यशायाह 53:2
पाठ
भविष्यद्वक्ता एक पौधे की तस्वीर खींचता है: "वह उसके सामने अंकुर के समान, और ऐसी जड़ के समान उगा जो निर्जल भूमि में फूट निकले।" कोई भव्य वृक्ष नहीं, कोई सींचा हुआ बगीचा नहीं, बल्कि सूखी, बंजर ज़मीन से निकली एक कोंपल, जिसे कोई माली नहीं देख रहा। और फिर वह वाक्य जो पूरे अध्याय की चाबी है: "उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते।" यह पद कोई वर्णन नहीं करता कि वह कैसा दिखता था; यह बताता है कि हमने उसे कैसा देखा। सारा ज़ोर देखनेवालों की आँख पर है, न कि उस दास के चेहरे पर।
मूल बात
पिछले पद का प्रश्न अभी हवा में लटका है: "यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?" भुजबल, वह शब्द जो निर्गमन में समुद्र फाड़ता है और फ़िरौन की सेना डुबोता है। और उत्तर आता है: एक अंकुर। परमेश्वर की सामर्थ्य इस बार गरजती नहीं, वह उगती है, धीरे, चुपचाप, बिना नमी वाली मिट्टी में। यहाँ धर्मशास्त्र का एक कठोर मोड़ है: परमेश्वर का प्रकाशन ऐसा नहीं है जो हमारी आँखों को अपनी ओर खींच ले। वह हमारी सौंदर्य-भावना, हमारी सफलता की कसौटी, हमारे "प्रभावशाली" की परिभाषा से बाहर खड़ा है। इसलिए मुक्ति का पहला संकट नैतिक नहीं, दृष्टि का है: हम उसे देख भी लें, तो चाहते नहीं। कृपा वहाँ आती है जहाँ हम देखना ही नहीं चाहते, और यही उसे कृपा बनाता है, हमारी पसंद का इनाम नहीं।
सूत्र
"अंकुर" और "जड़" संयोग से चुने शब्द नहीं हैं। यशायाह ने पहले ही यिशै के कटे ठूँठ से निकलनेवाली एक डाली की बात कही थी, दाऊद के वंश का वह अवशेष जिसे कुल्हाड़ी छोड़ गई। यहाँ वही तस्वीर लौटती है, पर अब बिना राजमुकुट के: जड़ है, पानी नहीं। परमेश्वर की प्रतिज्ञा मरी नहीं, लेकिन वह जीवित रहती है ऐसे रूप में जिसे कोई गिनता नहीं। यही पूरे उद्धार-इतिहास का ढंग है: सारा का बाँझपन, यूसुफ का कुआँ, बैतलहम का छोटा कस्बा, और अन्त में एक चरनी। सूखी मिट्टी परमेश्वर के काम की रुकावट नहीं, उसका पसंदीदा खेत है। जो चीज़ मनुष्य की आँख में "कुछ नहीं" है, उसी में वे अपना भुजबल छिपाते हैं, ताकि जब फल आए तो श्रेय बाँटा न जा सके।
दर्पण
हम सब सुन्दरता से चुनते हैं, और यह केवल शरीर के बारे में नहीं है। आप उस सहकर्मी को अनदेखा करते हैं जो बैठकों में चमकता नहीं। आप कलीसिया में उस परिवार के पास बैठना टालते हैं जहाँ बीमारी और उलझन का बोझ साफ़ दिखता है। आप अपने बच्चे की उस क्षमता को नहीं देख पाते जो अंक-तालिका में नहीं आती। और सबसे गहरे स्तर पर: आप अपने भीतर की उस निर्जल भूमि से शरमाते हैं, वह हिस्सा जिसमें कुछ भी प्रभावशाली नहीं उगता, और सोचते हैं कि परमेश्वर वहाँ काम नहीं करेंगे। यह पद कहता है कि आपकी आँख भरोसेमंद जज नहीं है। वह जिसे आप "देखने योग्य नहीं" कहकर छोड़ आए, वहीं परमेश्वर बीज बो रहे हो सकते हैं।
आज एक काम करें: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखें जिसे आपने चुपचाप "महत्वपूर्ण नहीं" मान लिया है, और उसे अभी एक छोटा संदेश भेजें जिसमें कुछ माँगा न गया हो।
अन्तर्पाठ
शमूएल की पुस्तक में परमेश्वर शमूएल को टोकते हैं जब वह एलीआब के डील-डौल पर मोहित होता है: मनुष्य बाहर देखता है, यहोवा मन देखते हैं। वहाँ यह चेतावनी थी; यशायाह 53 में यह निदान बन जाती है, और अब कसौटी परमेश्वर का दास स्वयं है। दिलचस्प तनाव भी है: भजन 45 राजा को अत्यन्त सुन्दर कहता है, और शाऊल सबसे ऊँचा था, अबशालोम सबसे सुडौल; इस्राएल की कहानी दिखाती है कि सुन्दरता ने कभी नहीं बचाया। नए नियम में यूहन्ना नतनएल के मुँह से वही तिरस्कार दोहराता है, क्या नासरत से कुछ भला निकल सकता है, और मत्ती 2:23 इस "अंकुर" को नासरी कहलाने से जोड़ देता है। शब्दों का यह पुल संयोग जैसा लगता है, पर बात एक ही है: मसीहा वहीं से आता है जिसे हम गिनते नहीं।
बारीकी
"उसके सामने" पर रुकिए। किसके सामने? सबसे स्वाभाविक अर्थ: यहोवा के सामने। यह अंकुर मनुष्यों की नज़र में नहीं, परमेश्वर की नज़र में उग रहा है। पूरे पद का दर्द इसी विषमता में है: एक ही पौधा, दो दर्शक। हमारी आँख में वह बेढंगी कोंपल है, अनदेखी, अनचाही; परमेश्वर की आँख में वह उनका सींचा हुआ दास है, जिसका बढ़ना वे स्वयं देख रहे हैं। जकर्याह भविष्यद्वक्ता ने भी परमेश्वर के दास को ठीक इसी नाम से पुकारा, "अंकुर"। इसका अर्थ आपके लिए यह है: जिस जीवन को कोई नहीं गिन रहा, वह किसी की आँख से ओझल नहीं। छिपा होना और छोड़ा जाना एक बात नहीं है।
प्रसंग
यशायाह की पुस्तक का यह हिस्सा उन लोगों से बोलता है जिनके पास खोने को अब कुछ नहीं बचा: यरूशलेम गिर चुका, मन्दिर राख, राजवंश बन्दी, और बाबेल की भव्य मूर्तियों और जुलूसों के बीच वे एक हारे हुए परमेश्वर के लोग जान पड़ते हैं। उस दुनिया में देवता की सामर्थ्य उसकी सेना की जीत से नापी जाती थी, और मनुष्य का मान उसके रूप, कद और वंश से। ऐसे श्रोताओं को कहा जाता है कि यहोवा का भुजबल एक ऐसे व्यक्ति में प्रगट होगा जिसे देखकर कोई दूसरी बार मुड़कर न देखे। यह उनके अपमान का दर्पण भी था और उनकी आशा का द्वार भी: परमेश्वर उन्हें उनकी बंजर हालत में छोड़कर नहीं जाते, वे उसी बंजर में उगना चुनते हैं।
चिंतन
पिछले महीने आपने किसे "देखने योग्य नहीं" मानकर टाल दिया, और उस निर्णय की कसौटी वास्तव में क्या थी?
अपने जीवन की किस निर्जल भूमि को आप छिपाते हैं, और यदि परमेश्वर वहीं उगाना चाहें तो क्या बदलेगा?
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Isaiah 53:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 53:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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