बाइबल व्याख्या

इब्रानियों 13:15

बाइबल

पाठ

इसी कारण, लेखक कहता है, हम परमेश्वर के सामने एक बलिदान लेकर आएँ, पर खून और पशु का नहीं: स्तुति का। यह बलिदान "उसके द्वारा", यानी यीशु मसीह के माध्यम से चढ़ाया जाता है, क्योंकि वही अकेला याजक है जो हमें भीतर ले जाता है। और इस बलिदान का रूप क्या है? "उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं।" यह कोई मौसमी काम नहीं, कोई रविवार की रस्म नहीं, बल्कि "सर्वदा" चलता रहने वाला अर्पण है। बारहवें और तेरहवें पद में यीशु फाटक के बाहर दुःख उठाते हैं और हमें बुलाते हैं; पंद्रहवाँ पद बताता है कि वहाँ, छावनी के बाहर, बेघर लोगों के पास भी एक वेदी है, और उस पर रखने को हमारे पास होंठ हैं।

मूल मर्म

यहाँ पूरी बलिदान-व्यवस्था का रुख बदल जाता है। पुराने नियम में उपासक कुछ लाता था ताकि परमेश्वर के पास पहुँच सके; यहाँ उपासक इसलिए कुछ लाता है क्योंकि पहुँच पहले ही दी जा चुकी है। "इसलिए" शब्द पर ध्यान दीजिए: यह पद अपने से पहले आए सब कुछ पर टिका है, यीशु के लहू पर, उनके अपमान पर, उस आने वाले नगर पर। अनुग्रह पहले, अर्पण बाद में, और कभी उल्टा नहीं। और फिर भी इसे "बलिदान" कहा गया है, क्योंकि स्तुति सस्ती चीज़ नहीं। जब नौकरी छूट गई हो, जब शरीर धोखा दे रहा हो, जब विश्वास के कारण आपका नाम हँसी का विषय बना हो, तब उनके नाम का अंगीकार करना सचमुच कुछ चुकाना है। यही वह पवित्रता है जो मसीह ने अपने लहू से खरीदी: एक ऐसा मुँह जो परमेश्वर को सच बोलकर लौटाता है।

जोड़ने वाला सूत्र

हाबिल से लेकर अंतिम नगर तक, परमेश्वर की कहानी में हमेशा कोई न कोई वेदी खड़ी रही है। मूसा की व्यवस्था ने उस वेदी को क्रम दिया, याजक दिए, लहू दिया, पर एक भी बलिदान आख़िरी नहीं था; हर साल फिर से। भविष्यवक्ता पहले ही संकेत दे चुके थे कि परमेश्वर को माँस की भूख नहीं, लौटे हुए मन की चाह है, और होशे ने पश्चात्ताप करती इस्राएल के हाथ में बैल नहीं, शब्द थमाए थे। इब्रानियों का लेखक उसी धागे को खींचकर क्रूस पर बाँधता है: चूँकि यीशु ने "फाटक के बाहर दुःख उठाया", अब बलिदान की भाषा बदल गई है। हमारा अर्पण उनके अर्पण की प्रतिध्वनि है, कारण नहीं। और यह धागा वहीं जाकर खुलता है जहाँ "आनेवाले नगर" में स्तुति ही एकमात्र बची हुई सेवा होगी।

दर्पण

ईमानदारी से सोचिए कि आपके होंठ दिन भर किसका फल उगाते हैं। दफ़्तर में वेतन पर कुड़कुड़ाहट, घर में रिश्तेदारों की तुलना, मंडली में अगुओं के बारे में आधी सच्ची बातें। यह पद उस जगह चुभता है, क्योंकि जिस लोभ और असंतोष के विरुद्ध पाँचवाँ पद चेतावनी देता है, वह सबसे पहले जीभ पर प्रकट होता है। हम अक्सर स्तुति को भावना समझते हैं और इंतज़ार करते हैं कि मन ठीक हो तब मुँह खुलेगा; पर यहाँ स्तुति अंगीकार है, यानी परमेश्वर के बारे में सच बोलना, चाहे परिस्थिति उसका समर्थन करे या न करे। और यह महँगा पड़ता है, ख़ासकर वहाँ जहाँ मसीह का नाम लेने से लोग दूरी बना लेते हैं। आज सोने से पहले, ऊँची आवाज़ में, सुनाई देने वाले शब्दों में एक वाक्य कहिए: "यीशु मसीह प्रभु हैं, और उन्होंने मुझे अपने लहू से पवित्र किया है।" बस एक वाक्य, मन के मानने का इंतज़ार किए बिना।

संदर्भ

ये पाठक यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जिन्होंने विश्वास के कारण बहुत कुछ खो दिया था: सामाजिक इज़्ज़त, सम्पत्ति, कुछ के अपने लोग जेल में थे। उनके आसपास की दुनिया में धर्म का मतलब था मंदिर, याजक, धुआँ, दिखाई देने वाली वेदी। उनके पास इनमें से कुछ नहीं था, और उन पर ताना यही था कि तुम्हारा कोई बलिदान ही नहीं। लेखक इस अपमान को उलट देता है: तुम्हारी एक वेदी है, और वह छावनी के बाहर है, वहीं जहाँ पापबलि के पशुओं की देह जलाई जाती थी, वहीं जहाँ यीशु को निकाल दिया गया। बेदखल लोगों की उपासना बेदखल किए गए मसीहा के पास होती है, और उनका एकमात्र चढ़ावा उनकी ज़बान है।

अंतर्पाठ

पद के साथ दिए गए संदर्भ अपने आप बोलते हैं। भजन 50 में परमेश्वर कहते हैं कि उन्हें पशुओं की ज़रूरत नहीं, पर स्तुति का बलिदान चढ़ाने वाला उनका आदर करता है; होशे 14 में पछतावा करती इस्राएल खाली हाथ आती है और शब्द लेकर आती है। इब्रानियों का लेखक इन्हें केवल दोहराता नहीं, पूरा करता है, क्योंकि अब यह अर्पण "उसके द्वारा" जाता है। और तुरंत अगला पद इसे ज़मीन पर उतार देता है: "पर भलाई करना, और उदारता न भूलो; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है।" होठों का फल और हाथों का फल एक ही वेदी पर रखे जाते हैं। जो मुँह परमेश्वर की स्तुति करता है और पड़ोसी की ज़रूरत पर बंद रहता है, वह आधा बलिदान है, यानी कोई बलिदान नहीं।

कठिन प्रश्न

"सर्वदा" शब्द गले में अटकता है। क़ब्र के किनारे खड़े आदमी से, या उस माँ से जिसका बच्चा नहीं रहा, क्या सचमुच यही माँगा जा रहा है? पाठ इसे आसान नहीं करता और हमें भी नहीं करना चाहिए। पर ध्यान दीजिए कि यहाँ भावना की नहीं, अंगीकार की माँग है: उनके नाम को सच मानकर कहना, तब भी जब भीतर कुछ भी नहीं गा रहा। कभी-कभी यह बलिदान इतना भारी होता है कि एक व्यक्ति उसे अकेले नहीं उठा सकता, और तब मंडली उसके लिए गाती है जब तक उसकी आवाज़ लौट न आए। यह रहस्य बना रहता है कि परमेश्वर टूटे हुए होठों की लड़खड़ाती स्तुति को क्यों इतना मूल्यवान समझते हैं। पर वे समझते हैं, और शायद उसी को सबसे अधिक।

चिंतन

पिछले हफ़्ते मेरे होठों ने जो फल सबसे ज़्यादा उगाया, वह शिकायत था या अंगीकार, और यह मेरे भीतर के किस असंतोष को उजागर करता है?

मैं किसे जानता हूँ जिसकी स्तुति इस समय थम गई है, और इस सप्ताह मैं उसके लिए कैसे गा सकता हूँ, शब्दों से या भलाई से?

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Hebrews 13:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

इब्रानियों 13:15 का क्या अर्थ है?
इसी कारण, लेखक कहता है, हम परमेश्वर के सामने एक बलिदान लेकर आएँ, पर खून और पशु का नहीं: स्तुति का। यह बलिदान "उसके द्वारा", यानी यीशु मसीह के माध्यम से चढ़ाया जाता है, क्योंकि वही अकेला याजक है जो हमें भीतर ले जाता है। और इस बलिदान का रूप क्या है? "उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं।" यह कोई मौसमी काम नहीं, कोई रविवार की रस्म नहीं, बल्कि "सर्वदा" चलता रहने वाला अर्पण है। बारहवें और तेरहवें पद में यीशु फाटक के बाहर दुःख उठाते हैं और हमें बुलाते हैं; पंद्रहवाँ पद बताता है कि वहाँ, छावनी के बाहर, बेघर लोगों के पास भी एक वेदी है, और उस पर रखने को हमारे पास होंठ हैं।
इब्रानियों 13:15 किस विषय में है?
हाबिल से लेकर अंतिम नगर तक, परमेश्वर की कहानी में हमेशा कोई न कोई वेदी खड़ी रही है। मूसा की व्यवस्था ने उस वेदी को क्रम दिया, याजक दिए, लहू दिया, पर एक भी बलिदान आख़िरी नहीं था; हर साल फिर से। भविष्यवक्ता पहले ही संकेत दे चुके थे कि परमेश्वर को माँस की भूख नहीं, लौटे हुए मन की चाह है, और होशे ने पश्चात्ताप करती इस्राएल के हाथ में बैल नहीं, शब्द थमाए थे। इब्रानियों का लेखक उसी धागे को खींचकर क्रूस पर बाँधता है: चूँकि यीशु ने "फाटक के बाहर दुःख उठाया", अब बलिदान की भाषा बदल गई है। हमारा अर्पण उनके अर्पण की प्रतिध्वनि है, कारण नहीं। और यह धागा वहीं जाकर खुलता है जहाँ "आनेवाले नगर" में स्तुति ही एकमात्र बची हुई सेवा होगी।
इब्रानियों 13:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
ये पाठक यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जिन्होंने विश्वास के कारण बहुत कुछ खो दिया था: सामाजिक इज़्ज़त, सम्पत्ति, कुछ के अपने लोग जेल में थे। उनके आसपास की दुनिया में धर्म का मतलब था मंदिर, याजक, धुआँ, दिखाई देने वाली वेदी। उनके पास इनमें से कुछ नहीं था, और उन पर ताना यही था कि तुम्हारा कोई बलिदान ही नहीं। लेखक इस अपमान को उलट देता है: तुम्हारी एक वेदी है, और वह छावनी के बाहर है, वहीं जहाँ पापबलि के पशुओं की देह जलाई जाती थी, वहीं जहाँ यीशु को निकाल दिया गया। बेदखल लोगों की उपासना बेदखल किए गए मसीहा के पास होती है, और उनका एकमात्र चढ़ावा उनकी ज़बान है।
इब्रानियों 13:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"सर्वदा" शब्द गले में अटकता है। क़ब्र के किनारे खड़े आदमी से, या उस माँ से जिसका बच्चा नहीं रहा, क्या सचमुच यही माँगा जा रहा है? पाठ इसे आसान नहीं करता और हमें भी नहीं करना चाहिए। पर ध्यान दीजिए कि यहाँ भावना की नहीं, अंगीकार की माँग है: उनके नाम को सच मानकर कहना, तब भी जब भीतर कुछ भी नहीं गा रहा। कभी-कभी यह बलिदान इतना भारी होता है कि एक व्यक्ति उसे अकेले नहीं उठा सकता, और तब मंडली उसके लिए गाती है जब तक उसकी आवाज़ लौट न आए। यह रहस्य बना रहता है कि परमेश्वर टूटे हुए होठों की लड़खड़ाती स्तुति को क्यों इतना मूल्यवान समझते हैं। पर वे समझते हैं, और शायद उसी को सबसे अधिक।
इब्रानियों 13:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
मैं किसे जानता हूँ जिसकी स्तुति इस समय थम गई है, और इस सप्ताह मैं उसके लिए कैसे गा सकता हूँ, शब्दों से या भलाई से?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Hebrews 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

तेरह अध्यायों की गहरी चेतावनियों के बाद लेखक कहता है, "हे भाइयो, मैं तुम से विनती करता हूँ कि इस उपदेश की बातें सह लो।" सह लो, यानी उपदेश सुनना हमेशा मीठा नहीं लगता। जो सच तुझे बदलना चाहता है, वह पहले चुभता है। आज कौन सी बात तूने इसलिए टाल दी क्योंकि वह सहनी पड़ती?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, मेरा मन साफ रहे, यही चाहता हूँ। जहाँ किसी से छिपाने जैसा कुछ है, वहाँ मुझे ईमानदारी का साहस दे। मेरी हर बात और हर काम में सच्चाई दिख जाए। और जो लोग तेरी सेवा में लगे हैं, उन्हें भी थामे रख।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 4

पिता, धन्यवाद कि आपने विवाह को आदर की बात ठहराया और उसे पवित्र रखा। धन्यवाद कि हमारे रिश्तों की चादर निष्कलंक रहे, इसकी चिंता आप करते हैं। आपकी सच्चाई और न्याय हमारे घरों की रक्षा करते हैं, इसके लिए मेरा हृदय आभारी है।

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