होशे 14
पाठ
होशे की पुस्तक का अंतिम अध्याय एक अनोखे उपकार से शुरू होता है: परमेश्वर भटके हुए इस्राएल को केवल लौटने का बुलावा नहीं देते, वे लौटने के शब्द भी हाथ में थमा देते हैं। "बातें सीखकर और यहोवा की ओर लौटकर, उससे कह" ऐसा कहकर वे प्रजा को उसकी अपनी प्रार्थना सिखाते हैं: अश्शूर नहीं बचाएगा, घोड़े नहीं बचाएँगे, अपने हाथ की बनाई मूरतें ईश्वर नहीं हैं। और उत्तर में परमेश्वर राजनीति की भाषा छोड़कर बागवानी की भाषा बोलते हैं: ओस, सोसन, लबानोन की जड़ें, जैतून की शोभा, दाखलता का फल। अंत में एक शांत चेतावनी टिकी रह जाती है: उसी सीधे मार्ग पर धर्मी चलते हैं और अपराधी ठोकर खाते हैं।
मर्म
पद 4 में एक वाक्य है जिसके सामने देर तक चुप रहना पड़ता है: "मैं सेंत-मेंत उनसे प्रेम करूँगा।" सेंत-मेंत, यानी बिना दाम, बिना कारण, बिना इस शर्त के कि पहले तुम सुधर जाओ। और उससे पहले जो कहा गया है वह उतना ही चौंकाने वाला है: "मैं उनकी भटक जाने की आदत को दूर करूँगा।" पाप यहाँ केवल गलत कामों की सूची नहीं, एक आदत है, एक झुकाव, एक बीमारी जो व्यक्ति खुद अपने भीतर से नहीं निकाल सकता। इसलिए यह अध्याय मनुष्य के संकल्प पर नहीं, परमेश्वर की चिकित्सा पर टिका है। पश्चाताप के शब्द भी वही सिखाते हैं, और भटकने की जड़ भी वही काटते हैं। अनुग्रह पहले आता है; हमारा लौटना उसका उत्तर है, उसकी कीमत नहीं।
सूत्र
पद 2 में जो माँगा जाता है वह विचित्र है: "तब हम धन्यवाद रूपी बलि चढ़ाएँगे।" बैल नहीं, भेड़ नहीं, होंठों का फल। इब्रानियों 13:15 इसी को उठाकर मसीह के लोगों के होंठों पर रख देता है, क्योंकि मन्दिर की वेदी पर जो चढ़ाया जाना था वह मसीह में एक बार में चढ़ चुका। होशे के आँगन में ही यह बीज पड़ा है: परमेश्वर के पास लौटने के लिए हमारे पास देने योग्य कुछ नहीं, सिवाय स्वीकारोक्ति और धन्यवाद के। और पद 8 का "मुझी से तू फल पाया करेगा" उस वाणी की पूर्वछाया है जो बाद में कहेगी कि डाली बेल में रहे बिना फल नहीं लाती। फल कभी हमारा उत्पाद नहीं, सदा किसी और की जड़ का काम है।
दर्पण
अश्शूर और घोड़े आज भी हमारे पास हैं, बस नाम बदल गए हैं। अश्शूर वह बड़ा नाम है जिसके सहारे हम अपनी नौकरी सुरक्षित मानते हैं; घोड़े वे क्षमताएँ हैं जिनके बल पर हम मान लेते हैं कि परिवार की गाड़ी चलती रहेगी। बीमा, बचत, संपर्क, प्रतिष्ठा, अनुभव, ये बुरे नहीं हैं, पर जिस क्षण हम इन्हें अपना उद्धार मानते हैं, हम उनसे कहने लगते हैं "तुम हमारे ईश्वर हो" और अपने ही हाथ की बनाई चीज़ की पूजा करने लगते हैं। इस्राएल की स्वीकारोक्ति में एक शब्द चुभता है: "अनाथ।" परमेश्वर उन्हीं पर दया करते हैं जिनके पास पीठ थपथपाने वाला कोई नहीं बचा। आज ही एक कागज़ पर उस एक नाम को लिखिए जिसे आप चुपचाप अपनी सुरक्षा मानते हैं, और उसके सामने पद 3 के शब्द ऊँची आवाज़ में बोलिए।
पहले सुननेवाले
ये शब्द आठवीं सदी ईसा पूर्व के उत्तरी राज्य में बोले गए, जब अश्शूर की छाया रोज़ लंबी हो रही थी और शमरिया के राजा कर देकर, संधियाँ करके, कभी मिस्र की तरफ आँख मारकर जीने की कोशिश कर रहे थे। "अश्शूर हमारा उद्धार न करेगा" सुनना उनके लिए धार्मिक बात नहीं, राजद्रोह जैसी बात थी; यह पूरी विदेश नीति को कूड़े में फेंक देना था। और "अनाथ" कहना उन लोगों के मुँह में सबसे कड़वा शब्द था, क्योंकि प्राचीन संसार में अनाथ का अर्थ था: कोई संरक्षक नहीं, कोई अदालत नहीं, कोई भविष्य नहीं। लबानोन का ज़िक्र भी उनके कानों में चुभता होगा, क्योंकि लबानोन के देवदार साम्राज्यों के महलों की शान थे। परमेश्वर कहते हैं: वह विदेशी वैभव अब तुम्हारी जड़ों का वर्णन होगा।
एक बारीकी
पद 8 का आधा वाक्य आसानी से फिसल जाता है: "मैं हरे सनोवर सा हूँ।" पूरी पुस्तक में होशे ने ऊँचे स्थानों और हरे पेड़ों के नीचे की उपासना की भर्त्सना की है, और अब परमेश्वर स्वयं को एक सदाबहार पेड़ कहते हैं। वे उस छवि को छीन लेते हैं जिसे मूरतों ने कब्ज़े में रखा था, और अपने ऊपर लगा लेते हैं। पर ध्यान दीजिए, सनोवर फलदार वृक्ष नहीं है। "मुझी से तू फल पाया करेगा" कहते हुए परमेश्वर वनस्पति-शास्त्र तोड़ देते हैं: फल पेड़ की प्रकृति से नहीं, देनेवाले के वचन से आता है। जहाँ मनुष्य छाया ढूँढ़ता है, वहाँ परमेश्वर छाया और फल दोनों देते हैं, और यह वह चीज़ है जो कोई मूरत कभी नहीं कर सकी।
मुख्य पात्र
यहाँ मुख्य पात्र वही हैं जिनका क्रोध "उन पर से उतर गया" है। होशे की पूरी पुस्तक परमेश्वर के भीतर के तूफान का दस्तावेज़ है: विश्वासघात पर जलन, न्याय की गर्जन, और फिर वही आवाज़ जो कहती है कि मैं ओस के समान होऊँगा। ओस पर ठहरिए। ओस शोर नहीं करती, रात में चुपचाप उतरती है, दोपहर तक सूख जाती है, और फिर भी सोसन के फूलने के लिए काफी होती है। जो परमेश्वर तूफान बन सकते थे, वे ओस बनकर आते हैं। और पद 9 में वे अपनी बात को खुला छोड़ देते हैं, कोई गारंटी नहीं देते: वही सीधा मार्ग किसी के लिए चलने की जगह है और किसी के लिए ठोकर। यह रहस्य होशे बंद नहीं करता, और हमें भी बंद करने की अनुमति नहीं देता।
चिंतन के प्रश्न
परमेश्वर ने इस्राएल को उसकी प्रार्थना के शब्द सिखाए। आपकी प्रार्थना में कौन-सा वाक्य ऐसा है जिसे आपने खुद गढ़ा है, और कौन-सा ऐसा जो परमेश्वर ने आपके मुँह में रखा है?
यदि "भटक जाने की आदत" आपके भीतर से केवल परमेश्वर ही निकाल सकते हैं, तो आपका पश्चाताप किस रूप में बदल जाएगा: कोशिश, या समर्पण?
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Hosea 14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
होशे 14 का क्या अर्थ है?
होशे 14 किस विषय में है?
होशे 14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
होशे 14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
होशे 14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hosea 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आप हरे सनोवर के समान हैं और आपकी छाया में मुझे विश्राम मिलता है। धन्यवाद कि मेरा फल मूरतों से नहीं, आप ही से मिलता है। आपने मेरी सुन ली और आपकी दृष्टि मुझ पर बनी रहती है, यही मेरे मन का सहारा है।
पिता, मैं खाली हाथ तेरी ओर लौट रहा हूँ, बस कुछ टूटे से शब्द लेकर। जो मेरे भीतर गलत है उसे हटा दे और मुझे फिर से अपना ले। मेरे होंठों से जो निकले, वह तेरे लिए धन्यवाद की भेंट बन जाए।
पिता, धन्यवाद कि आप मेरे लिए ओस के समान हैं। चुपचाप, हर सुबह आप मेरे सूखे मन को तर करते हैं। धन्यवाद कि आपकी नमी से मैं सोसन के समान फूलता हूँ और लबानोन के समान मेरी जड़ें गहरी होती जाती हैं।
पिता, मेरा मन बार बार भटक जाता है, और मैं थक गया हूँ खुद को सुधारने की कोशिश करते करते। तू ही मेरे भीतर की इस बीमारी को चंगा कर। तेरा प्रेम मैंने कमाया नहीं, फिर भी तू मुझे बिना शर्त अपनाता है। इसी प्रेम में मुझे थामे रख।
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