उत्पत्ति 4:5
पाठ
हाबिल की भेंट स्वीकार हुई, कैन की नहीं। यही पूरी बात है, और पाठ यह बताने से इनकार कर देता है कि क्यों। इसके बाद जो होता है वह शरीर में दिखता है: कैन के भीतर आग भड़क उठती है और उसका चेहरा गिर जाता है, आँखें ज़मीन पर टिक जाती हैं। मूल इब्रानी में जो शब्द है, वह चेहरे के "गिरने" का है, जैसे कोई पर्दा नीचे आ गिरे। खेत में मेहनत करने वाला वह किसान अपनी उपज लेकर आया था, और खाली लौट रहा है, अपमानित और जलता हुआ।
मूल बात
उस प्राचीन दुनिया में भेंट कोई निजी भक्ति का मामला नहीं थी; वह सार्वजनिक थी। धुआँ सीधा ऊपर उठे या ज़मीन पर बिखर जाए, आग भेंट को पकड़ ले या न पकड़े, यह सब देखने वाली आँखों के सामने होता था। स्वीकृति और अस्वीकृति का मतलब था इज़्ज़त या बेइज़्ज़ती, और इज़्ज़त उस समाज में जीने की मुद्रा थी। इसलिए कैन का क्रोध सिर्फ़ ईर्ष्या नहीं, टूटी हुई प्रतिष्ठा की चीख है। और यहीं पाठ हमें असहज करता है: परमेश्वर स्वतंत्र हैं। वे किसी लेन-देन के नियम से बँधे नहीं कि उपज चढ़ाओ और कृपा खरीद लो। भेंट के पीछे का हृदय उनसे छिपा नहीं, और वे उसे देखते हैं, चाहे हमें वह दिखे या न दिखे।
जोड़ने वाला सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में यह पहला दृश्य है जहाँ आराधना गलत दिशा में मुड़ती है, और ध्यान दीजिए कि परमेश्वर कैन को छोड़ नहीं देते। अस्वीकृति के तुरंत बाद वे उससे बात करते हैं: "तू क्यों क्रोधित हुआ?" यह प्रश्न पूछने वाला परमेश्वर वही है जो अदन में पूछते थे, "तू कहाँ है?" अस्वीकृति के साथ ही चेतावनी आती है, और चेतावनी के साथ ही एक दरवाज़ा खुला रहता है। यही सुसमाचार का आकार है, बहुत दूर से दिखता हुआ। आगे चलकर एक और भाई का लहू ज़मीन पर गिरेगा, पर वह लहू बदले की माँग नहीं करेगा; वह क्षमा माँगेगा। इब्रानियों की पत्री ठीक इसी अंतर की ओर इशारा करती है जब वह हाबिल के लहू और मसीह के लहू को आमने-सामने रखती है। कैन के चेहरे का गिरना और मसीह का गतसमनी में मुँह के बल गिरना, दोनों के बीच पूरी बाइबल खड़ी है।
दर्पण
आपके साथी शिक्षक को वह पद मिल गया जिसके लिए आपने आवेदन किया था। आपकी बहन के बच्चे बोर्ड में अव्वल आए, आपके नहीं। मंडली में किसी और की सेवा की तारीफ़ हुई, और आपने पंद्रह साल चुपचाप कुर्सियाँ लगाई हैं। उस पल में जो होता है, वह ठीक यही है: भीतर आग, और चेहरा गिर जाता है। हम उसे आध्यात्मिक भाषा में ढँक लेते हैं, "मुझे बस दुख है कि सच्चाई की कद्र नहीं होती," पर परमेश्वर कैन से सीधा पूछते हैं, बिना ढँके। ध्यान दीजिए, कैन का पाप अभी हुआ नहीं है; अभी सिर्फ़ चेहरा गिरा है। यहीं वह जगह है जहाँ लड़ाई जीती या हारी जाती है, न कि मैदान में। आज एक काम कीजिए: एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी सफलता से आपका चेहरा गिरता है, और उस नाम को ज़ोर से बोलकर उसके लिए एक वाक्य की आशीष माँगिए।
वचन की गूँज
इसी अध्याय का सातवाँ पद इस दृश्य की सबसे तेज़ रोशनी है: "पाप द्वार पर छिपा रहता है, और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है।" पाप को यहाँ एक जानवर की तरह चित्रित किया गया है जो दरवाज़े के बाहर दुबका बैठा है, घर में घुसने को तैयार। यह उस समय के श्रोताओं के लिए बहुत ठोस चित्र था; रात में तंबू के बाहर सचमुच जानवर बैठे रहते थे। दूसरी गूँज पद दस में है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं, "तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दुहाई दे रहा है!" वही भूमि जिससे कैन ने अपनी भेंट उगाई थी, अब उसके विरुद्ध गवाही देती है। किसान की सबसे प्यारी चीज़ उसका अभियोक्ता बन जाती है।
कठिन प्रश्न
पाठ यह नहीं बताता कि कैन की भेंट क्यों अस्वीकार हुई। हम अनुमान लगाते हैं: हाबिल "पहलौठे बच्चे" और "चर्बी" लाया, यानी सबसे अच्छा; कैन के बारे में सिर्फ़ इतना कि वह "भूमि की उपज में से कुछ" लाया। शायद संकेत यहीं है, पर पाठ इसे कहता नहीं। और यह चुप्पी हमें खलती है, क्योंकि हम चाहते हैं कि नियम साफ़ हों, कि हमें पता हो कि परमेश्वर को कैसे खुश किया जाए। बाइबल यह सुविधा नहीं देती। वह हमें एक ऐसे परमेश्वर के सामने खड़ा करती है जो स्वतंत्र हैं, और यह स्वतंत्रता डरावनी लगती है जब तक हम यह न देख लें कि यही स्वतंत्रता कैन को भी हत्या के बाद एक चिन्ह देकर बचाती है। रहस्य दोनों तरफ़ काम करता है: अस्वीकृति में भी, और अनुग्रह में भी।
पृष्ठभूमि
यह कहानी उस दुनिया में रची गई जहाँ खेती करने वाले और भेड़ चराने वाले साथ-साथ, और अक्सर तनाव में रहते थे। किसान ज़मीन से बँधा था, चरवाहा घूमता था; कुएँ और चरागाह को लेकर झगड़े आम थे। पहले श्रोताओं ने इस दृश्य में कोई अजनबी बात नहीं देखी होगी। भेंट चढ़ाना पारिवारिक और सामुदायिक जीवन का केंद्र था, धुएँ की गंध, जलती चर्बी, इकट्ठे लोग। और भाइयों के बीच पहलौठे का हक़ कितना भारी होता था, यह भी वे जानते थे। कैन पहलौठा है, नाम में ही माँ का उत्साह है, और फिर भी छोटे भाई को स्वीकृति मिलती है। यह पैटर्न आगे इसहाक, याकूब, यूसुफ़ और दाऊद तक दोहराया जाएगा। परमेश्वर बार-बार समाज की क्रम-सूची को उलटते हैं, और वह उलटफेर हर बार किसी न किसी के चेहरे को गिराता है।
मनन के लिए
कैन के पास चेतावनी और परमेश्वर का सवाल दोनों थे, फिर भी वह मैदान तक पहुँच गया। आपके जीवन में वह "दरवाज़ा" कहाँ है जहाँ पाप अभी बाहर ही बैठा है, भीतर नहीं आया?
आप परमेश्वर के सामने क्या लेकर आते हैं, "कुछ उपज" या "पहलौठे"? और यह अंतर आपके समय, पैसे और ध्यान में कहाँ दिखता है?
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