निर्गमन 38
पाठ
अध्याय की शुरुआत आँगन की उस वेदी से होती है जहाँ खून बहता था: बबूल की लकड़ी की, पाँच हाथ लम्बी और पाँच हाथ चौड़ी, तीन हाथ ऊँची, चारों कोनों पर सींग, और पूरी तरह पीतल से मढ़ी हुई। फिर हौदी बनती है, और उसका पीतल कहीं और से नहीं आता, बल्कि "मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सेवा करनेवाली महिलाओं के पीतल के दर्पणों" से। इसके बाद पूरे आँगन का घेरा खड़ा होता है, सूक्ष्म सनी के पर्दे, खम्भे, पीतल की कुर्सियाँ, चाँदी की घुंडियाँ और छड़ें। अंत में लेखा-जोखा आता है: बसलेल और ओहोलीआब के हाथों बना काम, और सोने, चाँदी, पीतल का पूरा हिसाब, जिसमें छः लाख तीन हजार साढ़े पाँच सौ पुरुषों का आधा-आधा शेकेल भी गिना गया है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि धातुएँ कहाँ-कहाँ रखी गई हैं। बाहर आँगन में पीतल, खम्भों पर चाँदी, और भीतर पवित्रस्थान में सोना। यह सजावट का शौक नहीं, यह पवित्रता का नक्शा है: परमेश्वर के निकट जाना कोई सपाट रास्ता नहीं, इसमें दर्जे हैं, सीमाएँ हैं, और सबसे पहली चीज़ जो पापी मनुष्य को आँगन में मिलती है वह मेज़ नहीं, वेदी है। मिलन से पहले बलिदान। पर असली धक्का पद 27 में है: वे सौ किक्कार चाँदी, जो हर गिने हुए इस्राएली के आधे शेकेल से आई थी, निवास की कुर्सियों में ढाल दी गईं। यानी परमेश्वर का घर शाब्दिक रूप से छुड़ाए हुए लोगों के छुड़ौती-धन पर टिका है। अनुग्रह ऊपर से उतरता है, पर वह नींव में छूए हुए लोगों के नाम लिखे हैं।
सूत्र
पीतल की वेदी आँगन के मुँह पर खड़ी है, दरवाज़े के ठीक भीतर, और वहाँ से आगे बढ़ने का कोई और रास्ता नहीं। जो कोई परमेश्वर के निवास की ओर जाना चाहता है, उसे पहले उस जगह से गुज़रना पड़ता है जहाँ किसी और की जान ली गई। यह पूरी व्यवस्था एक तीर की तरह आगे इशारा करती है: बलिदान बार-बार दोहराया जाता है, क्योंकि कोई भी बैल या मेमना उस बोझ को हमेशा के लिए नहीं उठा सकता। और वह चाँदी, जो हर गिने हुए व्यक्ति की "छुड़ौती" थी और परमेश्वर के घर की नींव बनी, पतरस के इस वाक्य में अपनी सीमा पा जाती है कि हम चाँदी-सोने जैसी नाशवान वस्तुओं से नहीं, मसीह के बहुमूल्य लहू से छुड़ाए गए। बबूल की लकड़ी पर पीतल मढ़ा गया था ताकि वह आग सह सके; मसीह ने वह आग बिना किसी परत के सही।
दर्पण
पद 8 पर रुकिए। वे स्त्रियाँ अपने दर्पण ले आईं। मिस्र के उन पॉलिश किए हुए पीतल के आईनों में उन्होंने वर्षों अपना चेहरा देखा था, गुलामी के दिनों में भी, और अब वही चेहरा-देखने का साधन पिघलकर वह हौदी बन गया जिसमें याजक धुलते थे। आप जानते हैं कि आप दिन में कितनी बार अपने आप को देखते हैं: शीशे में, फ़ोन की स्क्रीन में, दूसरों की आँखों में, अपने काम के नतीजों में। वहीं हमारा डर छिपा है कि हम काफ़ी अच्छे नहीं दिखते, और वहीं हमारा घमंड भी। ये स्त्रियाँ अपनी आत्म-छवि को ही चढ़ावे में ले आईं, और वह चीज़ शुद्धिकरण का पात्र बन गई। आज शाम आईने के सामने खड़े होकर ज़ोर से एक वाक्य कहिए: उस एक बात का नाम लीजिए जो आप वहाँ सबसे ज़्यादा ठीक करने की कोशिश करते हैं, और उसे उसी क्षण परमेश्वर के हाथ में सौंप दीजिए।
प्रश्न
गिनती क्यों? पद 26 में छः लाख तीन हजार साढ़े पाँच सौ पुरुष गिने गए, और हर एक को आधा शेकेल देना पड़ा। सवाल यह उठता है कि परमेश्वर के अपने लोगों को उनकी गिनती के लिए मोल क्यों चुकाना पड़ा, मानो गिना जाना अपने आप में जोखिम भरा हो। अमीर ज़्यादा नहीं दे सकता था, गरीब कम नहीं; सबका मूल्य एक ही। यह अच्छी खबर है और चुभने वाली खबर भी। अच्छी, क्योंकि परमेश्वर के सामने आपकी हैसियत आपकी कमाई से तय नहीं होती। चुभने वाली, क्योंकि इसका मतलब है कि आप बिना छुड़ौती के गिने ही नहीं जा सकते। हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें ऐसे ही स्वीकार कर ले। यह पाठ वह सहूलियत नहीं देता, और मैं इसे नरम नहीं करूँगा।
अंतर्पाठ
निर्गमन 30:12-16 में वही आधा शेकेल पहले ही आदेश के रूप में दिया गया था, इस चेतावनी के साथ कि गिनती के समय लोगों पर विपत्ति न आए। अध्याय 38 उस आदेश का हिसाब है: वह छुड़ौती-धन कहीं खर्च नहीं हुआ, वह निवास की नींव बन गया। इससे साफ़ होता है कि परमेश्वर का घर हवा में नहीं, बचाए गए लोगों की कीमत पर खड़ा है। दूसरी ओर 1 पतरस 1:18-19 इसी छवि को उलटकर पूरा करता है: वहाँ छुड़ौती अब लोगों की जेब से नहीं, परमेश्वर की ओर से आती है। पुराने नियम में लोग नींव के लिए चाँदी देते हैं; नए नियम में परमेश्वर स्वयं वह मूल्य चुकाकर हमें अपने भवन के पत्थर बना लेते हैं।
बारीकी
"उसने उसके चारों कोनों पर उसके चार सींग बनाए, वे उसके साथ बिना जोड़ के बने।" यह छोटी-सी टिप्पणी आसानी से छूट जाती है। सींग शक्ति का प्रतीक थे, और वेदी के सींगों पर बलिदान का लहू लगाया जाता था; बाद के इतिहास में जिस व्यक्ति की जान ख़तरे में होती थी वह भागकर इन्हीं सींगों को पकड़ लेता था। और बसलेल ने उन्हें अलग से जोड़कर नहीं लगाया। वे वेदी के शरीर से ही निकले हुए थे। जिस जगह मृत्यु होती है, वहीं से शरण उगती है, बाद में चिपकाई गई कोई सुविधा नहीं। परमेश्वर की दया उनके न्याय पर लगाया गया पैबंद नहीं है; वह उसी एक टुकड़े से निकलती है।
चिंतन
आपके जीवन में वह "दर्पण" क्या है जिसे आप पिघलाकर परमेश्वर की सेवा में देने से सबसे ज़्यादा हिचकिचाते हैं?
अगर परमेश्वर का घर छुड़ाए हुए लोगों की चाँदी पर टिका है, तो आपकी मंडली की नींव में आपका कौन-सा हिस्सा ढला हुआ है?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि मण्डली के गिने हुए हर एक जन की चाँदी आपके निवास के काम आई। आपकी गिनती में कोई छूटा नहीं, हर छोटा दान जुड़कर सौ किक्कार बना। धन्यवाद कि मेरा थोड़ा सा देना भी आपके हाथों में व्यर्थ नहीं जाता।
फिर उसने बबूल की लकड़ी के डंडे बनाए, और उन्हें पीतल से मढ़ा।" वेदी के लिए डंडे, यानी वह जगह जहाँ पाप के लिए बलि चढ़ती थी, उठाकर साथ ले जाई जा सकती थी। परमेश्वर ने अपनी क्षमा को एक जगह बाँधकर नहीं रखा। जंगल के हर पड़ाव पर वेदी साथ चली। तेरा रास्ता जहाँ भी मुड़े, उसकी दया वहीं पहुँचती है।
सौ किक्कार चाँदी से पवित्रस्थान की कुर्सियाँ ढाली गईं।" यह वही चाँदी थी जो हर गिने गए इस्राएली ने अपने प्राणों की छुड़ौती के रूप में दी थी। सोच, परमेश्वर के तम्बू का सारा भार उसी नींव पर टिका था जो छुड़ाए जाने की निशानी थी। तेरा जीवन भी बिना मोल के खड़ा नहीं है। जिस नींव पर तू टिका है, वह किसी के चुकाए दाम से बनी है।
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