इब्रानियों 5:7
पाठ
एक ही लंबी साँस में लिखा गया वाक्य: यीशु ने, जब वे देह में इस धरती पर थे, उससे प्रार्थना की जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, और यह प्रार्थना दबी हुई फुसफुसाहट नहीं थी, बल्कि ऊँची चीख और बहते आँसुओं के साथ की गई गुहार थी। और फिर वह चौंकाने वाला अंत: "भक्ति के कारण उसकी सुनी गई।" सुन ली गई, फिर भी वे मरे।
मर्म
यहाँ मसीह की महायाजकता की नींव रखी जा रही है, और वह नींव है उनकी कमज़ोरी। पद 2 में लेखक कह चुका है कि सच्चा महायाजक वही है जो "आप भी निर्बलता से घिरा है"; अब वह दिखाता है कि यीशु इस शर्त पर खरे उतरते हैं। परमेश्वर का पुत्र होना उन्हें आँसुओं से छूट नहीं देता। और सुने जाने का अर्थ यह नहीं कि जो माँगा वही मिला। परमेश्वर ने उन्हें मृत्यु से नहीं बचाया, मृत्यु के आर-पार ले गए। यह प्रार्थना की हमारी सारी गणित को उलट देता है: उत्तर मिलने का प्रमाण परिस्थिति का बदलना नहीं, बल्कि पुत्र का पिता के हाथों में बना रहना है।
सूत्र
पुराने नियम का याजक बलि लाता था; यह याजक स्वयं बलि है, और वेदी तक जाते हुए रोता है। यशायाह 53 का वह दुखी, तिरस्कृत सेवक यहाँ फिर दिखाई देता है, वह जो चुपचाप नहीं, बल्कि पीड़ा में परमेश्वर के सामने खड़ा होता है। परमेश्वर की छुटकारे की कहानी में यह क्षण मोड़ है: हारून की वंशपरंपरा में योग्यता जन्म से आती थी, मसीह की योग्यता दुःख से आई। इसीलिए अगला पद कहता है कि उन्होंने "दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी" और तब जाकर "सदाकाल के उद्धार का कारण" बने। हमारा उद्धार किसी वंशावली पर नहीं, गतसमनी की उस रात पर टिका है।
दर्पण
आपने भी शायद ऐसी प्रार्थना की है जो सुनी नहीं गई, कम से कम आपकी शर्तों पर नहीं। रिपोर्ट वैसी ही आई। नौकरी नहीं बची। बेटा लौटकर नहीं आया। और कहीं भीतर यह संदेह बैठ गया कि शायद मेरी प्रार्थना में कुछ कमी थी, विश्वास कम था, शब्द गलत थे। यह पद उस संदेह को काट देता है। यीशु की प्रार्थना में न विश्वास की कमी थी न भक्ति की, फिर भी क्रूस टला नहीं। सुने जाने का मतलब है कि परमेश्वर की गोद में आपकी चीख गिरी नहीं, चाहे आपकी परिस्थिति न बदली हो। और ध्यान दीजिए, यीशु ने चुपचाप सहा नहीं; उन्होंने ऊँचे शब्द से पुकारा। आज, किसी बंद कमरे में या गाड़ी में, वह एक प्रार्थना ज़ोर से, सचमुच आवाज़ निकालकर कहिए जिसे आप महीनों से मन ही मन दबाए बैठे हैं।
विवरण
"प्रार्थनाएँ और विनती" में जो दूसरा शब्द है, यूनानी में वह है हिकेतेरिया, और यह साधारण विनती नहीं। प्राचीन संसार में जो व्यक्ति किसी राजा या देवता के सामने अपनी जान की भीख माँगने आता था, वह हाथ में जैतून की एक डाली लेकर आता था, गिड़गिड़ाने वाले का चिह्न। शब्द उसी डाली से बना है। यानी यीशु यहाँ अधिकार से नहीं, याचक की मुद्रा में खड़े हैं, खाली हाथ, बस डाली थामे। जो पद 5 में परमेश्वर का पुत्र कहलाया, वही पद 7 में भिखारी की तरह घुटनों पर है। इब्रानियों का लेखक इस विरोधाभास को नरम नहीं करता; वही उसका तर्क है।
संदर्भ
यह पत्र उन मसीहियों के लिए है जो दूसरी पीढ़ी में हैं, जिन पर सामाजिक दबाव है, जिनकी संपत्ति लूटी जा चुकी है, और जो चुपचाप पुरानी, सुरक्षित, सम्मानित यहूदी उपासना की ओर खिसक रहे हैं। वहाँ मंदिर था, दिखने वाले याजक थे, धूप का धुआँ था। यहाँ क्या था? एक क्रूस पर मरा हुआ गलीली, जो लेवी के गोत्र का भी नहीं था। लेखक जानता है कि उसके पाठक "ऊँचा सुनने लगे हो" (पद 11), थके हुए, सुन्न। इसलिए वह उन्हें कोई नई ऊँचाई नहीं दिखाता, बल्कि उनके महायाजक के आँसू दिखाता है, ताकि वे समझें कि जिस दुःख में वे हैं, वह उसमें पहले से बैठा है।
अन्तर्पाठ
सबसे स्पष्ट गूँज गतसमनी की है, जहाँ मरकुस और लूका यीशु को भूमि पर गिरे, व्याकुल, कटोरे को टालने की प्रार्थना करते दिखाते हैं। पर एक तनाव भी है, और उसे छिपाना बेईमानी होगी: यूहन्ना 12 में यीशु साफ़ कहते हैं कि वे यह प्रार्थना नहीं करेंगे कि पिता उन्हें इस घड़ी से बचाएँ। दो चित्र, एक ही व्यक्ति। इब्रानियों का लेखक दोनों को साथ रखता है: सचमुच की गुहार, और उसी साँस में पूरा समर्पण। "भक्ति के कारण" यही जोड़ है।
दूसरी गूँज भजनों की है। भजन 116 का गायक कहता है कि मृत्यु की रस्सियों ने उसे घेर लिया, उसने पुकारा, और परमेश्वर ने सुना। इब्रानियों का यह पद उसी भाषा में लिखा गया लगता है, पर एक अंतर के साथ: भजनकार मृत्यु से बचा लिया गया, यीशु मृत्यु में से निकाले गए। पुनरुत्थान ही उस रात की प्रार्थना का उत्तर है, देर से मिला, पर पूरा।
चिंतन
आपकी कौन-सी प्रार्थना "अनसुनी" लगती है, और यदि सुने जाने का अर्थ परिस्थिति का बदलना नहीं है, तो उस प्रार्थना को आप आज कैसे दोहराएँगे?
मसीह के आँसू आपके अपने दुःख को किस तरह बदलकर देखने के लिए कहते हैं: कम अकेला, या कम शर्मनाक?
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Hebrews 5:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 5:7 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 5:7 किस विषय में है?
इब्रानियों 5:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 5:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 5:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
याजक की योग्यता उसकी मजबूती नहीं, उसकी कमज़ोरी थी। "वह अज्ञानियों, और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता है, इसलिए कि वह आप भी निर्बलता से घिरा है।" जिस गिरावट पर तू आज शर्मिंदा है, शायद वही तुझे किसी गिरे हुए के पास चुपचाप बैठना सिखाएगी। और जब दिल किसी पर कठोर हो जाए, तो समझ लेना कि हम अपनी ही निर्बलता भूल बैठे हैं।
वह पुत्र तो था, तो भी उसने दुःख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी।" पुत्र होना दुःख से छूट का प्रमाणपत्र नहीं था। यीशु ने आज्ञाकारिता किताबों से नहीं, गतसमनी के पसीने और आँसुओं से सीखी। तो जब तेरी प्रार्थना का जवाब राहत नहीं, बल्कि एक और कठिन दिन होता है, तब सोच: शायद पिता तुझे छोड़ नहीं रहा, सिखा रहा है।
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