बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:9

बाइबल
यह वचन The way द्वारा समर्पित है

पाठ

पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: "धन्य हैं वे, जो मेल करवानेवाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।" एक ही साँस में एक काम और एक पहचान। जो लोग टूटे हुए रिश्तों के बीच में खड़े होकर उन्हें जोड़ते हैं, उन्हें यीशु परमेश्वर के परिवार का नाम देते हैं। ध्यान दीजिए कि यहाँ "शान्तिप्रिय" नहीं लिखा, न ही "जो झगड़े से बचते हैं"। लिखा है: मेल करवानेवाले। यह सक्रिय क्रिया है, कुर्सी पर बैठे रहने का स्वभाव नहीं।

मूल बात

यूनानी शब्द है εἰρηνοποιός (ऐरेनोपोयोस), शब्दशः "शान्ति का बनानेवाला"। बनाना मेहनत है। जहाँ दरार है वहाँ कोई अपने आप नहीं जुड़ता; किसी को बीच में खड़ा होना पड़ता है, और बीच में खड़े आदमी को दोनों तरफ से चोट लगती है। यीशु कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर जैसा दिखता है, इसलिए उसे परमेश्वर का पुत्र कहा जाएगा। यह इनाम नहीं, पहचान है। बाइबल में "पुत्र" का अर्थ अक्सर समानता है: जो पिता जैसा करता है, वह पिता का कहलाता है। और परमेश्वर ने क्या किया? उन्होंने उन लोगों के साथ मेल किया जो उनके विरोधी थे। मेल करवाना परमेश्वर का पारिवारिक पेशा है।

मुख्य धागा

यह आशीष हवा में नहीं लटकी। जो यह कह रहे हैं, वही कुछ वर्षों बाद क्रूस पर दो पक्षों के बीच खड़े होंगे, परमेश्वर और विद्रोही मनुष्य के बीच, और दोनों तरफ की कीलें अपने शरीर में लेंगे। मेल करवाना सस्ता कभी नहीं होता; किसी को कीमत चुकानी पड़ती है, और यीशु ने वह पूरी कीमत चुकाई। इसलिए यह वचन पहले आज्ञा नहीं, वर्णन है: मसीह ने जो किया, उसी का छोटा सा प्रतिबिंब उनके लोगों में दिखाई देता है। हम शान्ति बनाकर बचाए नहीं जाते; हम बचाए गए हैं, इसलिए शान्ति बनाते हैं। क्रूस मूल है, हमारा काम उसकी गूँज।

दर्पण

अब सच बोलिए। आपके भीतर जो आवाज़ कहती है "मैं तो झगड़ा करता ही नहीं", वह शायद शान्ति नहीं, डर है। हम मेल नहीं करवाते क्योंकि बीच में पड़ने से हमारी इज़्ज़त दाँव पर लग जाती है। दफ्तर में दो सहकर्मियों के बीच तनाव है और आप चुप हैं, क्योंकि चुप रहना सुरक्षित है। घर में भाई-बहनों के बीच ज़मीन का झगड़ा सालों से जम गया है और आप तटस्थ बने हुए हैं, जिसे आप समझदारी कहते हैं। और कभी-कभी तो हम आग में घी भी डालते हैं: एक वाक्य आगे बढ़ा देना, एक सूचना ऐसे देना कि दूसरे का चेहरा काला पड़े। यह सब "ठीक" आदमी के भीतर चलता रहता है।

दूसरी तरफ, कुछ लोग मेल के नाम पर केवल सतह पोत देते हैं। घर में सब ठीक दिखे, इसलिए कोई सच नहीं बोला जाता। वह शान्ति नहीं, शान्ति की नकल है, और यीशु उसे धन्य नहीं कहते।

आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपका मन खट्टा है, और उसे एक वाक्य का संदेश भेजिए जिसमें न सफाई हो, न यह साबित करने की कोशिश कि कौन सही था; बस दरवाज़ा खोलनेवाला एक वाक्य। दस मिनट लगेंगे, और वह दस मिनट आपको इस वचन के भीतर खड़ा कर देंगे।

शास्त्र की गूँज

इसी उपदेश में यीशु दो बार इसी बात को खोलते हैं। पहले वेदी पर: "तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।" आराधना रुक सकती है, मेल नहीं टल सकता। यह चौंकानेवाली प्राथमिकता है। और फिर शत्रुओं के बारे में: "अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिये प्रार्थना करो। जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे।" वही शब्द फिर लौटता है, सन्तान, पुत्र। यानी पुत्रता की पहचान वहाँ दिखती है जहाँ कोई हमें प्यार नहीं कर रहा और हम फिर भी हाथ बढ़ाते हैं, जैसे परमेश्वर भलों और बुरों दोनों पर सूर्य उगाते हैं।

कठिन प्रश्न

पर हर मेल संभव नहीं होता, और हर मेल अच्छा भी नहीं होता। क्या उस स्त्री को अपने पीटनेवाले पति के पास लौटना चाहिए क्योंकि यीशु ने मेल करवानेवालों को धन्य कहा? नहीं। वह शान्ति नहीं, अन्याय पर ढक्कन है। और कभी-कभी आप पूरी ईमानदारी से हाथ बढ़ाते हैं और दूसरा उसे झटक देता है; तब क्या? यीशु यहाँ कोई गारंटी नहीं देते। वे यह नहीं कहते कि मेल करवानेवाले सफल होंगे, केवल यह कि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे। और अगली ही आयत में वे कहते हैं कि कुछ लोग धार्मिकता के कारण सताए जाएँगे। यानी मेल बनाने का इनाम कभी-कभी विरोध ही होता है। इस खुले छोर को बंद मत कीजिए; यीशु ने नहीं किया।

पहले सुननेवाले

पहाड़ पर बैठे वे लोग रोमी कब्ज़े में जी रहे थे। उनके सिक्कों पर सम्राट का नाम था, और साम्राज्य का नारा था "रोम की शान्ति", जो भालों से बनाई जाती थी। "शान्ति बनानेवाला" एक राजनीतिक उपाधि थी, सेनापतियों और सम्राटों की। और वहीं भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी थे जो तलवार से रोम को खदेड़ने का सपना देखते थे। दोनों पक्षों के सामने यीशु एक गाँववाले मछुआरे की ओर इशारा करके कहते हैं: असली शान्ति-निर्माता वह है, और वही परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा। सम्राट खुद को "देवताओं का पुत्र" कहता था। यीशु वह उपाधि उठाकर उन लोगों को दे देते हैं जिनके पास कोई सेना नहीं, केवल टूटे रिश्तों को जोड़ने की जिद है।

चिंतन

किस रिश्ते में आपकी चुप्पी को आप समझदारी कहते हैं, जबकि असल में वह डर है?

आपने पिछली बार कब किसी के बारे में कोई बात आगे बढ़ाई, यह जानते हुए कि उससे दरार चौड़ी होगी?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

John Stott

Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Matthew 5:9 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:9 का क्या अर्थ है?
पहाड़ पर बैठे यीशु अपने चेलों से कहते हैं: "धन्य हैं वे, जो मेल करवानेवाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे।" एक ही साँस में एक काम और एक पहचान। जो लोग टूटे हुए रिश्तों के बीच में खड़े होकर उन्हें जोड़ते हैं, उन्हें यीशु परमेश्वर के परिवार का नाम देते हैं। ध्यान दीजिए कि यहाँ "शान्तिप्रिय" नहीं लिखा, न ही "जो झगड़े से बचते हैं"। लिखा है: मेल करवानेवाले। यह सक्रिय क्रिया है, कुर्सी पर बैठे रहने का स्वभाव नहीं।
मत्ती 5:9 किस विषय में है?
यह आशीष हवा में नहीं लटकी। जो यह कह रहे हैं, वही कुछ वर्षों बाद क्रूस पर दो पक्षों के बीच खड़े होंगे, परमेश्वर और विद्रोही मनुष्य के बीच, और दोनों तरफ की कीलें अपने शरीर में लेंगे। मेल करवाना सस्ता कभी नहीं होता; किसी को कीमत चुकानी पड़ती है, और यीशु ने वह पूरी कीमत चुकाई। इसलिए यह वचन पहले आज्ञा नहीं, वर्णन है: मसीह ने जो किया, उसी का छोटा सा प्रतिबिंब उनके लोगों में दिखाई देता है। हम शान्ति बनाकर बचाए नहीं जाते; हम बचाए गए हैं, इसलिए शान्ति बनाते हैं। क्रूस मूल है, हमारा काम उसकी गूँज।
मत्ती 5:9 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
दूसरी तरफ, कुछ लोग मेल के नाम पर केवल सतह पोत देते हैं। घर में सब ठीक दिखे, इसलिए कोई सच नहीं बोला जाता। वह शान्ति नहीं, शान्ति की नकल है, और यीशु उसे धन्य नहीं कहते।
मत्ती 5:9 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इसी उपदेश में यीशु दो बार इसी बात को खोलते हैं। पहले वेदी पर: "तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।" आराधना रुक सकती है, मेल नहीं टल सकता। यह चौंकानेवाली प्राथमिकता है। और फिर शत्रुओं के बारे में: "अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिये प्रार्थना करो। जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे।" वही शब्द फिर लौटता है, सन्तान, पुत्र। यानी पुत्रता की पहचान वहाँ दिखती है जहाँ कोई हमें प्यार नहीं कर रहा और हम फिर भी हाथ बढ़ाते हैं, जैसे परमेश्वर भलों और बुरों दोनों पर सूर्य उगाते हैं।
मत्ती 5:9 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पहाड़ पर बैठे वे लोग रोमी कब्ज़े में जी रहे थे। उनके सिक्कों पर सम्राट का नाम था, और साम्राज्य का नारा था "रोम की शान्ति", जो भालों से बनाई जाती थी। "शान्ति बनानेवाला" एक राजनीतिक उपाधि थी, सेनापतियों और सम्राटों की। और वहीं भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी थे जो तलवार से रोम को खदेड़ने का सपना देखते थे। दोनों पक्षों के सामने यीशु एक गाँववाले मछुआरे की ओर इशारा करके कहते हैं: असली शान्ति-निर्माता वह है, और वही परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा। सम्राट खुद को "देवताओं का पुत्र" कहता था। यीशु वह उपाधि उठाकर उन लोगों को दे देते हैं जिनके पास कोई सेना नहीं, केवल टूटे रिश्तों को जोड़ने की जिद है।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 42

जो कोई तुझसे माँगे, उसे दे; और जो तुझसे उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।"

ध्यान दे, यीशु यह नहीं कहते कि कितना दे। वे हाथ की नहीं, चेहरे की बात करते हैं। क्योंकि हम अक्सर पैसे से पहले अपनी नज़रें छिपा लेते हैं, सुनने से पहले ही भीतर से मुकर जाते हैं।

आज किसी की ज़रूरत तुझ तक आए, तो पहले उसकी आँखों में देख। देना उसके बाद आसान लगेगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

यीशु ने "बाईं" नहीं, "दाहिनी आँख" कहा। यानी वह जो सबसे कीमती है, जिस पर तू सबसे ज़्यादा भरोसा करता है। पाप हमें कभी बेकार चीज़ों से नहीं, अपनी प्रिय चीज़ों से फँसाता है। "उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे।" सोच, आज तेरे हाथ में वह क्या है जिसे तू छोड़ना नहीं चाहता, पर जो तुझे धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर खींच रहा है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 32

यीशु के समय पत्नी को त्यागपत्र देना आसान था, और छोड़ी गई स्त्री के पास न सहारा था, न सम्मान। इसलिए यीशु कहते हैं, "जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है।" दोष उस पर डाला गया जिसने छोड़ा। क्या तेरे रिश्तों में भी कोई है जिसे तूने सुविधा से छोड़ दिया, और परमेश्वर उसका दर्द अब भी देख रहा है?

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

कंपनी?