सभोपदेशक 9
पाठ
एक ज़िंदा कुत्ता मरे हुए सिंह से बेहतर है। यह वाक्य किसी कवि का अलंकार नहीं, बल्कि एक थके हुए बुद्धिमान आदमी की ईमानदार गिनती है। सभोपदेशक ने अध्याय ९ में यह देखा कि धर्मी और दुष्ट, शुद्ध और अशुद्ध, बलि चढ़ाने वाले और न चढ़ाने वाले, सबका अंत एक ही है, और कोई नहीं जान सकता कि उसके आगे क्या है, "वह प्रेम है या बैर।" इसी अंधकार के बीच से वह अचानक मुड़कर कहता है: जा, आनन्द से रोटी खा, मन में सुख मानकर दाखमधु पी, अपने कपड़े उजले रख, अपनी पत्नी के संग जी, और जो काम मिले उसे पूरी शक्ति से कर। अंत में वह एक छोटे नगर की कहानी सुनाता है, जिसे एक दरिद्र बुद्धिमान ने बचाया और जिसे कोई याद न रखा।
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर के विषय में दो बातें एक साथ कहता है, और दोनों को छोड़ता नहीं। पहली: सब कुछ उनके हाथ में है, धर्मी और उनके काम भी। दूसरी: उनका हाथ हमें दिखाई नहीं देता, और घटनाओं से हम पढ़ नहीं सकते कि यह प्रेम है या क्रोध। यही धर्मशास्त्र का वह किनारा है जहाँ हम फिसलते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि जीवन का हिसाब खुला रहे, कि भलाई का इनाम दिखे। सभोपदेशक कहता है: नहीं दिखेगा। और फिर, ठीक इसी बिंदु पर, वह निराशा नहीं बल्कि आज्ञा देता है। रोटी और दाखमधु "भाग" हैं, मिली हुई चीज़ें, और उन्हें आनन्द से लेना अविश्वास नहीं, आज्ञाकारिता है।
सूत्र
वचन ७ का आधार चौंकाने वाला है: "क्योंकि परमेश्वर तेरे कामों से प्रसन्न हो चुका है।" काम पूरे होने से पहले ही स्वीकृति दी जा चुकी है। यह पुराने नियम के भीतर से अनुग्रह की आवाज़ है, वह क्रम जो सुसमाचार में पूरा होता है: पहले स्वीकार, फिर परिश्रम। और वह दरिद्र बुद्धिमान, जिसने अपनी बुद्धि से नगर बचाया और जिसका नाम किसी ने याद न रखा, हमें एक परिचित आकार दिखाता है। एक ऐसा उद्धारकर्ता जो हथियारों के बल से नहीं, बल्कि धीमे बोले गए वचनों से बचाता है, और जिसे उसकी अपनी नगरी नहीं पहचानती। मैं इसे भविष्यवाणी नहीं कहूँगा, पर यह वही नमूना है जिसमें यीशु मसीह चलते हैं। साथ ही वचन १८ की चेतावनी बनी रहती है: एक पापी बहुत सी भलाई नाश कर देता है, और उसका उलटा भी सच है।
दर्पण
आप हिसाब लगाते रहते हैं, मानिए। जब बीमारी आई, आपने भीतर पूछा कि कहाँ चूक हुई। जब पड़ोसी की तरक्की हुई और आपकी नहीं, आपने चुपचाप सोचा कि परमेश्वर किसी और को अधिक प्रेम करते हैं। यह पाठ आपके हाथ से वह तराज़ू छीन लेता है। यह कहता है: दौड़ में तेज़ दौड़ने वाला नहीं जीतता, बुद्धिमान को रोटी नहीं मिलती, और आप अपना समय नहीं जानते। यह अपमान जैसा लगता है, पर यह मुक्ति है, क्योंकि अब आपको हर घटना का अर्थ निकालने का बोझ नहीं उठाना है। और तब आदेश आता है, जो सबसे कठिन है: आज की रोटी का आनन्द लो। आप आनन्द को "बाद के लिए" बचा रहे हैं, जैसे किसी ख़ास दिन के लिए रखा वह अच्छा कपड़ा जो अलमारी में पड़ा-पड़ा पुराना हो रहा है।
आज वही कपड़ा निकालिए और आज ही पहन लीजिए, इसी सामान्य दिन में, क्योंकि लिखा है, "तेरे वस्त्र सदा उजले रहें।"
अंतर्पाठ
पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखते समय इसी तरह की भाषा उलटकर रखी: यदि मरे हुए नहीं जी उठते, तो खाओ-पीओ, क्योंकि कल मर जाएँगे। सभोपदेशक और पौलुस दोनों मृत्यु की दीवार को गंभीरता से लेते हैं, पर पौलुस के पास वह ख़बर है जो सभोपदेशक के पास नहीं थी, और इसलिए उसका परिश्रम "व्यर्थ नहीं"। दूसरी ओर लूका १२ का वह धनी मूर्ख, जो अपने भंडार भरकर कहता है कि अब आराम से खा-पी, ठीक वही करता है जिसे सभोपदेशक मना नहीं करता। फ़र्क़ यही है: सभोपदेशक रोटी को परमेश्वर से मिला "भाग" कहता है, वह आदमी उसे अपनी कमाई समझता था। आनन्द और लालच में यही एक अक्षर का अंतर है।
प्रश्न
वचन ५ और १० को कैसे पढ़ें? "मरे हुए कुछ भी नहीं जानते", अधोलोक में न काम, न ज्ञान, न बुद्धि। कोई पुनरुत्थान की आशा यहाँ नहीं है। ईमानदारी यही कहेगी कि सभोपदेशक "सूर्य के नीचे" से देख रहा है, जहाँ से कब्र के पार कुछ दिखता ही नहीं। वह झूठ नहीं बोल रहा; वह उतना ही कह रहा है जितना उसे दिया गया था। मुझे इसे मसीह की रोशनी में जल्दबाज़ी से सुधारने का मन होता है, पर तब मैं वह खो देता हूँ जो यह पाठ देना चाहता है: मरने वालों की सच्ची लाचारी, और इसलिए आज के जीवित दिन का सच्चा मूल्य। परमेश्वर ने अपने वचन में इस अंधकार को रहने दिया। हमें भी उसे मिटाने की जल्दी नहीं करनी चाहिए।
श्रोता-चित्र
पहले सुनने वाले शायद फ़ारसी या यूनानी शासन के अधीन यहूदी थे, छोटे नगरों में रहने वाले, बड़े राजाओं की सेनाओं के आने-जाने के आदी। वचन १४ की घेराबंदी उनके लिए रूपक नहीं थी। वे यह भी जानते थे कि नगर बचाने वाले का नाम इतिहास में नहीं लिखा जाता, केवल राजाओं के नाम लिखे जाते हैं। और वे मंदिर की व्यवस्था में पले-बढ़े थे, जहाँ बलि चढ़ाने और शपथ खाने का अर्थ था। इसलिए वचन २ उनके कानों में जितना कड़वा बजा, हमारे कानों में उतना नहीं बजता: बलि चढ़ाने वाले और न चढ़ाने वाले की एक ही दशा। यह उनकी सारी भक्ति पर एक बड़ा सवाल था, और उन्हें भक्ति से आनन्द की ओर, सौदे से भाग की ओर धकेलता था।
चिंतन
आप जीवन की किन घटनाओं को चुपचाप परमेश्वर के प्रेम या क्रोध का प्रमाण मानकर पढ़ते रहे हैं, और यह पाठ उस पढ़ने पर क्या कहता है?
अगर स्वीकृति पहले ही मिल चुकी है ("परमेश्वर तेरे कामों से प्रसन्न हो चुका है"), तो आपके आज के परिश्रम में क्या बदल जाएगा?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Ecclesiastes 9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 9 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 9 किस विषय में है?
सभोपदेशक 9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 9 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि उस दरिद्र बुद्धिमान पुरुष की बुद्धि से पूरा नगर बच गया। लोग उसे भूल गए, पर आपने उसे याद रखा। धन्यवाद कि हमारी छिपी हुई सेवा, अनदेखी प्रार्थनाएँ और चुपचाप किए गए काम आपकी दृष्टि में कभी व्यर्थ नहीं जाते।
एक छोटा नगर था, जिसमें थोड़े ही लोग थे; और उस पर चढ़ाई करके एक बड़े राजा ने उसे घेर लिया।" ताकत का सारा तमाशा एक तरफ, और भीतर कुछ डरे हुए लोग दूसरी तरफ। पर बचाव किलों से नहीं, एक गरीब बुद्धिमान आदमी से आया, जिसका नाम किसी को याद न रहा। तेरे जीवन का वह मोर्चा, जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजातीं, वहीं परमेश्वर तुझे खड़ा कर सकता है।
हे प्रभु, मुझे शोर मचाने वाला नहीं, बल्कि शांत मन से बोलने वाला बना दे। जब चारों ओर ऊँची आवाज़ें गूँज रही हों, तब भी मुझे याद रहे कि तेरी बुद्धि धीमे और नम्र शब्दों में बसती है। मेरे कान भी उन्हीं शांत आवाज़ों को सुनना सीखें।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें