यिर्मयाह 1:9
पाठ
अनातोत के उस युवक ने अभी-अभी अपनी सबसे ईमानदार आपत्ति रखी थी: "हाय, प्रभु यहोवा! देख, मैं तो बोलना भी नहीं जानता, क्योंकि मैं कम उम्र का हूँ।" और इसका उत्तर शब्दों से नहीं, स्पर्श से आया। कहानी यहाँ धीमी हो जाती है, मानो कैमरा एक ही हरकत पर ठहर गया हो: "तब यहोवा ने हाथ बढ़ाकर मेरे मुँह को छुआ।" जिस अंग को यिर्मयाह ने अपनी अयोग्यता का सबूत बताया था, ठीक उसी अंग को परमेश्वर ने छू लिया। और फिर वह वाक्य, जो उसके बाकी जीवन का नक्शा बन गया: "देख, मैंने अपने वचन तेरे मुँह में डाल दिये हैं।" आपत्ति खारिज नहीं हुई; वह जगह बन गई जहाँ परमेश्वर ने काम किया।
मूल बात
यहाँ बुलाहट का पूरा धर्मशास्त्र एक हरकत में सिमट आया है। यिर्मयाह की समस्या वास्तविक थी, काल्पनिक विनय नहीं: एक किशोर याजक-पुत्र, जिसके पास न मंच था, न अनुभव, न राजदरबार तक पहुँच। परमेश्वर उससे यह नहीं कहते कि "तुझमें क्षमता छिपी है, उसे पहचान।" वे उसकी क्षमता पर एक शब्द खर्च नहीं करते। वे केवल अपना वचन उसके मुँह में रख देते हैं। भविष्यद्वक्ता का अधिकार उसके भीतर से नहीं उगता, वह बाहर से दिया जाता है, और इसीलिए उसे छीना नहीं जा सकता। यही अनुग्रह का ढाँचा है: परमेश्वर पहले बुलाते हैं, फिर योग्य बनाते हैं, और योग्यता का अर्थ है उनकी उपस्थिति, न कि हमारी तैयारी। जो मुँह खाली है, वही भरा जा सकता है।
साझा सूत्र
मुँह में वचन डालने की यह छवि इस्राएल के लिए नई नहीं थी। मूसा के द्वारा परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वे एक दिन मूसा जैसा एक भविष्यद्वक्ता खड़ा करेंगे और अपने वचन उसके मुँह में रखेंगे। यिर्मयाह उस वंशावली में खड़ा है, पर वह उस प्रतिज्ञा की अंतिम पूर्ति नहीं है; वह उसकी ओर इशारा करती हुई एक कड़ी है। क्योंकि यिर्मयाह को वचन दिया जाता है, जबकि यीशु मसीह स्वयं वचन हैं। वे कहते हैं कि जो कुछ वे बोलते हैं, पिता की आज्ञा के अनुसार बोलते हैं, और यह अधीनता उधार ली हुई नहीं, स्वाभाविक है। यिर्मयाह के होंठ छूए जाते हैं ताकि वह बोल सके; मसीह में परमेश्वर का वचन देह बनकर हमारे बीच बोलता है। यही धागा पूरे शास्त्र में खिंचा हुआ है: परमेश्वर चुप रहनेवाले परमेश्वर नहीं हैं, वे बोलने के लिए मनुष्यों को ढूँढ़ते हैं, और अंत में स्वयं मनुष्य बनकर बोलते हैं।
दर्पण
हममें से अधिकांश यिर्मयाह की आपत्ति किसी न किसी रूप में बोल चुके हैं। "मैं इस समूह का नेतृत्व करने लायक नहीं, मेरी अपनी शादी डगमगा रही है।" "मैं अपने बेटे से विश्वास की बात कैसे करूँ, जब वह मेरी असलियत जानता है।" "दफ्तर में जहाँ बेईमानी चल रही है, वहाँ मेरी आवाज़ कौन सुनेगा, मैं तो सबसे कनिष्ठ हूँ।" ये बहाने नहीं हैं, ये सच हैं। और परमेश्वर इन सचों का खंडन नहीं करते; वे इनके बीच से होकर आते हैं और उसी मुँह को छू लेते हैं जिस पर हमें भरोसा नहीं। ध्यान दीजिए कि यिर्मयाह को उसकी कमी पर डाँटा नहीं गया, केवल उस कमी को अंतिम शब्द बनाने से रोका गया: "मत कह कि मैं कम उम्र का हूँ।" आज वह एक वाक्य ऊँची आवाज़ में बोलिए जिसे आप कहने से बचते आए हैं, किसी एक व्यक्ति से, आज ही, फोन पर या आमने-सामने: वह क्षमा, वह सच, या वह गवाही जो आपके मुँह में डाली जा चुकी है।
अंतर्पाठ
यशायाह का बुलाहट-दृश्य इसके ठीक बगल में रखने लायक है। वहाँ भी होंठ ही केंद्र में हैं, पर कारण अलग है: यशायाह अपने अशुद्ध होंठों से डरता है और एक जलते कोयले से उन्हें शुद्ध किया जाता है। यिर्मयाह अशुद्धता की नहीं, अक्षमता की शिकायत करता है, और उसका उपचार शुद्धिकरण नहीं बल्कि भराव है। परमेश्वर हर रोग के लिए एक ही दवा नहीं देते; वे ठीक उसी जगह काम करते हैं जहाँ हमारा असली अटकाव है। दूसरी ओर, लूका में यीशु अपने चेलों से कहते हैं कि अदालतों में घसीटे जाने पर पहले से उत्तर न सोचें, क्योंकि कहने के लिए शब्द उन्हें दिए जाएँगे। यह यिर्मयाह 1:9 का ही विस्तार है, अब केवल भविष्यद्वक्ताओं तक सीमित नहीं। जो परमेश्वर का हो गया, उसका मुँह अब अकेला नहीं रह जाता।
श्रोताओं का चेहरा
यिर्मयाह की पुस्तक उन लोगों के हाथ में पहुँची जो यरूशलेम के गिरने के बाद या तो खंडहरों में बचे थे या बाबेल में बैठे थे। उनके लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि यिर्मयाह कितना बहादुर था, बल्कि यह कि जो भयानक बातें उसने कहीं वे सचमुच परमेश्वर की ओर से थीं या नहीं। यदि वे केवल एक कड़वे आदमी की राय थीं, तो निर्वासन एक दुर्घटना था। पर यदि परमेश्वर ने सचमुच अपने वचन उसके मुँह में डाले थे, तो विपत्ति न्याय थी, और न्याय का अर्थ है कि परमेश्वर अब भी शासन कर रहे हैं। तब वही हाथ जो गिराता है, पुनः रोप भी सकता है। इस एक पद ने निर्वासितों के लिए यिर्मयाह की सारी चेतावनियों और सारी आशाओं पर परमेश्वर की मुहर लगा दी।
मुख्य पात्र
इस दृश्य का असली पात्र वह परमेश्वर हैं जो हाथ बढ़ाते हैं। वे दूर से आदेश नहीं देते; वे झुकते हैं, छूते हैं, और उस दूरी को मिटा देते हैं जो डरे हुए मनुष्य और उसकी बुलाहट के बीच खड़ी थी। यह एक ऐसे परमेश्वर की तस्वीर है जो सौंपे गए काम के साथ सामर्थ्य भी सौंपते हैं, और जो आपत्ति सुनकर नाराज़ नहीं होते बल्कि उसके ठीक बिंदु पर हस्तक्षेप करते हैं। साथ ही वे कोमल ही नहीं हैं। अगले ही पद में वही मुँह जातियों और राज्यों को उखाड़ने और रोपने के लिए नियुक्त किया जाता है। परमेश्वर का स्पर्श सांत्वना देता है और साथ ही बोझ भी डालता है। जिसे वे छूते हैं, वह सुरक्षित होता है, पर सहज नहीं रह जाता।
मनन के प्रश्न
आपकी कौन-सी "मैं कम उम्र का हूँ" वाली आपत्ति इतनी पुरानी हो चुकी है कि आपने उसे सच मान लिया है, और यदि परमेश्वर उसी जगह को छू लें तो क्या बदलेगा?
जो वचन आपके मुँह में डाला गया है, वह इस सप्ताह किसके लिए है, और आप उसे बोलने से किस डर के कारण रुके हुए हैं?
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Jeremiah 1:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Jeremiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
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तू उनके मुख को देखकर न घबराना, ऐसा न हो कि मैं तुझे उनके सामने घबरा दूँ।" यिर्मयाह का डर लोगों का चेहरा था। परमेश्वर कहते हैं, चेहरों से मत डर, वरना तू सचमुच टूट जाएगा। आज भी सबसे बड़ी रुकावट यही है, किसी की नाराज़ नज़र। कमर बाँध, उठ, और जो उसने कहा है वही कह।
पिता, धन्यवाद कि आप चुप रहकर विपत्ति आने नहीं देते। उत्तर दिशा से आनेवाली आपदा के विषय आपने यिर्मयाह से पहले ही कह दिया। धन्यवाद कि आज भी आप हमें समय रहते चेतावनी देते हैं, ताकि हम लौट आएँ और सँभल जाएँ। आपकी यह चेतावनी भी आपका प्रेम ही है।
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