यहेजकेल 14
पाठ
इस्राएल के पुरनिये यहेजकेल के सामने आकर बैठ जाते हैं, जैसे कोई परामर्श लेने बैठता है। परमेश्वर उनके प्रश्न का उत्तर नहीं देते, बल्कि उनके मन का भेद खोलते हैं: इन्होंने अपनी मूरतें मन में स्थापित कर ली हैं और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखी है, इसलिए उन्हें उत्तर उनकी मूरतों के अनुसार ही मिलेगा। फिर परमेश्वर एक कठोर बात कहते हैं: यदि किसी देश पर अकाल, दुष्ट जन्तु, तलवार और मरी, ये चार दण्ड आएँ, तो नूह, दानिय्येल और अय्यूब जैसे धर्मी पुरुष भी अपने बेटे-बेटियों को नहीं बचा सकेंगे, केवल अपने प्राण बचाएँगे। अन्त में यरूशलेम से थोड़े बचे हुए लोग निर्वासितों के पास पहुँचेंगे, और उनका चाल चलन देखकर बन्दियों को शान्ति मिलेगी।
मर्म
सबसे चुभनेवाली बात यह है कि परमेश्वर चुप नहीं रहते, वे उत्तर देते हैं, पर "उसकी बहुत सी मूरतों के अनुसार ही"। यानी जो आदमी पहले ही निर्णय ले चुका है और अब केवल परमेश्वर की मुहर चाहता है, उसे वही मिलेगा जो वह चाहता था, और वही उसका न्याय बन जाएगा। "उन्हें मैं उन्हीं के मन के द्वारा फँसाऊँगा" कहता है कि हमारी अपनी इच्छा ही हमारा फन्दा बन सकती है। यहाँ परमेश्वर का क्रोध मनमौजी नहीं है; वह ठीक उसी दिशा में चलता है जिस दिशा में हमने अपना मन पहले ही मोड़ लिया था। और साथ ही पद 6 में द्वार खुला है: "फिरो और अपनी मूर्तियाँ को पीठ के पीछे करो।" न्याय की घोषणा के बीच में पश्चाताप का निमन्त्रण रखा गया है, यही अनुग्रह है।
बड़ी कहानी का सूत्र
पद 14 और 20 की बात हमें बेचैन करती है: धर्मी आदमी अपने बच्चों को नहीं बचा सकता। नूह ने सारे घर को जहाज़ में बचाया था, अय्यूब अपने बेटों के लिए बलि चढ़ाता था, पर यहाँ कहा जाता है कि वह समय बीत गया। कोई भी मनुष्य इतना धर्मी नहीं है कि उसकी धार्मिकता दूसरों के लिए बच जाने का आधार बने। यही खाली जगह मसीह में भरती है। एक ही ऐसा धर्मी आया जिसकी धार्मिकता केवल अपने प्राण नहीं बचाती, बल्कि बाँटी जाती है। यहेजकेल की यह कठोर सीमा सुसमाचार की तैयारी है: यदि पिता की धार्मिकता बेटे को नहीं बचा सकती, तो हम सबको एक ऐसे मध्यस्थ की ज़रूरत है जो हमारे बदले खड़ा हो, न कि हमारे साथ।
दर्पण
हम आज भी पुरनियों की तरह बैठते हैं। नौकरी का वह प्रस्ताव जिसे आप स्वीकार करना ही चाहते हैं, और अब प्रार्थना में केवल स्वीकृति ढूँढ़ रहे हैं। वह रिश्ता जिसके बारे में आप जानते हैं कि सही नहीं है, पर आप "शान्ति" की अनुभूति का इन्तज़ार कर रहे हैं। वह खर्च, वह निवेश, वह चुप्पी जो आपने अपने भाई के प्रति ठान ली है। परमेश्वर का उत्तर तब भयानक रूप से विनम्र होता है: वे आपको आपकी ही इच्छा दे देते हैं। यह मूर्तिपूजा मन्दिर में नहीं, मन में स्थापित होती है, और उसका चिह्न यह है कि हम प्रश्न पूछते हैं पर उत्तर सुनने को तैयार नहीं।
आज यह करें: कागज़ पर वह एक निर्णय लिखें जिसके बारे में आप "प्रार्थना कर रहे हैं", और नीचे ईमानदारी से वह उत्तर लिखें जो आप चाहते हैं। फिर ऊँची आवाज़ में कहें: "प्रभु, यही मेरी मूरत है, इसे मैं पीठ के पीछे करता हूँ।"
पहले सुननेवाले
यह वचन बाबेल के निर्वासितों को मिला, यहूदा के उन लोगों को जो 597 ईसा पूर्व के बाद तेल-अबीब की बस्तियों में बैठे थे। उनके पुरनिये यहेजकेल के घर आते थे, यह सम्मान का चिह्न था, पर वे भविष्यद्वक्ता को एक जानकारी का स्रोत समझते थे: क्या हम जल्दी लौटेंगे? क्या यरूशलेम बचेगा? उनके लिए सबसे कड़वा यह था कि उनका धार्मिक वंश, अब्राहम की सन्तान होना, मन्दिर का होना, उन्हें ढाल नहीं देगा। और पद 22-23 में उन्हें बताया जाता है कि यरूशलेम का पतन उनके लिए झटका नहीं, बल्कि पुष्टि बनेगा: वहाँ से आनेवाले बचे हुए लोगों का चाल चलन देखकर वे समझेंगे कि परमेश्वर ने "बिना कारण नहीं किया"।
एक बारीकी
पद 22 की शान्ति सबसे अनोखी शान्ति है जो बाइबल में मिलती है। निर्वासितों को सान्त्वना इस बात से नहीं मिलती कि बचे हुए लोग अच्छे निकले, बल्कि इस बात से कि उनका "चाल चलन और काम" देखकर वे जान जाएँगे कि न्याय उचित था। यह भयानक सान्त्वना है, फिर भी सच्ची है। क्योंकि सबसे बुरी पीड़ा यह नहीं कि परमेश्वर ने मारा, बल्कि यह सन्देह कि परमेश्वर ने अन्याय से मारा। जब आप किसी नाश को देखते हैं और आपके भीतर से आरोप उठता है, तो यहेजकेल कहता है: ठहरो, तुम सब कुछ नहीं देख रहे। परमेश्वर के चरित्र पर भरोसा उस दिन शान्ति बनता है जब हम पूरी तस्वीर देख पाते हैं।
परिस्थिति
अध्याय का समय यरूशलेम के अन्तिम पतन से पहले का है, जब निर्वासित अभी भी आशा पाल रहे थे कि नगर बच जाएगा और वे शीघ्र लौटेंगे। झूठे भविष्यद्वक्ता यही सन्देश बेच रहे थे, और अध्याय 13 के बाद यहाँ पूछनेवाले और उत्तर देनेवाले दोनों को एक ही तराजू पर रखा जाता है: "जैसा भविष्यद्वक्ता से पूछनेवाले का अधर्म ठहरेगा, वैसा ही भविष्यद्वक्ता का भी"। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्रोता निर्दोष नहीं हैं; झूठा शिक्षक वहीं पनपता है जहाँ लोग झूठ सुनना चाहते हैं। तलवार, अकाल, दुष्ट जन्तु और मरी, ये चार दण्ड वाचा के शापों की परिचित भाषा थी। इस्राएल जानता था कि ये यूँ ही आनेवाली विपत्तियाँ नहीं, बल्कि वाचा तोड़ने के परिणाम हैं।
मनन के प्रश्न
आप किस निर्णय के लिए परमेश्वर से पूछ रहे हैं, जबकि उत्तर आप पहले ही चुन चुके हैं?
यदि दूसरों की धार्मिकता आपको नहीं बचा सकती, तो आपके परिवार में आपकी निजी आज्ञाकारिता का क्या मूल्य है?
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यहेजकेल 14 का क्या अर्थ है?
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यहेजकेल 14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहेजकेल 14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ezekiel 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे मन में जो मूरतें चुपचाप जगह बना चुकी हैं, उन्हें मुझे दिखा। मैं अपना मुँह उनसे फेरकर तेरी ओर लौटना चाहता हूँ। मुझे सच्चे पश्चाताप का साहस दे, ताकि मेरा दिल बँटा हुआ न रहे, बल्कि पूरी तरह तेरा हो।
फिर यहोवा का वचन मेरे पास पहुँचा" यह छोटा सा वाक्य है, पर सोचो, हाथ में मूर्तियाँ लिए पुरनिये अभी अभी यहेजकेल के सामने बैठे थे। ऐसे लोगों के बीच भी परमेश्वर चुप नहीं हुआ। और जो वचन आया वह कठोर था। कभी कभी परमेश्वर का बोलना सांत्वना नहीं, चेतावनी होती है। क्या तू उसे भी सुनने को तैयार है?
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