यिर्मयाह 33:6
पाठ
पाँचवें पद में लाशों से भरा हुआ नगर है, परमेश्वर का मुँह फिरा हुआ है, और फिर अचानक छठे पद में एक शब्द आता है: "देख"। मानो परमेश्वर यिर्मयाह का सिर पकड़कर उसी खँडहर की ओर मोड़ देते हैं और कहते हैं, यहीं देख। "देख, मैं इस नगर का इलाज करके इसके निवासियों को चंगा करूँगा; और उन पर पूरी शान्ति और सच्चाई प्रगट करूँगा।" जो नगर घाव बनकर पड़ा है, उसी नगर का परमेश्वर स्वयं वैद्य बनेंगे। मिट्टी के दमदमे, टूटे हुए घर, घेराबन्दी में मरते लोग; और उसी पर एक वचन जो मरहम की तरह रखा जाता है। घाव और इलाज, दोनों एक ही हाथ से आते हैं, और यही इस पद का सबसे कठिन और सबसे सुन्दर हिस्सा है।
मूल बात
परमेश्वर यहाँ अपने न्याय को झुठलाते नहीं, उसे चंगा करते हैं। इलाज की भाषा में एक ईमानदारी है जो माफ़ी की भाषा में कभी-कभी नहीं होती: घाव असली है, सड़न असली है, और चंगाई का मतलब यह दिखावा नहीं कि कुछ हुआ ही नहीं। इसीलिए दो शब्द साथ-साथ आते हैं, "शान्ति" और "सच्चाई"। इब्रानी में शान्ति के लिए शालोम है, जिसका अर्थ केवल युद्ध का रुक जाना नहीं, बल्कि टूटे हुए का फिर से पूरा हो जाना है। और यह शालोम सच्चाई के बिना नहीं दी जाती। परमेश्वर ऐसी शान्ति नहीं बाँटते जो पाप पर पर्दा डाल दे; आठवाँ पद साफ़ करता है कि असली इलाज क्षमा है, अधर्म से शुद्ध किया जाना। यही इस वचन का केन्द्र है: परमेश्वर उस बीमारी का इलाज करते हैं जिसे हम घाव नहीं, आदत समझ बैठे थे।
सूत्र
इसी अध्याय में थोड़ा आगे चलकर परमेश्वर उस चंगाई का नाम भी बता देते हैं। पद पन्द्रह में वे कहते हैं कि वे "दाऊद के वंश में धार्मिकता की एक डाल" लगाएँगे, और पद सोलह में उस नगर का नया नाम रखा जाता है, "यहोवा हमारी धार्मिकता"। ध्यान दीजिए कि क्रम क्या है: पहले वैद्य, फिर डाल। चंगाई कोई निराकार आशीष नहीं; वह एक व्यक्ति के रूप में आती है, दाऊद के घराने से निकली एक टहनी, जो ठूँठ बन चुके वंश से फूटती है। यीशु ने अपने बारे में यही कहा था कि वैद्य की ज़रूरत बीमारों को है, स्वस्थों को नहीं। और यहाँ "शान्ति और सच्चाई" का जो जोड़ा है, वही क्रूस पर मिलता है: वहाँ पाप पर पर्दा नहीं डाला गया, उसका दाम चुकाया गया, और इसीलिए वहाँ से जो शान्ति आती है वह झूठी नहीं है।
दर्पण
हममें से ज़्यादातर लोग अपने घावों के साथ समझौता करना सीख चुके हैं। वह चिड़चिड़ापन जो आप रोज़ शाम घर लौटते ही पत्नी या बच्चों पर उतारते हैं, वह पैसे की चिन्ता जो आपको हर निर्णय में कंजूस और डरपोक बना देती है, वह पुरानी कड़वाहट जिसे आप "मैं भूल तो गया हूँ" कहकर ढँक चुके हैं। हम इन्हें बीमारी नहीं, व्यक्तित्व कहते हैं। और जब तक हम उन्हें घाव नहीं कहते, वैद्य भीतर नहीं आता। यह पद शान्ति का वादा तो करता है, पर सच्चाई के साथ बँधी हुई शान्ति का। आज एक काग़ज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप वर्षों से "बस मेरा स्वभाव है" कहकर टालते आए हैं, उसे ज़ोर से बोलकर परमेश्वर के सामने घाव कहकर स्वीकार कीजिए, और वह काग़ज़ फाड़ दीजिए।
प्रसंग
यह वचन किसी शान्त मन्दिर-प्रांगण में नहीं, बल्कि नज़रबन्दी में आया। पहला पद बताता है कि यिर्मयाह "पहरे के आँगन में बन्द था"। सिदकिय्याह के राज्य के आख़िरी वर्ष हैं, लगभग 587 ईसा पूर्व, बाबुल की सेना यरूशलेम को घेरे हुए है। चौथा पद बताता है कि लोग अपने ही घर और राजमहल तोड़कर मिट्टी के दमदमों के सामने दीवार ऊँची करने की कोशिश कर रहे हैं। भीतर अकाल और बीमारी, बाहर घेरा। यिर्मयाह इसलिए क़ैद है क्योंकि उसने आत्मसमर्पण की बात कही थी, जो दरबार की नज़र में देशद्रोह था। यानी यह चंगाई का वचन एक बन्दी के मुँह से, एक मरते हुए नगर के बीच, तब आता है जब हर दिखावटी आशा ख़त्म हो चुकी है।
श्रोताओं का चेहरा
जो लोग यह सुन रहे थे, वे मुहावरे नहीं सुन रहे थे। उनके लिए "चंगाई" का मतलब था टूटी दीवारें फिर खड़ी होना, सड़कों पर दुल्हे-दुल्हन का शब्द लौटना, चरवाहों का भेड़ें गिनना; वही सब जो पद ग्यारह से तेरह में गिनाया गया है। उनका सबसे गहरा डर पद चौबीस में छिपा है: लोग कह रहे थे कि परमेश्वर ने अपने चुने हुए दोनों कुलों से हाथ उठा लिया। यानी असली संकट बाबुल नहीं, त्याग दिए जाने का भय था। ऐसे कानों में "देख, मैं इस नगर का इलाज करके इसके निवासियों को चंगा करूँगा" एक राजनीतिक घोषणा भी थी और एक वैवाहिक आश्वासन भी: परमेश्वर ने तलाक़ नहीं दिया, वे इलाज कर रहे हैं।
कठिन प्रश्न
पर ईमानदारी से पूछें: क्या यह पूरा हुआ? बन्दी लौटे, मन्दिर दोबारा बना, मगर दाऊद की गद्दी पर कोई राजा नहीं बैठा, और नगर आगे चलकर फिर उजड़ा। "पूरी शान्ति" शब्द इतिहास के पैमाने पर खरा नहीं उतरता। यहाँ सस्ता उत्तर यह कहना होगा कि असली चंगाई तो "आत्मिक" थी, और मिट्टी-पत्थर मायने नहीं रखते। पर यिर्मयाह की भाषा मिट्टी-पत्थर की ही है। मसीह में यह वादा खुला ज़रूर है, मगर समाप्त नहीं हुआ; उनके घावों से चंगाई शुरू हुई है, पूरी नहीं हुई। हमें इस तनाव में जीना सीखना होगा: वैद्य आ चुके हैं, और मरीज़ अभी बिस्तर पर है। जो इस तनाव को जल्दी सुलझा लेता है, वह या तो वादे को छोटा करता है या अपने घाव को।
मनन के प्रश्न
आप अपने जीवन की किस बात को "स्वभाव" कहकर सह रहे हैं, जिसे परमेश्वर शायद "घाव" कहकर छूना चाहते हैं?
अगर शान्ति और सच्चाई हमेशा साथ आती हैं, तो आपके किस रिश्ते में आप सच्चाई टालकर एक नक़ली शान्ति बनाए हुए हैं?
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Jeremiah 33:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यिर्मयाह 33:6 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह 33:6 किस विषय में है?
यिर्मयाह 33:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यिर्मयाह 33:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यिर्मयाह 33:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jeremiah 33 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब मेरी बनाई हुई दीवारें गिर जाती हैं और जिन चीज़ों पर मैंने भरोसा किया था वे टूटकर मलबा बन जाती हैं, तब भी तू वहीं खड़ा है। इन खंडहरों के बीच मुझे थाम ले, और मुझे सिखा कि असली सुरक्षा तेरे सिवा कहीं नहीं मिलती।
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