फिलिप्पियों 4
पाठ
फिलिप्पी में एक घर, शायद शाम, और चिट्ठी ऊँची आवाज़ में पढ़ी जा रही है। पढ़ने वाला दो नाम बोलता है, यूओदिया और सुन्तुखे, और कमरे में बैठी दो स्त्रियाँ अचानक सबकी निगाहों के बीच आ जाती हैं। इसके बाद पौलुस बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता है: आनन्द, कोमलता, "प्रभु निकट है", चिन्ता की जगह प्रार्थना, और वह शान्ति जो समझ से परे है। फिर वह अपनी ज़ंजीरों से बताता है कि उसने भूखा रहना और तृप्त होना, दोनों सीख लिया है। अन्त में वह उनके भेजे उपहार के लिये धन्यवाद देता है, उसे परमेश्वर को भाता बलिदान कहता है, और कैसर के घराने के विश्वासियों का नमस्कार भेजकर चिट्ठी बन्द करता है।
हृदय
ध्यान दीजिए कि पौलुस कहाँ बैठकर लिख रहा है। उसके पास एक रोमी सिपाही पहरे पर है। और वही आदमी लिखता है कि परमेश्वर की शान्ति "तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" यहाँ जो यूनानी शब्द है, फ्रूरेओ, वह सैनिक पहरे का शब्द है: चौकी पर खड़ा रहना, फाटक की रखवाली करना। पौलुस पर पहरा एक सिपाही का है, फिलिप्पियों के हृदय पर पहरा परमेश्वर की शान्ति का। यह शान्ति भावना नहीं है जो हालात बदलने पर आती है; यह एक चौकीदार है जो तब भी खड़ा रहता है जब भीतर सब हिल रहा हो। इसलिए पौलुस चिन्ता का इलाज सकारात्मक सोच नहीं, बल्कि "धन्यवाद के साथ" परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित होना बताता है।
जोड़ने वाला सूत्र
सबसे चौंकाने वाली बात पद 18 में है। फिलिप्पियों ने इपफ्रुदीतुस के हाथ पैसा और सामान भेजा, और पौलुस उसे "सुखदायक सुगन्ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान" कहता है। यह मन्दिर की भाषा है, वेदी की भाषा, जो पुराने नियम में होमबलि की सुगन्ध के लिये इस्तेमाल होती थी। यरूशलेम में वेदी अब भी जल रही थी, फिर भी पौलुस कहता है कि परमेश्वर की नाक तक पहुँचने वाली सुगन्ध मकिदुनिया के गरीब विश्वासियों की उदारता है। ऐसा वह इसलिए कह सकता है क्योंकि असली बलिदान मसीह में एक बार चढ़ चुका है; अब हमारे दिये हुए पैसे, हमारा साथ देना, हमारी छोटी कुर्बानियाँ उस एक बलिदान की धारा में बह जाती हैं और स्वीकार की जाती हैं।
दर्पण
"मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ।" सीखा है, यानी यह उसके स्वभाव में नहीं था। हमारा असन्तोष अमूर्त नहीं होता: वह उस सहकर्मी की तरक्की में दिखता है, उस रिश्तेदार के नए घर में, बच्चे के स्कूल की फीस के बिल में, रात दो बजे उस मैसेज में जिसका जवाब नहीं आया। और यूओदिया और सुन्तुखे बताती हैं कि आत्मिक लोग भी सालों तक एक-दूसरे से कट कर रह सकते हैं, और पूरी कलीसिया उसे सहती रहती है। पौलुस दोनों घावों पर एक ही मरहम रखता है: परमेश्वर के सम्मुख धन्यवाद के साथ खुलकर बोलना।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर अपनी सबसे बड़ी चिन्ता एक वाक्य में लिखिए, उसके नीचे उसी बात से जुड़ा एक धन्यवाद लिखिए, और दोनों वाक्य ऊँची आवाज़ में परमेश्वर के सामने पढ़िए।
कठिन प्रश्न
"किसी भी बात की चिन्ता मत करो" यह आज्ञा उस व्यक्ति को कैसी लगती है जिसकी छाती सुबह उठते ही जकड़ जाती है? क्या पौलुस भावनाओं पर हुक्म चला रहा है? ईमानदारी से कहें तो यह पद अक्सर पीड़ितों के हाथ में डंडा बन जाता है। ध्यान दीजिए, पौलुस यह वादा नहीं करता कि तुम्हें शान्ति महसूस होगी; वह कहता है कि शान्ति पहरा देगी, और यह शान्ति "सारी समझ से बिलकुल परे" है, यानी वह हमारी समझ में भी नहीं आती और हमारी नापने की क्षमता से भी बाहर है। और पद 13 का "सब कुछ कर सकता हूँ" सफलता का नारा नहीं, भूख सहने की ताक़त है। कुछ लोगों के लिये चिन्ता आख़िर तक साथी बनी रहती है; पौलुस उनसे बस इतना कहता है कि उसे अकेले न ढोओ।
पहले पाठक
फिलिप्पी रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ रोमी नागरिकता का घमंड हवा में था। ऐसे लोगों ने सुना: "प्रभु निकट है", और उन्हें पता था कि "प्रभु" कैसर का ख़िताब भी है। फिर चिट्ठी के अन्त में वह चोट: "विशेष करके जो कैसर के घराने के हैं", यानी सम्राट के महल के दास और कर्मचारी भी अब मसीह के हैं। इस कलीसिया के पास पैसा ज़्यादा नहीं था, फिर भी थिस्सलुनीके में पौलुस को उन्होंने "एक बार क्या वरन् दो बार" भेजा। और यह कलीसिया दो स्त्रियों के नाम सुनकर चौंकी नहीं होगी, क्योंकि यहाँ शुरुआत से स्त्रियों ने सुसमाचार में "परिश्रम किया" था।
मुख्य पात्र
पौलुस को इस अध्याय में देखिए और उसकी मानवीयता चुभती है। वह लोगों का भूखा आदमी है: "मेरे आनन्द और मुकुट", वह लिखता है, जैसे कोई पिता बच्चों की तस्वीर सीने से लगाए। पैसे के मामले में वह अजीब तरह से नाज़ुक है, बार-बार सफ़ाई देता है, "यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ", क्योंकि वह जानता है कि माँगने और भीख माँगने के बीच की रेखा पतली है। वह मानता है कि उसे उनके भेजे उपहार से सुख मिला, और साथ ही कहता है कि उसकी घटी उसकी मालिक नहीं है। यह आदमी न पत्थर है न कातर; वह सीखा हुआ है। और उसका आख़िरी वाक्य अपनी ताक़त पर नहीं टिकता: "हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह तुम्हारी आत्मा के साथ रहे।"
चिंतन
आपके जीवन में सन्तोष अब तक "स्वभाव" का सवाल रहा है या "सीखने" का, और पिछले साल आपने वह किस परिस्थिति में सीखा?
कलीसिया या परिवार में कौन सा टूटा रिश्ता है जिसे सब देखते हैं पर कोई नाम लेकर नहीं बोलता, और आप उसमें "सच्चे सहकर्मी" की भूमिका कैसे निभा सकते हैं?
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Philippians 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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फिलिप्पियों 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Philippians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आज मेरे पास "सब कुछ है, बल्कि बहुतायत से भी है।" उन भाई बहनों के लिए धन्यवाद जिन्होंने अपने हाथों से मेरी ज़रूरत पूरी की। और धन्यवाद कि हमारा छोटा सा देना भी आपके सामने सुगन्ध और ग्रहण करने योग्य बलिदान बन जाता है।
पौलुस यह चिट्ठी जेल से लिख रहा है। चारों ओर जंजीरें और अनिश्चितता, फिर भी वह कहता है, "जो बातें सुहावनी हैं, जो बातें मनभावनी हैं... इन्हीं बातों पर ध्यान लगाया करो।" ध्यान लगाना अपने आप नहीं होता, वह एक चुनाव है। आज रात सोने से पहले तेरा मन किस बात को बार बार दोहराएगा? वही चीज़ धीरे धीरे तुझे गढ़ती जाएगी।
पिता, धन्यवाद कि आप ही मुझे सामर्थ्य देते हैं। जो काम मेरे अपने बल से नहीं होते, वे आपकी शक्ति में पूरे हो जाते हैं। थकान भरे दिनों में, कमी में भी और बहुतायत में भी, आपने मुझे थामे रखा। यही भरोसा मेरा सहारा है।
पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे अकेले नहीं छोड़ा, बल्कि ऐसे साथी दिए जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। मुझे भी किसी का सहारा बनना सिखाइए, चुपचाप, बिना नाम की चाह के। यह जानना ही काफी है कि मेरा नाम आपके पास लिखा है।
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