बाइबल व्याख्या

यशायाह 1

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

आमोस के पुत्र यशायाह ने यहूदा और यरूशलेम के विषय में जो देखा, वह अदालत के कमरे जैसा है: परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को गवाह बनाकर अपनी ही सन्तान पर मुकदमा चलाते हैं। जिन्हें उन्होंने पाला-पोसा, वे बलवा कर बैठे; बैल और गदहे तक अपने मालिक को पहचानते हैं, पर यह प्रजा नहीं पहचानती। देश उजड़ा पड़ा है, नगर भस्म हैं, सिय्योन ककड़ी के खेत के मचान की तरह अकेली खड़ी है, और फिर भी मन्दिर में बलियों का धुआँ उठता रहता है। परमेश्वर कहते हैं कि यह सब उन्हें बोझ लगता है, क्योंकि जो हाथ प्रार्थना में उठते हैं वही खून से भरे हैं। अन्त में एक अनहोना निमन्त्रण: आओ, वाद-विवाद करें, लाल पाप हिम के समान उजले हो जाएँगे, और जो नगरी व्यभिचारिणी हो गई थी वह फिर धर्मपुरी कहलाएगी।

मर्म

आठवीं सदी का यरूशलेम धार्मिक रूप से व्यस्त था। पर्वों के दिन सड़कों पर भेड़-बकरियों की रेल-पेल, आँगन में चर्बी जलने की गन्ध, धूप का धुआँ, याजकों की चहल-पहल; बाहर से देखो तो भक्ति चरम पर थी। इसी सजी हुई भीड़ के बीच परमेश्वर कहते हैं, "मैं तो मेढ़ों के होमबलियों से और पाले हुए पशुओं की चर्बी से अघा गया हूँ।" यही इस अध्याय का धड़कता हुआ मर्म है: उपासना परमेश्वर को खरीद नहीं सकती, और न्याय के बिना की गई भक्ति उन्हें घृणित लगती है। ध्यान दीजिए, परमेश्वर बलिदान की व्यवस्था रद्द नहीं कर रहे; वे उस व्यवस्था के दुरुपयोग को उघाड़ रहे हैं, जहाँ अनाथ का मुकदमा टाला जाता है और हाकिम घूस खाते हैं। और फिर भी यह अध्याय विनाश की घोषणा पर नहीं, बल्कि एक पिता के आमन्त्रण पर टिका है: अपने को धोओ, भलाई करना सीखो, आओ बात करें। परमेश्वर की पवित्रता यहाँ उनकी करुणा की शत्रु नहीं, उसका ही तीखा रूप है।

सूत्र

अध्याय के बीच में एक वाक्य है जो पूरी बाइबल की कहानी को थामे हुए है: "यदि सेनाओं का यहोवा हमारे थोड़े से लोगों को न बचा रखता, तो हम सदोम के समान हो जाते।" यहूदा का बचना उसकी योग्यता नहीं, परमेश्वर का बचा रखना है। पौलुस ने बहुत बाद में यही पंक्ति उठाकर दिखाया कि परमेश्वर हमेशा एक शेष को बचाते आए हैं, और अन्त में वह शेष एक व्यक्ति में सिमट गया। ध्यान दीजिए कि इस अध्याय में दो आवाज़ें साथ चलती हैं: "अपने को धोकर पवित्र करो" और "तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, तो भी वे हिम के समान उजले हो जाएँगे।" पहली आज्ञा है, दूसरी प्रतिज्ञा। मनुष्य अपने हाथ का खून खुद नहीं धो सकता; यह गाँठ क्रूस पर खुलती है, जहाँ बलिदानों से अघाए हुए परमेश्वर स्वयं एक बलिदान देते हैं। और पद 26 की "धर्मपुरी" वहीं जाकर पूरी होती है जहाँ एक सच्चा न्यायी सिंहासन पर बैठता है।

दर्पण

यह अध्याय उन लोगों के लिए है जो धार्मिक रूप से अच्छे दिख रहे हैं। रविवार को आप वहाँ थे, चढ़ावा भी दिया, गीत भी गाया, और शायद घर लौटकर संतोष भी महसूस किया। यशायाह पूछता है कि उसी सप्ताह आपके हाथ क्या करते रहे। जिस मज़दूर का भुगतान आपने टाला, जिस रिश्तेदार की ज़मीन के कागज़ आपके पास दबे हैं, दफ़्तर में जिस सहकर्मी पर आरोप लगा और आप चुप रहे क्योंकि बोलना महँगा पड़ता; पद 23 के हाकिम कोई और लोग नहीं थे, वे भी मन्दिर जाते थे। परमेश्वर की सबसे तीखी शिकायत बुतपरस्ती नहीं, बल्कि यह है कि "वे अनाथ का न्याय नहीं करते, और न विधवा का मुकद्दमा अपने पास आने देते हैं।" भक्ति अगर किसी असहाय के जीवन में कुछ नहीं बदलती, तो वह धुआँ है।

आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके साथ हुए अन्याय की जानकारी आपको है और जिससे आपने आँख फेर रखी है, और आज ही उसे फ़ोन करके पूछिए कि उसका मामला अब कहाँ तक पहुँचा है।

अन्तर्पाठ

पद 10 में यरूशलेम के प्रतिष्ठित न्यायियों को "हे सदोम के न्यायियों" कहकर पुकारना उस सभा में गाली जैसा लगा होगा। उत्पत्ति में सदोम वह नगर है जिसे परमेश्वर ने आग से भस्म किया, और यहेजकेल बाद में साफ़ कहता है कि सदोम का पाप केवल देह का नहीं था, वह गरीब और दरिद्र की उपेक्षा भी थी। यशायाह उसी तार को छेड़ रहा है: चढ़ावे से लदा हुआ यरूशलेम, न्याय के तराज़ू पर सदोम के बगल में खड़ा है। और पद 15 का "मैं तुम्हारी न सुनूँगा" मीका की उस चेतावनी से मेल खाता है कि जो लोग गरीब की पुकार नहीं सुनते, उनकी पुकार भी अनसुनी रह जाएगी। शास्त्र यहाँ अपने आप को समझा रहा है: कान का सम्बन्ध कान से है।

प्रश्न

सबसे कठिन वाक्य पद 15 है: "तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा।" हमें सिखाया गया है कि परमेश्वर हर प्रार्थना सुनते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि कुछ प्रार्थनाओं से वे मुँह फेर लेते हैं। इसे नरम करने की कोशिश मत कीजिए। यह उस आदमी की प्रार्थना है जो दिन में विधवा का मुकदमा दबाता है और शाम को हाथ उठाकर आशीष माँगता है; ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के मुँह पर की गई ढिठाई है। फिर भी उसी अध्याय में, उन्हीं लोगों से, वे कहते हैं: "आओ, हम आपस में वाद-विवाद करें।" दरवाज़ा बन्द है और दरवाज़ा खुला है, दोनों एक साथ सच हैं। यह विरोधाभास हल नहीं होता; यह चेतावनी देता है कि कृपा स्वचालित नहीं है, वह निमन्त्रण है, और निमन्त्रण ठुकराया भी जा सकता है।

श्रोता

इसे सुनने वाले लोग कोई दार्शनिक बहस नहीं सुन रहे थे, वे युद्ध की खबरों के बीच खड़े थे। अश्शूर की सेना यहूदा के नगरों को एक-एक करके निगल चुकी थी, धुआँ क्षितिज पर दिखता था, शरणार्थी यरूशलेम की दीवारों के भीतर भरे थे। जब यशायाह ने कहा कि "सिय्योन की बेटी दाख की बारी में की झोपड़ी के समान छोड़ दी गई है," तो हर किसान समझ गया: फ़सल के बाद उस झोपड़ी को कोई नहीं पूछता, वह हवा में अकेली खड़ी सड़ जाती है। और मन्दिर? वही तो उनकी सुरक्षा की गारंटी थी, राष्ट्रीय गर्व, इस भरोसे की जड़ कि परमेश्वर यह नगर कभी नहीं छोड़ेंगे। यशायाह ने ठीक उसी गारंटी पर हथौड़ा मारा। हम इसे धार्मिक उपदेश की तरह पढ़ते हैं; उन्होंने इसे अपने अस्तित्व पर हुए हमले की तरह सुना।

चिंतन

मेरी उपासना में ऐसा क्या है जो मुझे संतोष देता है पर जिसका असर मेरे व्यवहार पर शून्य है?

मैं किसका मुकदमा अपने पास आने नहीं देता, और किस डर के कारण?

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Isaiah 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 1 का क्या अर्थ है?
आमोस के पुत्र यशायाह ने यहूदा और यरूशलेम के विषय में जो देखा, वह अदालत के कमरे जैसा है: परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को गवाह बनाकर अपनी ही सन्तान पर मुकदमा चलाते हैं। जिन्हें उन्होंने पाला-पोसा, वे बलवा कर बैठे; बैल और गदहे तक अपने मालिक को पहचानते हैं, पर यह प्रजा नहीं पहचानती। देश उजड़ा पड़ा है, नगर भस्म हैं, सिय्योन ककड़ी के खेत के मचान की तरह अकेली खड़ी है, और फिर भी मन्दिर में बलियों का धुआँ उठता रहता है। परमेश्वर कहते हैं कि यह सब उन्हें बोझ लगता है, क्योंकि जो हाथ प्रार्थना में उठते हैं वही खून से भरे हैं। अन्त में एक अनहोना निमन्त्रण: आओ, वाद-विवाद करें, लाल पाप हिम के समान उजले हो जाएँगे, और जो नगरी व्यभिचारिणी हो गई थी वह फिर धर्मपुरी कहलाएगी।
यशायाह 1 किस विषय में है?
अध्याय के बीच में एक वाक्य है जो पूरी बाइबल की कहानी को थामे हुए है: "यदि सेनाओं का यहोवा हमारे थोड़े से लोगों को न बचा रखता, तो हम सदोम के समान हो जाते।" यहूदा का बचना उसकी योग्यता नहीं, परमेश्वर का बचा रखना है। पौलुस ने बहुत बाद में यही पंक्ति उठाकर दिखाया कि परमेश्वर हमेशा एक शेष को बचाते आए हैं, और अन्त में वह शेष एक व्यक्ति में सिमट गया। ध्यान दीजिए कि इस अध्याय में दो आवाज़ें साथ चलती हैं: "अपने को धोकर पवित्र करो" और "तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, तो भी वे हिम के समान उजले हो जाएँगे।" पहली आज्ञा है, दूसरी प्रतिज्ञा। मनुष्य अपने हाथ का खून खुद नहीं धो सकता; यह गाँठ क्रूस पर खुलती है, जहाँ बलिदानों से अघाए हुए परमेश्वर स्वयं एक बलिदान देते हैं। और पद 26 की "धर्मपुरी" वहीं जाकर पूरी होती है जहाँ एक सच्चा न्यायी सिंहासन पर बैठता है।
यशायाह 1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके साथ हुए अन्याय की जानकारी आपको है और जिससे आपने आँख फेर रखी है, और आज ही उसे फ़ोन करके पूछिए कि उसका मामला अब कहाँ तक पहुँचा है।
यशायाह 1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सबसे कठिन वाक्य पद 15 है: "तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा।" हमें सिखाया गया है कि परमेश्वर हर प्रार्थना सुनते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि कुछ प्रार्थनाओं से वे मुँह फेर लेते हैं। इसे नरम करने की कोशिश मत कीजिए। यह उस आदमी की प्रार्थना है जो दिन में विधवा का मुकदमा दबाता है और शाम को हाथ उठाकर आशीष माँगता है; ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के मुँह पर की गई ढिठाई है। फिर भी उसी अध्याय में, उन्हीं लोगों से, वे कहते हैं: "आओ, हम आपस में वाद-विवाद करें।" दरवाज़ा बन्द है और दरवाज़ा खुला है, दोनों एक साथ सच हैं। यह विरोधाभास हल नहीं होता; यह चेतावनी देता है कि कृपा स्वचालित नहीं है, वह निमन्त्रण है, और निमन्त्रण ठुकराया भी जा सकता है।
यशायाह 1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
मेरी उपासना में ऐसा क्या है जो मुझे संतोष देता है पर जिसका असर मेरे व्यवहार पर शून्य है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Isaiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

भला करना सीखो" परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि भला करना याद रखो, बल्कि सीखो। जैसे कोई बच्चा चलना सीखता है, गिरता है, फिर उठता है। यरूशलेम के लोग बलिदान चढ़ाना जानते थे, पर विधवा का मुकद्दमा लड़ना भूल गए थे। आज अपने आप से पूछ, मेरी भक्ति किसके आँसू पोंछती है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

सुन, मैं अपने बैरियों से बदला लूँगा और अपने शत्रुओं से पलटा लूँगा।" चौंकाने वाली बात यह है कि ये बैरी कोई पराई जाति नहीं, यह उसकी अपनी यरूशलेम है। जिन्हें उसने बेटे कहकर पाला, वही उसके विरोधी बन गए। पर अगली आयत बताती है कि वह मैल जलाने आता है, बच्चे को मिटाने नहीं। परमेश्वर का क्रोध भी शुद्ध करने के लिए है। कहीं तू उस आग से भाग रहा है जो तुझे साफ करने आई है?

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