एस्तेर 4
मूल पाठ
शूशन की सड़कों पर एक बूढ़ा आदमी चिल्लाता हुआ चल रहा है, कपड़े फाड़े, टाट पहने, सिर पर राख। यह मोर्दकै है, और वह राजभवन के फाटक तक आता है, पर भीतर नहीं जा सकता, क्योंकि टाट पहनकर फाटक के भीतर जाने की आज्ञा नहीं। साम्राज्य के हर प्रान्त में यहूदी उपवास कर रहे हैं, रो-पीट रहे हैं, राख में पड़े हैं। महल के भीतर एस्तेर को खबर मिलती है और वह "शोक से भर गई"; वह मोर्दकै को कपड़े भेजती है, मानो टाट उतार देने से खतरा टल जाएगा। मोर्दकै कपड़े नहीं लेता। फिर हताक नाम के खोजे के ज़रिये संदेशों का आदान-प्रदान शुरू होता है: आज्ञा की नकल, हामान की चाँदी, और एक माँग कि रानी राजा के सामने अपने लोगों के लिये गिड़गिड़ाए। एस्तेर कानून की याद दिलाती है, मोर्दकै उसे उसकी असली स्थिति की याद दिलाता है, और अंत में वह कहती है: "यदि नाश हो गई तो हो गई।"
मर्म
इस पूरे अध्याय में परमेश्वर का नाम एक बार भी नहीं आता, और यही इसकी सबसे गहरी बात है। मोर्दकै कहता है कि यदि एस्तेर चुप रह गई तो "और किसी न किसी उपाय से यहूदियों का छुटकारा और उद्धार हो जाएगा" — यह आस्था का बयान है, पर बिना नाम लिए। वह जानता है कि परमेश्वर अपने लोगों को मिटने नहीं देंगे; वह यह नहीं जानता कि किसके हाथ से बचाएँगे। यहाँ विश्वास का स्वरूप निश्चितता नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी है। छुटकारा आएगा, प्रश्न यह है कि तुम उसका हिस्सा बनोगी या केवल तमाशबीन। और मोर्दकै का वह अधूरा वाक्य, "क्या जाने तुझे ऐसे ही कठिन समय के लिये राजपद मिल गया हो?", प्रश्न ही रहता है, दावा नहीं बनता। परमेश्वर छिपे रहकर काम करते हैं, और वे मनुष्यों के जोखिम उठाने के भीतर से काम करते हैं। महल में सुरक्षित बैठना कोई सुरक्षा नहीं; एस्तेर की जान उसी बर्बादी में बँधी है जिससे वह दूरी बनाए रखना चाहती है।
जोड़ने वाला सूत्र
एस्तेर बिना बुलाए राजा के सामने जाती है, और यह जानते हुए जाती है कि इसकी कीमत मृत्यु हो सकती है। वह अपने लोगों में से एक है और साथ ही सिंहासन तक पहुँच रखती है; ठीक इसी दोहरेपन में उसकी मध्यस्थता संभव होती है। बाइबल की पूरी कहानी में यह आकार बार-बार लौटता है और अंत में मसीह में पूरा होता है: वह जो हमारे बीच का है, फिर भी पिता के सामने खड़ा हो सकता है, और जो "शायद मारा जाऊँ" नहीं, बल्कि निश्चित मृत्यु में जाता है। साथ ही ध्यान दीजिए कि दाँव पर क्या है: यदि यहूदी मिट जाते, तो वह वंश ही मिट जाता जिससे मसीहा आने वाले थे। हामान की चाँदी उस वादे पर हमला है जिसकी उसे खबर तक नहीं।
दर्पण
महल में बैठी एस्तेर की पहली प्रतिक्रिया धार्मिक नहीं, बहुत मानवीय है: वह कपड़े भेजती है। शोक को ढँक दो, ताकि बात संभालने लायक बनी रहे। हम भी यही करते हैं। पड़ोसी की नौकरी चली गई, हम खाना भेज देते हैं पर पूछते नहीं कि कर्ज़ कितना है। कलीसिया में किसी परिवार पर मुसीबत है, हम "प्रार्थना करेंगे" कहकर आगे बढ़ जाते हैं। और भीतर वह चुपचाप हिसाब चलता रहता है जो मोर्दकै पकड़ लेता है: मेरा घर तो बचा हुआ है। आपकी सुरक्षा भी उतनी ही पतली है जितनी एस्तेर की; तीस दिन से न बुलाई गई रानी की तरह, आपकी हैसियत किसी और के मूड पर टिकी है। आज ही एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके पास वह पहुँच नहीं है जो आपके पास है, और अभी उसे संदेश भेजकर पूछिए कि असल में हो क्या रहा है।
एक बारीकी
"टाट उतारकर इन्हें पहन ले।" इस छोटे वाक्य में पूरा महल छिपा है। नियम साफ है: टाट पहने कोई फाटक के भीतर नहीं आ सकता। साम्राज्य ने दुःख को सीमा पर रोक रखा है; भीतर सब कुछ सुगंधित, व्यवस्थित, सुंदर रहना चाहिए। एस्तेर उस व्यवस्था में इतने बरस रह चुकी है कि उसकी सहज प्रतिक्रिया वही है जो व्यवस्था की है: शोक को कपड़े पहनाकर प्रस्तुत करने योग्य बना दो। मोर्दकै कपड़े लेने से इनकार करता है, और उसका इनकार ही उसका उपदेश है। जब तक आज्ञा रद्द नहीं होती, वह पेश आने लायक नहीं बनेगा। कभी-कभी विश्वासयोग्यता का पहला रूप यही होता है: दुःख को साफ-सुथरा करने से इनकार करना, ताकि सच फाटक के भीतर घुस सके।
पहले सुनने वाले
यह कहानी उन यहूदियों ने पढ़ी जो लौटकर यरूशलेम नहीं गए थे। वे फारस में रहते थे, फारसी नाम रखते थे, फारसी बाज़ार में कमाते थे, और हर दिन जानते थे कि उनका जीवन किसी दरबारी की मुहर पर टिका है। मंदिर दूर था, भविष्यद्वक्ता चुप थे, परमेश्वर का नाम इस पुस्तक में एक बार भी नहीं आता, और उन्हें यह अजीब नहीं लगा होगा; उनका अनुभव भी ऐसा ही था। पूरीम के पर्व पर जब यह अध्याय पढ़ा जाता, तो हर सुनने वाला समझता कि फाटक के भीतर और बाहर का अंतर क्या होता है। और उन्हें यह भी सुनाई देता कि छिपे परमेश्वर तब भी अपने लोगों को नहीं छोड़ते, चाहे उनका नाम बोला न जाए।
शास्त्र की गूँज
"यदि नाश हो गई तो हो गई" में याकूब की आवाज़ गूँजती है, जब वह बिन्यामीन को मिस्र भेजते हुए कहता है कि यदि वह निर्वंश हुआ तो हो जाएगा (उत्पत्ति 43)। दोनों जगह यह हार नहीं, बल्कि एक तरह का समर्पण है: मैं परिणाम पर अधिकार छोड़ता हूँ, पर कदम उठाता हूँ। इसका सबसे तीखा साथी दानिय्येल 3 में मिलता है, जहाँ तीन जवान भट्ठी के सामने कहते हैं कि परमेश्वर बचा सकते हैं, और यदि न बचाएँ तब भी वे मूरत को नहीं पूजेंगे। यही विश्वास का असली आकार है, न कि यह भरोसा कि सब ठीक हो जाएगा। एस्तेर का उपवास कोई जादू नहीं; वह खाली हाथों की स्वीकृति है, जिसके बाद वह फिर भी दरवाज़ा खोलती है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह "फाटक" कहाँ है जिसके भीतर आप जा सकते हैं और दूसरे नहीं, और आपने उस पहुँच का आख़िरी बार किसके लिए इस्तेमाल किया था?
किस दुःख को आप इस समय कपड़े पहनाकर प्रस्तुत करने लायक बना रहे हैं, और उसे टाट में देखना आपको किस बात से डराता है?
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Esther 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
एस्तेर 4 का क्या अर्थ है?
एस्तेर 4 किस विषय में है?
एस्तेर 4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
एस्तेर 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एस्तेर 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Esther 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब डर मुझे चुप करा देता है, तब भी मेरी बात सुन लीजिए। जैसे एस्तेर ने अपने मन की सच्चाई कह भेजी, वैसे ही मैं अपनी घबराहट आपके सामने रखता हूँ। मुझे वह साहस दीजिए कि सही समय पर सही बात कहने से पीछे न हटूँ।
पिता, जब डर मुझे चुप कर देता है, मुझे एस्तेर जैसा साहस दे कि मैं हाँ कह सकूँ। मुझे अकेले नहीं, अपने लोगों के साथ तेरे सामने झुकना सिखा। जो भी कीमत हो, मैं तेरी इच्छा के लिए कदम बढ़ाना चाहता हूँ। तू मेरे साथ चल।
पिता, जब डर मेरे शब्दों में झलकता है और मैं पीछे हटना चाहती हूँ, तब भी तू मुझे सुनता है। मेरी झिझक को समझ, और मुझे इतना साहस दे कि सही समय पर सही कदम उठा सकूँ। मेरी घबराहट को तू अपने हाथों में थाम ले।
एस्तेर महल में सुरक्षित थी। चुप रहना सबसे आसान रास्ता था। पर उसने कहा, "यदि नाश हो गई तो हो गई।" यह हार मानना नहीं, खुद को परमेश्वर के हाथ में सौंप देना है। पहले तीन दिन का उपवास, फिर कदम। साहस अचानक नहीं आता, वह प्रार्थना में पकता है। तुम्हारी वह बात कौन सी है, जिसे कहने से तुम डर रहे हो?
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