प्रेरितों के काम 17:23
पाठ
पौलुस एथेंस की सड़कों पर टहलते हुए मूर्तियों और वेदियों की भीड़ के बीच से गुज़रता है, और उसकी नज़र एक ऐसी वेदी पर टिक जाती है जिस पर किसी देवता का नाम नहीं, बल्कि एक खुली हुई स्वीकारोक्ति खुदी है: "अनजाने ईश्वर के लिये।" वह इस पत्थर को अपने भाषण का प्रवेश-द्वार बना लेता है और अरियुपगुस की सभा से कहता है कि जिस हस्ती को वे नाम तक जाने बिना पूजते आए हैं, उसी के विषय में वह उन्हें समाचार सुनाने आया है। यह वाक्य न ताना है, न चापलूसी; यह एक घोषणा है कि उनकी धार्मिकता में जो खाली जगह छूटी हुई थी, उसे भरने वाला अब बोल चुका है।
मूल बात
एथेंस की वह वेदी मनुष्य की धार्मिकता का सबसे ईमानदार क्षण है: हमने इतने देवता गढ़ लिए कि हमें डर है कहीं कोई छूट न गया हो, इसलिए हम एक वेदी अनिश्चय के नाम कर देते हैं। पौलुस इस अनिश्चय को न तो सराहता है और न कुचलता है; वह उसे नाम देता है। यहाँ पूरा सुसमाचार एक ही मोड़ पर टिका है, कि परमेश्वर को खोजा नहीं जाता, वे स्वयं को प्रकट करते हैं। मनुष्य की भक्ति ऊपर की ओर हाथ बढ़ाती है और अंधेरे में टटोलती रह जाती है; परमेश्वर नीचे उतरकर बोलते हैं। "अनजाना" रहना परमेश्वर का स्वभाव नहीं, यह हमारी दशा थी, और अनुग्रह का अर्थ ही यह है कि वे इस दशा को अपने शब्द से तोड़ देते हैं।
साझा सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी उसी दिशा में बहती है जिस दिशा में पौलुस यहाँ इशारा करता है: मनुष्य छिपता है, परमेश्वर पुकारते हैं। अदन में पहला प्रश्न मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का था। मूसा के सामने जलती झाड़ी में वे अपना नाम स्वयं बताते हैं, क्योंकि नाम बिना बताए जाना नहीं जा सकता। एथेंस की वह बेनाम वेदी उसी लंबी प्रतीक्षा का पत्थर-रूप है, और पौलुस का उत्तर किसी दर्शनशास्त्र में नहीं, एक व्यक्ति में जाकर रुकता है: "उस मनुष्य के द्वारा धार्मिकता से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है।" अनजाना ईश्वर अब कब्र से बाहर निकले एक जीवित मनुष्य का चेहरा पहनकर सामने खड़ा है। यही मसीह का काम है: वे परमेश्वर के अनुमान को समाप्त करके उन्हें दृश्य बना देते हैं।
दर्पण
हम भी अनजाने ईश्वर के लिए वेदियाँ बनाए रखते हैं, बस उन पर संगमरमर नहीं होता। नौकरी के इंटरव्यू से पहले वह हल्की-सी अंधविश्वासी हरकत, बीमारी की रिपोर्ट आने से पहले वह सौदेबाज़ी वाली प्रार्थना, परिवार की वह रस्म जिसे हम मानते नहीं पर छोड़ते भी नहीं, "क्या पता, कहीं कुछ हो ही न जाए।" यह बीमा है, भक्ति नहीं। असुरक्षा हमें बहुदेववादी बना देती है, चाहे हमारा धर्मशास्त्र कितना ही शुद्ध क्यों न हो। पौलुस की बात यहाँ चुभती है: परमेश्वर आपकी सारी संभावनाओं में से एक संभावना बनकर पूजे जाने से इनकार करते हैं। वे नाम लेकर जाने जाना चाहते हैं, और जिसका नाम आप जानते हैं उससे आप सौदा नहीं, रिश्ता निभाते हैं। आज ही एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जो कहता है "कुछ तो ऊपर है", और उसका नाम लेकर पाँच मिनट प्रार्थना कीजिए कि वह अनजाना ईश्वर उसके लिए नाम पा जाए।
श्रोता
अरियुपगुस पर खड़ा यह आदमी उनकी नज़र में कोई नहीं था। एथेंस अपनी राजनीतिक ताक़त खो चुका था, पर अपनी बौद्धिक शान पर अब भी जीता था; यहाँ शब्दों से प्रतिष्ठा बनती और टूटती थी। उन्होंने पौलुस को "बकवादी" कहा था, यूनानी में एक ऐसा शब्द जो उस चिड़िया के लिए इस्तेमाल होता था जो बाज़ार में गिरे दाने चुगती है: विचारों का कबाड़ बीनने वाला। शहर में धुएँ और बलि के माँस की गंध थी, हर चौराहे पर पत्थर के देवता। और उनकी स्मृति में यह भी दर्ज था कि नए देवता लाने के आरोप में सुकरात को यहीं मौत मिली थी। इसलिए प्रश्न "यह नया मत क्या है" केवल जिज्ञासा नहीं, हल्की-सी अदालती धमक भी थी। पौलुस उनके ही पत्थर से शुरू करता है, यह साहस भी है और शालीनता भी।
कठिन प्रश्न
क्या पौलुस कह रहा है कि मूर्तिपूजक असल में सच्चे परमेश्वर को ही पूज रहे थे, बस नाम नहीं जानते थे? पद 16 इसका उत्तर देता है: मूर्तियों से भरे शहर को देखकर उसका "जी जल उठा।" वह उनकी पूजा को मान्यता नहीं दे रहा, उनकी खोज को स्वीकार कर रहा है। और यह अंतर बारीक है पर निर्णायक: वह उनके अनुभव को "अज्ञानता के समय" कहता है और उसके बाद तुरन्त मन फिराने की आज्ञा रखता है। अज्ञानता निर्दोषता नहीं है। फिर भी वह पद 27 में एक झिझकता हुआ शब्द छोड़ जाता है, "शायद वे उसके पास पहुँच सके।" उन करोड़ों का क्या जिन्होंने यह नाम कभी सुना ही नहीं, इसका साफ़ उत्तर पौलुस यहाँ नहीं देता। वह न्याय परमेश्वर के हाथ में छोड़ता है और हमारे हाथ में केवल सुनाने का काम।
अंतर्पाठ
यशायाह अध्याय 44 में वह कारीगर है जो एक ही लकड़ी से आधी से रोटी सेंकता है और आधी से देवता गढ़कर उसके आगे झुक जाता है; पौलुस पद 29 में ठीक उसी व्यंग्य को उठाता है जब वह सोने, चाँदी और पत्थर की बात करता है। इस्राएल के भविष्यद्वक्ता की आवाज़ अब यूनानी सभा में गूँज रही है। दूसरी ओर रोमियों की पत्री का पहला अध्याय इसी विचार को कठोर करता है: सृष्टि में परमेश्वर की गवाही इतनी स्पष्ट है कि कोई बहाना नहीं बचता। दोनों मिलकर एथेंस की वेदी का सही अर्थ खोलते हैं। वह अनजान का प्रमाण है, पर निर्दोषिता का नहीं। और इसीलिए वहाँ खड़ा एक थका हुआ यहूदी प्रचारक कोई गाली नहीं देता, वह समाचार सुनाता है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सी "अनजाने ईश्वर की वेदी" है, यानी वह जगह जहाँ आप परमेश्वर पर भरोसा तो कहते हैं पर चुपचाप एक विकल्प भी खुला रखते हैं?
पौलुस ने उनकी संस्कृति के भीतर से एक बिंदु चुनकर बात शुरू की, ताना मारकर नहीं। आपके आसपास के लोगों की खोज में वह कौन-सा बिंदु है जिससे आप बातचीत शुरू कर सकते हैं?
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Acts 17:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 17:23 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 17:23 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 17:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 17:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 17:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यासोन ने कुछ खास नहीं किया था, बस अपना दरवाज़ा खोला था। और उसी एक काम की कीमत उसे चुकानी पड़ी: "तब उन्होंने यासोन और बाकी लोगों से ज़मानत लेकर उन्हें छोड़ दिया।" अपनी जमा पूँजी गिरवी रखकर उसने पौलुस को जाने दिया। कभी सोचा है, मसीह के किसी जन को अपने घर में जगह देना तुम्हें कितना महँगा पड़ सकता है? और क्या तुम फिर भी दरवाज़ा खोलोगे?
एथेंस में पौलुस का उपदेश किसी बड़ी जयजयकार पर नहीं, एक सादे वाक्य पर खत्म होता है, "इस पर पौलुस उनके बीच में से चला गया।" कुछ हँसे, कुछ ने कहा फिर कभी सुनेंगे। फिर भी वह रुककर बहस नहीं करता, चुपचाप निकल जाता है। और अगली ही आयत में दो नाम हैं जिन्होंने विश्वास किया। तेरी सेवा का फल हमेशा भीड़ में नहीं, कभी कभी दो लोगों में गिना जाता है। क्या तू इतने से संतुष्ट रह पाएगा?
पौलुस एथेंस की मूर्तियों को देखकर भीतर से बेचैन हुआ, पर उसने न शिकायत की, न दूरी बनाई। वह लोगों के बीच गया, "अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से और चौक में जो लोग मिलते थे, उनसे प्रतिदिन वाद-विवाद किया करता था।"
चौक यानी बाज़ार, जहाँ लोग सौदा करते, गपशप करते थे। मसीह की बात वहीं पहुँची जहाँ ज़िंदगी चलती है। तेरा चौक कौन सा है? दफ्तर, दुकान, रसोई के पास की बातचीत? वहीं तेरा बुलावा है।
अथेने के लोग मूर्तियों से भरे शहर में रहते थे, और पौलुस ने उन्हें ताना नहीं मारा। उसने कहा, "इसलिए परमेश्वर ने अज्ञानता के समयों पर ध्यान नहीं दिया, पर अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।" ध्यान दे, यह सलाह नहीं, आज्ञा है। और वह छोटा सा शब्द "अब" तेरे लिए भी है। कल तक जो न जानता था, वह माफ़ था। पर आज तू जान गया है। अब क्या करेगा?
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