जहाँ ज़िंदगी चलती है। तेरा चौक कौन सा है? दफ्तर, दुकान, रसोई के पास की बातचीत? वहीं तेरा बुलावा है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 30

अथेने के लोग मूर्तियों से भरे शहर में रहते थे, और पौलुस ने उन्हें ताना नहीं मारा। उसने कहा, "इसलिए परमेश्वर ने अज्ञानता के समयों पर ध्यान नहीं दिया, पर अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।" ध्यान दे, यह सलाह नहीं, आज्ञा है। और वह छोटा सा शब्द "अब" तेरे लिए भी है। कल तक जो न जानता था, वह माफ़ था। पर आज तू जान गया है। अब क्या करेगा?

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