यशायाह 9
पाठ
गलील की धरती, जो सबसे पहले अपमानित हुई, वही सबसे पहले उजियाला देखेगी। अंधकार में चलनेवाले लोग एक बड़ी ज्योति देखते हैं, जूआ टूटता है, सिपाहियों के लहू से सने जूते और कपड़े आग में जल जाते हैं, और एक बालक जन्म लेता है जिसके कंधे पर प्रभुता है और जिसका राज्य दाऊद की गद्दी पर सर्वदा बना रहेगा। फिर स्वर अचानक पलट जाता है: उत्तरी राज्य इस्राएल घमंड से कहता है कि गिरी हुई ईंटों की जगह गढ़े पत्थर लगा देंगे, और परमेश्वर का हाथ चार बार दोहराए गए वाक्य के साथ उठा ही रहता है, अगुवे भटकाते हैं, और भाई भाई को खा जाता है।
मूल बात
यह अध्याय दो असंभव बातों को एक साथ पकड़ता है: परमेश्वर का क्रोध सच्चा है, और परमेश्वर की करुणा उससे भी सच्ची है। पद 6 का बालक किसी अच्छे मौसम की भविष्यवाणी नहीं है, वह उस समय दिया गया है जब देश जल रहा है। ध्यान दीजिए कि प्रभुता "उसके काँधे पर होगी", उसी कंधे पर जिस पर पहले "भारी जूआ" रखा था। जो कंधा गुलामी का बोझ ढोता था, अब वही राज्य संभालेगा। और यह मानवीय पराक्रम से नहीं होगा: "सेनाओं के और यहोवा की धुन के द्वारा यह हो जाएगा।" धुन, यानी जलन भरी लगन। परमेश्वर अपने लोगों को छोड़ नहीं सकते, यही उनका स्वभाव है, और यही उनका न्याय भी।
सूत्र
मत्ती ने यह पद्यांश यूँ ही नहीं उठाया। यीशु ने अपनी सेवकाई नासरत छोड़कर कफरनहूम से शुरू की, ठीक उसी ज़बूलून और नप्ताली के इलाके में जिसे यशायाह ने नाम लेकर पुकारा था। जो भूमि सबसे पहले असीरिया के हाथों उजड़ी, वहीं मसीह ने सबसे पहले पैर रखा। यह इत्तिफ़ाक नहीं, यह परमेश्वर का तरीका है: वे हाशिये से शुरू करते हैं, वहाँ से जिसे लोग भूल चुके हैं। और "अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार" वे उपाधियाँ हैं जो किसी यहूदी राजा को कभी पूरी तरह फिट नहीं हुईं। हिजकिय्याह अच्छा राजा था, पर वह मरा। यह वादा अपने पूरे होने के लिए किसी और की प्रतीक्षा करता रहा।
दर्पण
पद 10 सबसे ज़्यादा चुभता है, क्योंकि वह हमारी ही भाषा बोलता है। "ईंटें तो गिर गई हैं, परन्तु हम गढ़े हुए पत्थरों से घर बनाएँगे।" यह हार मानने से इनकार नहीं है, यह परमेश्वर को न सुनने का शानदार तरीका है। नौकरी छूटी, तो और मेहनत। रिश्ता टूटा, तो और व्यस्तता। तबीयत बिगड़ी, तो और बड़ा संकल्प। पुनर्निर्माण अपने आप में बुरा नहीं, पर जब मलबा हमसे कुछ कहना चाहता है और हम फ़ौरन उस पर नया फ़र्श डाल देते हैं, तो हम "अपने मारनेवाले की ओर" मुड़ना टाल रहे होते हैं। यशायाह पूछते हैं: क्या आपके सुधार परमेश्वर से सुनने की जगह ले रहे हैं?
मुख्य पात्र
इस अध्याय के मुख्य पात्र परमेश्वर स्वयं हैं, और उनका चित्र आरामदेह नहीं है। चार बार दोहराया जाता है: "इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।" वह उठा हुआ हाथ एक ही समय में मारने का और खींच लेने का हाथ है। परमेश्वर यहाँ ठंडे न्यायाधीश नहीं, वे एक ऐसे पिता की तरह हैं जिसका बच्चा उसकी ओर पीठ किए खड़ा है। उनका क्रोध उदासीनता का उलटा है। और वही परमेश्वर, इसी अध्याय में, एक बालक देते हैं। कठोरता और कोमलता एक ही हस्ती में, यह असंगति नहीं, यह प्रेम की गहराई है जो अन्याय को सह नहीं सकता।
श्रोता
पहले सुननेवाले यहूदा के लोग थे, जो उत्तर की ओर से आती ख़बरें सुन रहे थे: गाँव जलाए गए, लोग बैलगाड़ियों में लादकर असीरिया भेजे गए, गलील की उपजाऊ ज़मीन पर विदेशी बस गए। उनके कानों में "मिद्यानियों के दिन" का ज़िक्र बिजली की तरह पड़ा होगा, गिदोन की तीन सौ की टोली, तीन सौ मशालें, और एक विशाल सेना का अपने ही डर से बिखर जाना। संदेश साफ़ था: छुटकारा सेना की गिनती से नहीं आता। और "लूट बाँटने के समय" का आनन्द उन लोगों के लिए बहुत ठोस चित्र था जिन्होंने लूट होते देखी थी, बस हमेशा दूसरी तरफ़ खड़े होकर।
संदर्भ
समय लगभग 733 ईसा पूर्व के आसपास। असीरिया का सम्राट तिग्लत्पिलेसेर उत्तर से नीचे उतर आया है। अराम का राजा रसीन और इस्राएल का राजा पेकह मिलकर यहूदा पर दबाव डाल रहे थे, और उसी उलझन में गलील असीरिया के हवाले हो गया। पद 21 का चित्र इसी अराजकता का है: मनश्शे और एप्रैम, सगे भाइयों के गोत्र, एक दूसरे की गर्दन पर, और दोनों यहूदा के विरुद्ध। "अपनी-अपनी बाँहों का माँस" खाना कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं थी, घिरे हुए शहरों में अकाल का यही अंजाम होता था। इसी बदबू, धुएँ और आपसी नफ़रत के बीच यशायाह एक जन्म की घोषणा करते हैं। यही इस अध्याय का साहस है।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा मलबा है जिस पर आपने बहुत जल्दी "गढ़े हुए पत्थर" रख दिए, बिना यह पूछे कि परमेश्वर उसमें से क्या कहना चाहते थे?
यशायाह अंधकार को छिपाए बिना ज्योति की घोषणा करते हैं। क्या आप अपने आसपास के लोगों से आशा की बात इतनी ईमानदारी से कह पाते हैं, या आपको उनका दुख पहले छोटा करना पड़ता है?
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Isaiah 9 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जबूलून और नप्ताली, यही वे इलाके थे जिन पर सबसे पहले अश्शूर की मार पड़ी। सबसे पहले उजड़े, सबसे पहले भुला दिए गए। और परमेश्वर कहता है, "अन्त में वह समुद्र के मार्ग को, यरदन के पार, अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा।" वहीं से यीशु ने अपनी सेवा शुरू की।
तेरे जीवन का जो हिस्सा सबसे ज़्यादा टूटा है, हो सकता है वहीं से उसकी ज्योति उगे।
यशायाह अध्याय 9 में एक अंधकार भरी घड़ी है। इस्राएल शत्रुओं के भय में जी रहा है, युद्ध की गूँज हर घर तक पहुँच रही है। तभी परमेश्वर एक अजीब सी बात कहते हैं, "सिपाही के जूते जो लड़ाई में पहने जाते हैं, और लहू में लथपथ किए हुए कपड़े, आग की ईंधन होकर भस्म हो जाएंगे।"
सोचिए, सैनिकों के जूते अब जलाने की लकड़ी बनेंगे। जिन चीज़ों ने आपको इतने दिनों तक डराया, परमेश्वर उन्हें राख कर सकते हैं। आपके जीवन का कौन सा "युद्ध का जूता" आज उनके हाथ में सौंपने की ज़रूरत है?
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