यूहन्ना 14:16
पाठ
यीशु अपने शिष्यों से कहते हैं कि वे विदा होने से पहले पिता से एक विनती करेंगे, और उस विनती के उत्तर में पिता उन्हें "एक और सहायक" देंगे। यह सहायक कोई अस्थायी प्रबंध नहीं है, कोई संकट-कालीन व्यवस्था नहीं जो कुछ दिनों बाद हटा ली जाए, बल्कि वह "सर्वदा" उनके साथ रहेगा। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य पिछली पंक्ति से जुड़ा हुआ है: "यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे।" और उसके तुरंत बाद "और" आता है। यानी आज्ञापालन की बात अधूरी नहीं छोड़ी जाती; उसके साथ ही वह सहारा दिया जाता है जिसके बिना आज्ञापालन केवल थकाने वाला प्रयास बनकर रह जाता। एक ही साँस में माँग और सामर्थ्य, दोनों रखे गए हैं।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर अपने विषय में कुछ ऐसा खोलते हैं जो धर्म की सामान्य कल्पना को उलट देता है। धर्म प्रायः कहता है: नियम लो और अपने बल पर चलो। यीशु कहते हैं: नियम लो, और मैं स्वयं पिता से विनती करूँगा कि तुम्हें भीतर से थामने वाला दिया जाए। "एक और" शब्द छोटा है पर भारी है, क्योंकि इसका अर्थ है उसी जाति का, उसी स्वभाव का, यीशु जैसा ही। जो देखभाल, धैर्य और सत्य शिष्यों ने तीन वर्षों तक यीशु में अनुभव किया, वह घटेगा नहीं, केवल उसका रूप बदलेगा। और सबसे तीखी बात "सर्वदा" है। यीशु का शरीर उनके पास कुछ ही वर्ष रहा; यह सहायक कभी विदा नहीं लेगा। इसलिए मसीही जीवन अकेलेपन में लिया गया नैतिक संकल्प नहीं, बल्कि एक ऐसी उपस्थिति में जीया गया जीवन है जो हमारे उठने-बैठने, हमारे काम, हमारे पैसे और हमारे क्रोध के क्षणों तक साथ चलती है।
मुख्य सूत्र
परमेश्वर की पूरी कहानी में एक बार-बार लौटने वाली प्रतिज्ञा है: "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।" यही वचन अब्राहम को मिला, मूसा को जलती झाड़ी के पास मिला, यहोशू को यरदन के किनारे मिला। इस्राएल के बीच परमेश्वर की उपस्थिति पहले तम्बू में रही, फिर मन्दिर में; एक स्थान, एक इमारत, एक शहर। पर भविष्यद्वक्ताओं ने और आगे की बात कही थी: एक दिन आत्मा भीतर उँडेली जाएगी और आज्ञा पत्थर पर नहीं, मन पर लिखी जाएगी। यीशु का यह वाक्य उसी लम्बी रेखा का अंतिम बिंदु है। जो उपस्थिति देहधारण में हमारे बीच आई, वह पिन्तेकुस्त में हमारे भीतर आती है। इसलिए यह पद कोई अलग-थलग सांत्वना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी वाचा का पूरा होना है, और उसका केंद्र यीशु की विनती है, हमारी योग्यता नहीं।
दर्पण
अब सीधी बात। यह पद आराम देता है, पर उसकी धार भी है। यदि सहायक सर्वदा साथ है, तो आपके पास "मैं अकेला था, इसलिए टूट गया" वाला बहाना नहीं बचता। वह दफ्तर की उस मीटिंग में भी उपस्थित था जहाँ आपने अपने सहकर्मी की गलती पर चुप्पी नहीं, बल्कि नमक छिड़का। वह उस पल भी उपस्थित था जब आपने खर्च का हिसाब पत्नी से थोड़ा घुमा-फिराकर बताया। वह उस देर रात के फोन में भी उपस्थित था। पवित्र आत्मा को "साथ रहने वाला" मानना केवल सांत्वना नहीं, यह जीवन के हर कमरे में एक गवाह को स्वीकार करना है। और साथ ही यही गवाह आपका पक्षकार है, आपका अभियोक्ता नहीं। वह आपको दोष में छोड़ने नहीं, बदलने आया है।
तो आज यह कीजिए: दिन के उस एक क्षण को याद कीजिए जहाँ आपने अकेले लड़ने की कोशिश की और हार गए, उस क्षण को नाम दीजिए, और ज़ोर से कहिए, "पवित्र आत्मा, आप वहाँ थे; कल उस जगह मुझे थामिए।" पाँच मिनट, बस इतना।
सन्दर्भ
यह बातचीत किसी शांत सभा में नहीं हो रही। यह वही रात है जब यहूदा बाहर जा चुका है, रोटी तोड़ी जा चुकी है, और यीशु जानते हैं कि कुछ घंटों में उन्हें पकड़ा जाएगा। शिष्य ऊपरी कमरे में बैठे हैं, कुछ भ्रमित, कुछ डरे हुए। पहली सदी की दुनिया में गुरु का जाना शिष्यों के लिए सामाजिक और आर्थिक विनाश था; गुरु ही उनकी पहचान, सुरक्षा और भविष्य था। रोमी शासन के नीचे, धार्मिक अगुवों की शत्रुता के बीच, नेता के बिना बचा हुआ समूह बिखर जाता था। यीशु इस डर को हल्का नहीं करते; वे उसे संबोधित करते हैं। "मैं तुम्हें अनाथ न छोड़ूँगा" वे थोड़ी देर बाद कहेंगे, और अनाथ शब्द उस समाज में जीवित रहने की संभावना खोने जैसा था। इसी अँधेरे में यह प्रतिज्ञा जलती है।
एक बारीकी
"सहायक" के लिए यूनानी शब्द है पैराक्लेतोस, जिसका शाब्दिक अर्थ है "पास बुलाया गया"। उस समय यह शब्द अदालत की भाषा में इस्तेमाल होता था: वह व्यक्ति जो आरोपी के पास खड़ा होकर उसका पक्ष रखता है। कोई दूर से सलाह देने वाला नहीं, बल्कि साथ खड़ा होने वाला। यह बारीकी नैतिक जीवन के लिए निर्णायक है। हम अक्सर सोचते हैं कि परमेश्वर ऊपर से हमारे प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हैं। यह शब्द कहता है: वे कटघरे के पास, आपके कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। जब आप अपने बच्चे पर चिल्लाने के बाद शर्म से भरे हैं, तो जो आत्मा आपको दोष का अहसास कराती है, वही आत्मा आपके लिए बोलती भी है। यह जानना आपको ढीला नहीं करता; यह आपको फिर से खड़ा करता है।
मुख्य पात्र
इस पद में असली पात्र यीशु हैं, और उनका व्यवहार चौंकाने वाला है। जिस रात उनका अपना शरीर पीड़ा की ओर बढ़ रहा है, वे अपनी नहीं, दूसरों की चिंता कर रहे हैं। "मैं पिता से विनती करूँगा" में एक गहरी बात छिपी है: यीशु देते नहीं, माँगते हैं। पुत्र होकर भी वे पिता से माँगने की मुद्रा में खड़े हैं। यह उनकी कमज़ोरी नहीं, उनके सम्बन्ध की सच्चाई है, वही सम्बन्ध जिसमें वे हमें खींच लेना चाहते हैं। और यहाँ हमें अपने बारे में भी कुछ पता चलता है: हम अपने प्रियजनों को संसाधन देना चाहते हैं, यीशु अपने लोगों को उपस्थिति देना चाहते हैं। हम चीज़ें छोड़कर जाते हैं; वे स्वयं को छोड़कर जाते हैं, दूसरे रूप में।
शास्त्र की गूँज
दो जगहें इस पद पर रोशनी डालती हैं। पहली, निर्गमन 33 में मूसा परमेश्वर से कहते हैं कि यदि आपकी उपस्थिति हमारे साथ न चले, तो हमें यहाँ से मत ले जाइए। मूसा जानते थे कि वादा किया गया देश भी परमेश्वर के बिना बंजर है। यीशु उसी प्रार्थना का उत्तर हैं, केवल अब उपस्थिति बादल के खंभे में नहीं, विश्वासी के भीतर है। दूसरी गूँज इसी अध्याय के भीतर है, पद छब्बीस में, जहाँ वही सहायक "सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैंने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।" यानी आत्मा कोई नया, यीशु से अलग रास्ता नहीं खोलता। यदि कोई भीतरी आवाज़ आपको यीशु के वचनों से दूर ले जाए, तो वह आवाज़ यह सहायक नहीं है।
पहले सुनने वाले
यूहन्ना का सुसमाचार उन विश्वासियों के लिए लिखा गया जो यीशु को देह में कभी नहीं देख पाए थे और जिन्हें आराधनालय से निकाला जा रहा था। परिवार टूट रहे थे, व्यापार छूट रहे थे। उनके भीतर एक चुभता प्रश्न था: पहली पीढ़ी ने प्रभु को देखा, छुआ, सुना; हमारे पास क्या है? यह पद उन्हें उत्तर देता है, और वह उत्तर नरम नहीं बल्कि साहसिक है: तुम्हारे पास कम नहीं, तुम्हारे पास "एक और" है, और वह अस्थायी नहीं। जब उन पर मुकदमा चलता, तब यह शब्द पैराक्लेतोस अचानक बहुत ठोस हो जाता। कटघरे में खड़े आदमी के लिए "साथ खड़ा होने वाला" कोई भावुक कल्पना नहीं थी। वह जीने-मरने का प्रश्न था।
कठिन प्रश्न
तो फिर हम इतनी बार अकेला क्यों महसूस करते हैं? यदि सहायक सर्वदा साथ है, तो अस्पताल के गलियारे की वह रात इतनी खाली क्यों लगी? इस प्रश्न को धार्मिक जवाबों से जल्दी बंद कर देना बेईमानी होगी। यीशु ने यह नहीं कहा कि वह सर्वदा महसूस होगा; उन्होंने कहा कि वह सर्वदा रहेगा। यह अंतर छोटा नहीं। हमारी अनुभूति हमारी नींद, हमारी दवाइयों, हमारी थकान पर निर्भर करती है; उनकी उपस्थिति उनकी विनती पर निर्भर करती है। और फिर भी मैं यह नहीं कहूँगा कि इससे खालीपन मिट जाता है। कुछ रातें खाली ही रहती हैं। पर उस खालीपन के भीतर भी कोई खड़ा है जिसे हम नहीं देखते, ठीक वैसे ही जैसे संसार उसे नहीं देखता। इसे मान लेना विश्वास है, समझ लेना नहीं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा ऐसा है जिसे आप चुपचाप "मेरा अपना मामला" मानकर चलाते हैं, जहाँ आपने किसी साथी को आने नहीं दिया?
यीशु ने आज्ञापालन और सहायक को एक ही साँस में जोड़ा। आपके लिए इसका क्या अर्थ है कि आज्ञा और सामर्थ्य अलग-अलग नहीं मिलते?
यदि पवित्र आत्मा वह है जो यीशु के वचन स्मरण कराता है, तो आपके पास इस समय स्मरण करने के लिए कौन-सा वचन है, और आप उसे कहाँ भूलते जा रहे हैं?
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John 14:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:16 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:16 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु यह नहीं कहते कि वह तुम्हें कोई पता भेज देंगे। वह कहते हैं, "फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो।" वह खुद लौटकर आएँगे। स्वर्ग की सबसे बड़ी बात सोने की गलियाँ नहीं, बल्कि यह है कि वहाँ वही होंगे जिन्होंने तुमसे प्रेम किया। आज जो अकेलापन तुम्हें काट रहा है, उसका अंत एक जगह नहीं, एक व्यक्ति है।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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