यशायाह 60
पाठ
"उठ, प्रकाशमान हो; क्योंकि तेरा प्रकाश आ गया है" — यह आदेश एक ऐसे शहर को दिया जा रहा है जो मलबे में पड़ा है, जिसकी शहरपनाह टूटी है और जिसके बारे में अध्याय स्वयं कहता है कि वह "त्यागी गई और घृणित ठहरी" थी। इस अध्याय में परमेश्वर उसी उजड़ी हुई सिय्योन के ऊपर अपना तेज उदय होते हुए दिखाते हैं, और फिर एक के बाद एक दृश्य खुलते जाते हैं: जाति-जाति के लोग और उनके राजा उस प्रकाश की ओर खिंचे चले आते हैं, दूर देशों से बेटे-बेटियाँ लौटती हैं, शेबा से सोना और लोबान आता है, फाटक दिन-रात खुले रहते हैं। अंत में सूर्य और चंद्रमा तक अनावश्यक हो जाते हैं, क्योंकि यहोवा स्वयं "सदैव की ज्योति" बन जाते हैं और विलाप के दिन समाप्त हो जाते हैं।
मर्म
ध्यान दीजिए कि इस अध्याय में सिय्योन कुछ भी नहीं करती। वह न सेना जुटाती है, न व्यापार-संधि करती है, न अपनी दीवारें खुद खड़ी करती है; परदेशी लोग उसकी शहरपनाह उठाते हैं। उसका एकमात्र काम है उठना और उस प्रकाश को प्रतिबिंबित करना जो उसका अपना नहीं है। यही इस पाठ की धर्मवैज्ञानिक धुरी है: महिमा उधार की है, और फिर भी सच्ची है। "तेरे ऊपर यहोवा उदय होगा, और उसका तेज तुझ पर प्रगट होगा" — चंद्रमा की तरह, जिसकी सारी चमक सूर्य से आती है। यह अनुग्रह की परिभाषा है, जो पद 10 में बिना लाग-लपेट के कही गई है: "मैंने क्रोध में आकर तुझे दुःख दिया था, परन्तु अब तुझ से प्रसन्न होकर तुझ पर दया की है।" दंड परमेश्वर का काम था, और पुनर्स्थापना भी। बीच में मनुष्य की कोई उपलब्धि नहीं टिकती। और जब यूहन्ना लिखते हैं कि वचन देहधारी होकर हमारे बीच में डेरा किया और हमने उनका तेज देखा, तो वे इसी उदय की बात कर रहे हैं: वह प्रकाश अंततः एक नगर पर नहीं, एक व्यक्ति में आया।
सूत्र
पद 6 में शेबा से "सोना और लोबान" आता है, और मत्ती अपने सुसमाचार के दूसरे अध्याय में पूरब से आए ज्योतिषियों को ठीक यही भेंट लाते हुए दिखाते हैं। मत्ती संयोग नहीं लिख रहे; वे कह रहे हैं कि यशायाह 60 का उदय शुरू हो गया है, पर एक अप्रत्याशित जगह पर। जाति-जाति के लोग यरूशलेम की चमकती शहरपनाह की ओर नहीं, बल्कि बैतलहम के एक साधारण घर में एक शिशु के सामने झुकते हैं। नगर की महिमा एक व्यक्ति में सिमट आई। और फिर प्रकाशितवाक्य 21 में वृत्त पूरा होता है: वहाँ फाटक दिन-रात बंद नहीं होते, वहाँ सूर्य-चंद्रमा की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेम्ना ही दीपक है। यशायाह का दृश्य इस तरह मसीह के दोनों आगमनों के बीच फैला हुआ है, बीज और फसल की तरह।
दर्पण
"उठ" उस से कहा गया है जो उठ नहीं सकती। यही इस पाठ की चुभन है। जिस आदमी का व्यवसाय डूब चुका है, जिस माँ का बेटा घर छोड़कर चला गया है, जिस मंडली में हर साल कुर्सियाँ खाली होती जा रही हैं, उन्हें यह आदेश पहले मज़ाक जैसा लगता है। पर ध्यान दीजिए, आदेश का आधार सिय्योन की ताकत नहीं है, बल्कि यह कि "तेरा प्रकाश आ गया है"। हमारा गहरा अहंकार यही है कि हम स्वयं स्रोत बनना चाहते हैं, दर्पण नहीं; और हमारा गहरा डर यह कि अगर हम चमके नहीं तो कोई हमारी ओर नहीं देखेगा। यह अध्याय दोनों को एक साथ काट देता है। आज शाम अँधेरा होने से पहले खिड़की के पास खड़े होकर पद 1 ऊँची आवाज़ में पढ़िए, और फिर अपने जीवन की उस एक जगह का नाम लीजिए जो अभी मलबे में पड़ी है।
श्रोता
ये शब्द उन लोगों के लिए हैं जो निर्वासन से लौटे थे और जिन्होंने पाया कि लौटना ही सब कुछ नहीं होता। यरूशलेम एक छोटा, गरीब कस्बा था, फारसी साम्राज्य के हाशिये पर, जहाँ मंदिर का नया ढाँचा पुराने की तुलना में इतना मामूली था कि बूढ़े लोग उसे देखकर रोए थे। उन कानों के लिए "तेरे फाटक सदैव खुले रहेंगे" का मतलब सिर्फ़ स्वागत नहीं था, बल्कि सुरक्षा भी: फाटक तभी खुले रखे जाते हैं जब डर खत्म हो जाए। और पद 22, "छोटे से छोटा एक हजार हो जाएगा", एक मुट्ठी भर हतोत्साहित लोगों से कहा गया वादा है, न कि किसी सफल राष्ट्र की आत्मप्रशंसा। यहाँ तक कि पद 12 की कठोरता भी उनके लिए साम्राज्यवाद नहीं, न्याय की माँग थी।
संदर्भ
यशायाह के अंतिम भाग की पृष्ठभूमि बाबुल के बाद का समय है, और अध्याय 59 ठीक इसी वादे पर खत्म होता है कि छुड़ानेवाला सिय्योन में आएगा। अध्याय 60 उसी आगमन का दृश्य है। इसमें प्राचीन पूर्व की व्यापारिक दुनिया पूरी तरह मौजूद है: मिद्यान और एपा के ऊँट, केदार और नबायोत के अरब कबीले, तर्शीश के दूर तक जाने वाले जहाज, लबानोन की मशहूर लकड़ी। ये सब उस युग की समृद्धि के प्रतीक थे। और यहाँ सामाजिक नियम उलट जाता है: आम तौर पर छोटा राज्य साम्राज्य को कर चुकाता है, पर यहाँ साम्राज्यों के राजा एक पराजित नगर के पास भेंट लेकर आते हैं। यह आर्थिक दृश्य नहीं, धर्मवैज्ञानिक उलटफेर है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का असली पात्र सिय्योन नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका भावनात्मक चित्र चौंकाने वाला रूप से सजीव है। वे क्रोध में दुःख देते हैं और फिर प्रसन्न होकर दया करते हैं; वे अपने भवन को "और भी प्रतापी" करना चाहते हैं; वे अपने चरणों के स्थान को महिमा देते हैं। पद 16 में वे अपना परिचय दो नामों से देते हैं: उद्धारकर्ता और छुड़ानेवाला। इब्रानी में यह दूसरा शब्द गोएल है, वह निकट संबंधी जिसका कर्तव्य था कि कर्ज़ में बिके हुए रिश्तेदार को अपने पैसे से वापस खरीदे। परमेश्वर स्वयं को कानूनी रूप से बंधा हुआ परिजन कहते हैं। और अंत में वे धैर्य और जल्दी को एक ही साँस में रखते हैं: "ठीक समय पर यह सब कुछ शीघ्रता से पूरा करूँगा।"
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी जगह है जहाँ आप अब भी स्रोत बनने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि पाठ आपको केवल दर्पण बनने के लिए बुला रहा है?
यदि परमेश्वर सचमुच आपके गोएल हैं, आपके छुड़ानेवाले निकट संबंधी, तो जिस कर्ज़ को आप अकेले चुकाने की कोशिश कर रहे हैं, उसके बारे में आपकी प्रार्थना आज कैसे बदलेगी?
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