उत्पत्ति 4:4
पाठ
हाबिल अपनी भेड़-बकरियों के झुंड में से पहलौठे बच्चे चुनकर लाता है, और सिर्फ़ लाता ही नहीं, उनकी चर्बी भी भेंट चढ़ाता है, यानी पशु का वह हिस्सा जो प्राचीन दुनिया में सबसे कीमती और सबसे स्वादिष्ट माना जाता था। वचन कहता है: "तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया।" कल्पना कीजिए उस दृश्य की, कोई मन्दिर नहीं, कोई याजक नहीं, कोई लिखी हुई व्यवस्था नहीं; बस खुले मैदान में पत्थरों का ढेर, जलती लकड़ी, चर्बी के पिघलने की चटचटाहट, और धुएँ की वह गन्ध जो हवा में ऊपर उठती है। दो भाई, दो भेंटें, और एक परमेश्वर जो चुप नहीं रहते। पद पाँच बताता है कि कैन की भेंट के साथ ऐसा नहीं हुआ, और वहीं से त्रासदी शुरू होती है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है: पहले "हाबिल", फिर "उसकी भेंट"। परमेश्वर पहले व्यक्ति को देखते हैं, फिर उसके हाथ में जो है उसे। इब्रानी में जो शब्द यहाँ "ग्रहण किया" के लिए है, वह असल में देखने का शब्द है, किसी की ओर ध्यान से, प्रसन्नता से टकटकी लगाना। यानी बात आग के आसमान से उतरने की नहीं, बात इसकी है कि परमेश्वर का चेहरा किस ओर मुड़ा। और यह मुड़ना कोई यन्त्र नहीं है जिसे सही सामग्री डालकर चलाया जा सके। हाबिल पहलौठे लाया, चर्बी लाया, यानी सबसे अच्छा और सबसे पहला; उसने अपने झुंड का बचा-खुचा नहीं, बल्कि अपना भविष्य परमेश्वर के हाथ में सौंपा। यहाँ आराधना की जड़ खुलती है: परमेश्वर उपहार से पहले उपहार देनेवाले का हृदय देखते हैं, और वे तटस्थ दर्शक नहीं हैं। वे प्रसन्न होते हैं, और यह प्रसन्नता कमाई नहीं, दी जाती है।
जोड़नेवाला धागा
हाबिल का मेमना उस लम्बी कतार में सबसे पहला है जो बाद में इस्राएल के तम्बू और मन्दिर तक जाती है: पहलौठा पशु, चर्बी, धुआँ, और परमेश्वर का ध्यान। पर ध्यान दीजिए कि यहाँ पाप के लिए कोई प्रायश्चित नहीं माँगा जा रहा; यह धन्यवाद और समर्पण की भेंट है, झुंड का पहला और सबसे अच्छा हिस्सा। फिर भी छाया साफ़ है। एक निर्दोष मेमना, एक ऐसा आदमी जो थोड़ी देर बाद खेत में मारा जाएगा, और उसका लहू जो भूमि में से चिल्लाएगा। इब्रानियों की पत्री हाबिल को विश्वास का पहला गवाह कहती है, और आगे चलकर यीशु के लहू को "हाबिल के लहू से उत्तम" बताती है, क्योंकि हाबिल का लहू न्याय माँगता है जबकि मसीह का लहू क्षमा बोलता है। पहला मेमना और आख़िरी मेमना, एक ही धुएँ की रेखा में।
दर्पण
हम में से ज़्यादातर लोग कैन जैसे हैं, बुरे नहीं, बस लापरवाह। कैन ने कुछ चढ़ाया ही तो था; पाठ कहता है "भूमि की उपज में से कुछ", बिना किसी विशेषण के। हाबिल के बारे में तीन शब्द जुड़े हैं: पहलौठे, कई, चर्बी। यही फ़र्क़ हमारी ज़िन्दगी में रोज़ दिखता है। परमेश्वर को हम दिन का वह हिस्सा देते हैं जब आँखें बन्द होने को हैं, आमदनी का वह हिस्सा जो सब बिल चुकाने के बाद बचता है, ध्यान का वह टुकड़ा जो मोबाइल से बचा रह गया। बचा-खुचा भी भेंट है, पर वह हमारे बारे में कुछ कहती है: कि हमने परमेश्वर को अपने भविष्य पर भरोसा करने लायक नहीं समझा। हाबिल ने पहलौठे दिए, यानी वह पशु जिससे आगे का झुंड बनता। आज ही अपना कैलेंडर खोलिए और कल की सुबह का पहला आधा घंटा, फ़ोन छूने से पहले, लिखकर परमेश्वर के नाम अलग कर दीजिए।
प्रश्न
पाठ यह नहीं बताता कि परमेश्वर ने हाबिल को क्यों चुना और कैन को क्यों नहीं। संकेत हैं, पर कोई घोषित कारण नहीं। और यही खटकता है। हम चाहते हैं कि आराधना का एक साफ़ नियम हो: इतना दो, ऐसे दो, और स्वीकृति पक्की। परन्तु उत्पत्ति यह सुविधा नहीं देती। परमेश्वर स्वतन्त्र हैं, और उनकी प्रसन्नता कोई ऐसी मशीन नहीं जिसमें सही सिक्का डालकर सही परिणाम निकाला जा सके। यह अन्याय जैसा लगता है, और इस चुभन को मिटाना ईमानदारी नहीं होगी। पर एक बात रह जाती है: अस्वीकृति के बाद परमेश्वर चुप नहीं होते। वे कैन के पास आते हैं, उससे बात करते हैं, उसे चेतावनी और अवसर दोनों देते हैं। जो ठुकराया गया, उसे छोड़ा नहीं गया। रहस्य बना रहता है, पर वह ठंडा रहस्य नहीं है।
एक ब्योरा
"चर्बी" पर रुकिए। हमारे कानों में यह शब्द लगभग अरुचिकर लगता है, पर प्राचीन दुनिया में यह विलासिता थी। जहाँ लोग अकाल के कगार पर जीते थे, वहाँ चर्बी का अर्थ था प्रचुरता, शक्ति, जीवन का सार। आज कोई अपनी सबसे अच्छी बचत निकाल दे, वैसा। बाद में इस्राएल की व्यवस्था में यही नियम बना कि पशु की चर्बी परमेश्वर की है, इंसान उसे नहीं खाएगा। हाबिल के पास कोई व्यवस्था नहीं थी; उसने वह हिस्सा दिया जो उसकी अपनी जीभ सबसे ज़्यादा चाहती थी। भेंट का असली माप यह नहीं कि आपने क्या दिया, बल्कि यह कि देने के बाद आपको किस चीज़ की कमी खलती है।
पहले सुननेवाले
जो लोग यह कहानी पहली बार सुन रहे थे, वे भेड़-बकरियों के लोग थे, मिस्र से निकले हुए, जिन्हें मिस्रियों ने चरवाहा होने के कारण घृणित समझा था। उनके कानों में "हाबिल भेड़-बकरियों का चरवाहा" कोई तटस्थ जानकारी नहीं थी। और वे उन खेतिहर सभ्यताओं के बीच बसने जा रहे थे जहाँ उर्वरता के देवताओं को अन्न चढ़ाया जाता था। इस कहानी ने उन्हें बताया कि आराधना सिनै पहाड़ से शुरू नहीं हुई; वह मनुष्य के दूसरे ही पीढ़ी में, बिना मन्दिर और बिना याजक के, खुले मैदान में शुरू हुई। और यह भी: छोटा भाई, कमज़ोर भाई, वह जिसका नाम ही "साँस" या "भाप" जैसा है, परमेश्वर की नज़र में पहला ठहरा। एक ऐसी जाति के लिए जो सबसे छोटी और सबसे कमज़ोर थी, यह सुसमाचार था।
चिंतन
आपकी भेंट में "चर्बी" क्या है, यानी वह हिस्सा जिसे देने के बाद आपको सचमुच कमी खलेगी, और आपने उसे अब तक क्यों रोक रखा है?
जब परमेश्वर किसी और की सेवा या जीवन पर स्पष्ट रूप से प्रसन्न दिखते हैं और आपकी ओर चुप लगते हैं, तो आपके भीतर कैन जागता है या हाबिल?
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