यहेजकेल 12:28
पाठ
निर्वासितों की बस्ती में एक कहावत चल पड़ी थी: भविष्यद्वक्ता जो कहता है, वह "बहुत दिन के बाद पूरा होनेवाला है" (पद 27)। यानी सच तो होगा, पर हमारे जीते-जी नहीं। इसी ताने के जवाब में परमेश्वर यहेजकेल से कहते हैं कि लोगों के मुँह पर यह उत्तर रख दे: "मेरे किसी वचन के पूरा होने में फिर विलम्ब न होगा, वरन् जो वचन मैं कहूँ, वह निश्चय पूरा होगा।" एक ही वाक्य में दो बातें कटती हैं। पहली, समय का वह फासला जिसे लोगों ने अपनी सुविधा के लिए गढ़ लिया था। दूसरी, यह भ्रम कि परमेश्वर का बोलना और परमेश्वर का करना दो अलग चीज़ें हैं। और अंत में मुहर: "प्रभु यहोवा की यही वाणी है।"
मूल बात
यह पद परमेश्वर के चरित्र की एक ऐसी बात कहता है जिसे हम मानते तो हैं पर जीते नहीं: उनका बोलना ही उनका करना है। मनुष्यों के बीच शब्द और कार्य के बीच एक खाई होती है, इसलिए हम वादों को छूट के साथ सुनते हैं। यहेजकेल के श्रोताओं ने उसी आदत को परमेश्वर पर चढ़ा दिया था। उन्होंने परमेश्वर के धीरज को उनकी अनुपस्थिति समझ लिया, और देरी को ढील समझ लिया। पद 25 में परमेश्वर पहले ही कह चुके हैं, "हे बलवा करनेवाले घराने तुम्हारे ही दिनों में मैं वचन कहूँगा, और वह पूरा हो जाएगा।" यही कृपा की कठोर करवट है: जो परमेश्वर देर नहीं करते, वे न्याय में भी देर नहीं करते, और उद्धार में भी नहीं। तुम्हारी टालमटोल की सुविधा यहीं खत्म होती है।
सूत्र
परमेश्वर का वचन और उसका पूरा होना एक ही चीज़ है, यह विचार पूरे बाइबल की रीढ़ है। सृष्टि में वे बोलते हैं और चीज़ें हो जाती हैं; यहेजकेल के दिनों में वे बोलते हैं और यरूशलेम गिर जाता है, ठीक उसी पीढ़ी में, जैसा पद 25 में कहा गया। यही धारा यीशु मसीह तक पहुँचती है, जिन्हें यूहन्ना "वचन" कहता है: परमेश्वर का बोलना अब देह पहनकर हमारे बीच चलता है, और उनके मुँह से निकली बात रोग, तूफ़ान और कब्र तक को मानती है। यहेजकेल 12:28 का "विलम्ब न होगा" क्रूस पर अपनी सबसे तीखी पूर्ति पाता है: जो कहा गया था, वह ठीक समय पर हुआ। और यही आधार है उस दूसरी प्रतिज्ञा का, जिसे हम आज भी दूर की बात मानकर टालते हैं।
दर्पण
हम सब के पास एक व्यक्तिगत "बहुत दिन के बाद" होता है। वह कर्ज़ जिसे अगले साल से चुकाना शुरू करेंगे। वह माफ़ी जो भाई से तब माँगेंगे जब माहौल ठीक होगा। शरीर की वह चेतावनी जिसे चालीस के बाद गंभीरता से लेंगे। पिता से वह बातचीत जो अभी बहुत भारी लगती है। हम इन्हें इनकार नहीं करते, बस कैलेंडर में आगे खिसका देते हैं, और यही सबसे सभ्य किस्म की अवज्ञा है। निर्वासितों ने भविष्यद्वाणी को झूठा नहीं कहा; उन्होंने उसे दूर कह दिया, और उतने से ही उनका विवेक सो गया। परमेश्वर इस पद में समय का वह तकिया खींच लेते हैं।
आज ही, दस मिनट के भीतर, उस एक काम को नाम दें जिसे आप "बाद में" कहकर टालते आए हैं, उसे कागज़ पर लिखें और उसके आगे आज की तारीख डालकर उसका पहला छोटा कदम अभी पूरा करें, चाहे वह सिर्फ़ एक फ़ोन कॉल हो।
कठिन प्रश्न
पर ईमानदारी से: "विलम्ब न होगा" कहने के ढाई हज़ार साल बीत चुके हैं, और हम अब भी इंतज़ार में हैं। क्या परमेश्वर देर नहीं करते, या हमारी घड़ी अलग है? पाठ इसका आसान उत्तर नहीं देता। जो वह कहता है वह इतना है: परमेश्वर की देरी कभी हमारी सुविधा के लिए नहीं होती। यहेजकेल के मामले में वचन उसी पीढ़ी में पूरा हुआ, और जिन्होंने उसे दूर समझा, वे उसकी चपेट में आए। शायद यही असली चेतावनी है, कि परमेश्वर का समय हमें हमेशा बेवक्त लगेगा, और इसीलिए तैयारी का एकमात्र समय आज है। रहस्य बना रहता है; लापरवाही का बहाना नहीं बचता।
शास्त्र की गूँज
यशायाह 55 में परमेश्वर कहते हैं कि उनका वचन खाली नहीं लौटता, वह वही पूरा करके लौटता है जिसके लिए भेजा गया; यहेजकेल का पद उसी सत्य का न्याय-पक्ष है। और पतरस अपनी दूसरी पत्री में उन ताने मारनेवालों का सामना करता है जो पूछते थे कि आने की प्रतिज्ञा कहाँ है, और वह उत्तर देता है कि परमेश्वर देर नहीं करते बल्कि धीरज धरते हैं, ताकि लोग मन फिराएँ। दोनों जगह एक ही बात है: जिसे हम ढील समझते हैं, वह असल में खुली हुई खिड़की है, और खिड़कियाँ बंद होती हैं।
मुख्य पात्र
इस पद में केंद्र में परमेश्वर हैं, और उनकी छवि कोमल नहीं है। वे अपने ही लोगों की कहावत सुनते हैं, उसे दोहराते हैं, और फिर उसे तोड़ देते हैं। दो बार वे अपने नाम की मुहर लगाते हैं, "प्रभु यहोवा की यही वाणी है", मानो कोई अदालत में हस्ताक्षर कर रहा हो। यहाँ कोई मनाने की कोशिश नहीं, कोई तर्क नहीं; सिर्फ़ वह अधिकार जो अपने वचन के पीछे अपना पूरा अस्तित्व रख देता है। पर ध्यान दीजिए, वे बोलते ही क्यों हैं। चुप रहकर भी वे न्याय कर सकते थे। बोलना ही उनकी दया है, क्योंकि चेतावनी सुनी जा सकती है, और जो सुन ले वह मुड़ सकता है।
मनन के लिए
आपके जीवन में वह कौन-सी बात है जिसे आप झूठ नहीं मानते, पर "अभी नहीं" कहकर जीते हैं?
अगर परमेश्वर का बोलना ही उनका करना है, तो उनके कौन-से वचन को आपने आज तक सिर्फ़ जानकारी की तरह पढ़ा है, आदेश की तरह नहीं?
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Ezekiel 12:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यहेजकेल 12:28 किस विषय में है?
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