उत्पत्ति 28
पाठ
इसहाक याकूब को बुलाकर आशीर्वाद देता है और उसे मना करता है कि वह किसी कनानी लड़की से विवाह न करे; उसे पद्दनराम भेजा जाता है, अपने मामा लाबान के घर, और साथ में अब्राहम को दी गई आशीष की विरासत सौंपी जाती है, "वह तुझे और तेरे वंश को भी अब्राहम की सी आशीष दे।" एसाव यह देखकर इश्माएल की बेटी से विवाह कर लेता है, मानो पिता की पसंद का अनुमान लगाकर आशीष को पकड़ा जा सके। इसी बीच याकूब बेर्शेबा से निकलकर हारान की ओर चलता है, रास्ते में सूर्य अस्त होने पर एक पत्थर का तकिया बनाकर सो जाता है, और स्वप्न में पृथ्वी से स्वर्ग तक खड़ी एक सीढ़ी देखता है जिस पर परमेश्वर के दूत चढ़ते-उतरते हैं। यहोवा उसके ऊपर खड़े होकर भूमि, वंश और अपनी उपस्थिति का वचन देते हैं। जागकर याकूब डर जाता है, उस स्थान का नाम बेतेल रखता है, पत्थर का खम्भा खड़ा करता है और मन्नत मानता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर किससे और कब बात करते हैं। याकूब उस रात कोई तीर्थयात्री नहीं है; वह भागा हुआ आदमी है, जिसने पिता को धोखा दिया और भाई से जान बचाकर निकला है। उसके पास न वेदी है, न बलिदान, न प्रार्थना; केवल एक पत्थर और थकान। और ठीक इसी जगह स्वर्ग खुल जाता है। वाचा यहाँ इनाम नहीं, दान है। परमेश्वर याकूब के चरित्र पर एक शब्द नहीं कहते, न डाँटते हैं, न शर्तें रखते हैं; वे केवल वचन देते हैं: "मैं तेरे संग रहूँगा, और जहाँ कहीं तू जाए वहाँ तेरी रक्षा करूँगा।" अनुग्रह का यही स्वभाव है कि वह योग्यता की प्रतीक्षा नहीं करता। और ध्यान दीजिए, सीढ़ी पर आवागमन ऊपर से शुरू होता है: मनुष्य स्वर्ग तक चढ़ता नहीं, परमेश्वर पृथ्वी तक उतरते हैं। यह पूरे बाइबल का धर्मशास्त्र एक स्वप्न में सिमटा हुआ है।
जोड़ने वाला सूत्र
बेतेल की सीढ़ी अधूरी है, और यह अधूरापन ही उसका सबसे गहरा संकेत है। स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक रास्ता खुला तो है, पर वह एक भागते हुए आदमी के सपने में खुलता है और सुबह बंद हो जाता है; जो बचता है वह तेल से अभिषिक्त एक पत्थर है। सदियों बाद यीशु मसीह ने नतनएल से कहा कि वह स्वर्ग को खुला और परमेश्वर के दूतों को मनुष्य के पुत्र पर चढ़ते-उतरते देखेगा। यीशु ने सीढ़ी की व्याख्या नहीं की, उन्होंने उसकी जगह ले ली। वाचा का पूरा तर्क यही है: परमेश्वर अपनी उपस्थिति को किसी स्थान से नहीं, अंततः एक व्यक्ति से बाँधते हैं। और "तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे" वह धागा है जो अब्राहम से याकूब होते हुए क्रूस तक और वहाँ से हर जाति तक जाता है।
दर्पण
हम में से अधिकांश लोग परमेश्वर से किसी योजनाबद्ध जगह पर मिलने की उम्मीद रखते हैं: रविवार की आराधना में, किसी शिविर में, किसी शांत सुबह में। याकूब का बेतेल वह जगह है जहाँ आप पहुँचना नहीं चाहते थे। नौकरी छूटने के बाद का खाली दिन, रिश्ता टूटने के बाद का किराए का कमरा, अस्पताल का गलियारा, वह शहर जहाँ आपको मजबूरी में जाना पड़ा। याकूब की गवाही यह नहीं है कि परमेश्वर वहाँ आ गए, बल्कि यह कि परमेश्वर वहाँ पहले से थे और उसे पता नहीं था। यह हमारे अभिमान को भी छूता है: हम सोचते हैं कि पहले खुद को सुधारें, फिर परमेश्वर के पास जाएँ। याकूब के पास सुधारने को कुछ नहीं था, केवल पत्थर था।
आज एक काम कीजिए: जिस जगह आप अभी बैठे हैं उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और उसके नीचे लिखिए, "निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को न जानता था।" फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
एक बारीकी
याकूब की मन्नत में एक छोटा-सा शब्द चुभता है: "यदि"। "यदि परमेश्वर मेरे संग रहकर इस यात्रा में मेरी रक्षा करे… तो यहोवा मेरा परमेश्वर ठहरेगा।" परमेश्वर ने बिना शर्त वचन दिया था, और याकूब शर्त लगाकर जवाब देता है। वह अब भी सौदेबाज़ है; जिस आदमी ने दाल के बदले पहलौठे का अधिकार खरीदा था, वह अब रोटी और कपड़े के बदले भक्ति की पेशकश कर रहा है। बाइबल इसे छिपाती नहीं और सुधारती भी नहीं। यह हमें यह सिखाती है कि अनुग्रह किसी परिपक्व प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा नहीं करता। परमेश्वर याकूब की कमज़ोर, हिसाबी हाँ को भी स्वीकार करते हैं, और अगले बीस वर्षों में उसे धीरे-धीरे ऐसे आदमी में बदलते हैं जो अंत में लंगड़ाता हुआ आशीष माँगेगा।
संदर्भ
यह लगभग 1900 ईसा पूर्व का दक्षिणी कनान है। बेर्शेबा से हारान तक का रास्ता सैकड़ों किलोमीटर का है, और याकूब अकेला चल रहा है, बिना ऊँटों के काफ़िले के, बिना नौकरों के। उस समाज में विवाह व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि कुल की नीति थी; इसहाक का यह आग्रह कि याकूब कनानी लड़की न ब्याहे, नस्लीय घमंड नहीं बल्कि वाचा की पहचान बचाने का प्रयास है। एसाव इसे बाहर से समझता है और इश्माएल के घर से पत्नी ले आता है, यानी सही दिखने वाली चाल चलता है पर गलत शाखा से; वह वंश जिसे परमेश्वर ने वाचा से बाहर रखा था। एक अकेला रात बिताता आदमी जिसके पास सुरक्षा नहीं, और यही वह आदमी है जिससे राष्ट्र निकलेंगे।
अंतर्पाठ
बेतेल को समझने के लिए बाबेल को याद कीजिए। वहाँ लोगों ने ईंटें जोड़कर एक मीनार बनाई जिसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचे, और नाम कमाना चाहा; परिणाम बिखराव था। यहाँ एक अकेला आदमी सो रहा है और परमेश्वर स्वयं वह सीढ़ी दिखाते हैं जिसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचा है, और वादा करते हैं कि उसका वंश चारों दिशाओं में फैलेगा। मनुष्य की चढ़ाई बिखेरती है, परमेश्वर की उतराई फैलाती है। और अब्राहम को दी गई वह पहली बुलाहट, कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे, यहाँ शब्दशः दोहराई जाती है, एक धोखेबाज़ पोते के कान में, ताकि कोई यह न सोचे कि वाचा वंश की योग्यता पर टिकी है।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा "लूज़" अब तक बेतेल नहीं बना, यानी कौन-सी जगह या समय आपको केवल मजबूरी लगती है, जहाँ आपने अब तक परमेश्वर की उपस्थिति नहीं खोजी?
याकूब की मन्नत में "यदि" था। आपकी भक्ति में वह छिपी हुई शर्त क्या है, जिसके पूरा होने पर ही आप परमेश्वर पर पूरा भरोसा करने को तैयार हैं?
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