यिर्मयाह 2
पाठ
परमेश्वर यरूशलेम को अपनी सगाई के दिनों की याद दिलाते हैं: वह दुल्हन जो बिना जुती-बोई ज़मीन में भी अपने पति के पीछे-पीछे चली। फिर स्वर बदलता है और एक मुक़दमा खुलता है: पुरखे, याजक, व्यवस्था के शिक्षक, चरवाहे और भविष्यद्वक्ता, सब ने पूछना छोड़ दिया, "यहोवा कहाँ है?" उन पर दो अभियोग हैं, जीवन के जल के सोते को त्यागना और अपने लिए टूटे हौद खोदना; और अंत में यह चेतावनी कि मिस्र और अश्शूर की तरफ़ भागती यह जाति सिर पर हाथ रखे लौटेगी।
केंद्रीय सत्य
पद 11 में सारा अध्याय सिमट जाता है: "मेरी प्रजा ने अपनी महिमा को निकम्मी वस्तु से बदल दिया है।" पाप यहाँ नियम-तोड़ना नहीं, अदला-बदली है, एक बुरा सौदा। और पद 5 में इसका परिणाम खुलता है: "निकम्मी मूर्तियों के पीछे होकर स्वयं निकम्मे हो गए।" इब्रानी में यह शब्द हेवेल है, भाप, साँस, हवा में उड़ जाने वाली चीज़। जिस चीज़ के पीछे आप चलते हैं, उसी का स्वभाव आप में उतरता है; भाप के पीछे चलने वाला स्वयं भाप हो जाता है। यही कारण है कि आईआरवी अनुवाद पद 11 के साथ रोमियों 1:23 का हवाला देता है: पौलुस पूरे मानव जाति के बारे में वही अभियोग दोहराते हैं जो यिर्मयाह यहूदा पर लगाते हैं। यहूदा का मुक़दमा हमारा भी मुक़दमा है।
बड़ी कहानी का सूत्र
पद 13 का चित्र बाइबल में आगे बढ़ता रहता है। यिर्मयाह स्वयं 17:13 में परमेश्वर को फिर "जीवन के जल का सोता" कहते हैं, और यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु सामरी स्त्री के कुएँ पर बैठकर वही भाषा अपने ऊपर ले लेते हैं: जो जल मैं देता हूँ, वह भीतर सोता बन जाएगा। जो इस्राएल ने छोड़ा था, वह देह लेकर उनके पास आ गया। पद 21 की दाखलता का चित्र भी वहीं जाकर पूरा होता है: परमेश्वर ने उत्तम बीज बोया, पर उपज जंगली निकली; और यीशु कहते हैं कि सच्ची दाखलता वे हैं। इस्राएल की विफल कहानी को कोई और मनुष्य भीतर से पूरा करता है। दुल्हन की छवि भी अधूरी नहीं रहती, क्योंकि नया नियम मसीह को दूल्हा कहता है जो बेवफ़ा दुल्हन को त्यागने के बजाय उसके लिए मरता है।
दर्पण
हौद खोदना मेहनत का काम है, और यही इसका आकर्षण है। हमारा हौद अक्सर बुरा नहीं दिखता: बचत खाता, पदोन्नति, बच्चों की सफलता, सेवकाई में बनी हुई इज़्ज़त, वह एक रिश्ता जिसके बिना आप ख़ुद को अकेला मान लेते हैं। दिक्कत यह नहीं कि ये चीज़ें बुरी हैं, दिक्कत यह है कि ये पानी रोक नहीं सकतीं, और रिसाव चुपचाप होता है। पद 27 बहुत चुभता है: लोग परमेश्वर की ओर पीठ किए रहते हैं, पर विपत्ति में चिल्लाते हैं, "उठकर हमें बचा!" प्रार्थना आपातकालीन सेवा बन जाती है। और पद 34 धर्म को नैतिकता से जोड़ देता है: घाघरे पर दरिद्र लोगों के लहू का चिन्ह। जिस पूजा में कमज़ोर की कीमत चुकानी पड़े, वह पूजा नहीं है।
कठिन प्रश्न
पद 22 दरवाज़ा बंद कर देता है: कितना भी साबुन लगाओ, "तेरे अधर्म का धब्बा मेरे सामने बना रहेगा।" फिर पद 30 और चुभता है, "मैंने व्यर्थ ही तुम्हारे बेटों की ताड़ना की।" तो क्या परमेश्वर की ताड़ना भी असफल हो सकती है? और यदि धुलाई असंभव है, तो अगले अध्याय में "लौट आ" कहने का क्या अर्थ? मैं इसे चिकना नहीं करूँगा। यिर्मयाह यहाँ यह नहीं कह रहे कि क्षमा असंभव है; वे कह रहे हैं कि आत्म-शुद्धि असंभव है। जिस जाति ने पद 35 में कहा "मैंने पाप नहीं किया," उसके पास साबुन तो है, स्वीकारोक्ति नहीं। शुद्धि आएगी, पर बाहर से, हौद से नहीं सोते से; और उस सोते के आने में सदियाँ लगेंगी।
संदर्भ
यह लगभग 627 ईसा पूर्व का समय है, यिर्मयाह जवान हैं, योशिय्याह के सुधार चल रहे हैं। अश्शूर का साम्राज्य टूट रहा है, बाबेल उठ रहा है, मिस्र फिर सक्रिय है, और यहूदा एक छोटा राज्य है जो बड़े ताक़तवरों के बीच सौदेबाज़ी से जीना चाहता है। पद 18 का "सीहोर का जल" नील नदी है और "फरात" अश्शूर, यानी दो महाशक्तियों से संधि। पद 10 में कित्तीम पश्चिम का छोर और केदार पूर्व का रेगिस्तान, यानी दुनिया के दोनों किनारे देख लो, ऐसी बात कहीं नहीं होती। "ऊँचे टीलों" और "हरे पेड़ों" के नीचे बाल की उपजाऊपन-पूजा होती थी, जिसमें देह और खेती दोनों का सौदा था।
एक बारीकी
यहूदा के पहाड़ी इलाके में नदियाँ नहीं थीं। हर घर, हर गाँव चूने के पत्थर में हौद काटता था, उन्हें प्लास्टर से लीपता था, और बरसात का पानी सहेजता था। हौद बुराई नहीं थी, वह ज़रूरत थी। यिर्मयाह का ताना दो शब्दों में है: "जो टूट गए हैं।" फटे हौद का पानी शोर करके नहीं जाता, वह रात-रात रिसता रहता है, और आपको पता तब चलता है जब सूखे महीने में रस्सी नीचे जाती है और खाली लौटती है। यही तो पूरे अध्याय की त्रासदी है: बहता सोता मुफ़्त था, और उन्होंने पसीना बहाकर एक ऐसा बर्तन बनाया जो ठीक संकट के दिन धोखा देगा।
चिंतन
आपके जीवन का कौन सा हौद इस समय रिस रहा है, और आपने अब तक उसे भरने की कोशिश छोड़कर सोते की ओर क्यों नहीं मुड़े?
पद 35 की "मैं निर्दोष हूँ" वाली आवाज़ आपके भीतर किस विषय पर सबसे ज़ोर से बोलती है, और आप किससे उसे सच-सच कहने को तैयार हैं?
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Jeremiah 2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यिर्मयाह 2 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह 2 किस विषय में है?
यिर्मयाह 2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यिर्मयाह 2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यिर्मयाह 2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jeremiah 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
परमेश्वर उन लोगों से पूछते हैं जो अपनी टूटी हुई कुण्डों की ओर भागे थे, "तुम मुझसे क्यों वाद-विवाद करते हो? तुम सब ने मुझसे बलवा किया है, यहोवा की यह वाणी है।" कितना अजीब है, गलती हमारी और शिकायत हम ही करते हैं। जब जीवन बिखरता है, तो क्या तुम भी परमेश्वर पर उँगली उठाते हो? थोड़ा रुककर पूछो, कहीं मैंने ही तो जीवित जल का सोता नहीं छोड़ दिया?
यिर्मयाह 2:17 कहता है, "क्या तू ने यह अपने ऊपर आप ही नहीं ढाया है? क्योंकि जब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे मार्ग में लिये जाता था, तब तू ने उसको त्याग दिया।"
रुककर सोचो। जो हाथ तुझे थामे चल रहा था, उसी को तूने छोड़ दिया। दुख अक्सर बाहर से नहीं आता, वह हमारे अपने चुनावों की छाया होती है। पर अच्छी खबर यह है, जिस रास्ते पर उसने पहले साथ दिया था, वहाँ आज भी लौटा जा सकता है।
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