अय्यूब 1
पाठ
ऊस देश का एक धनी व्यक्ति, अय्यूब, अपने दस बच्चों की दावतों के बाद हर बार भोर में उठकर होमबलि चढ़ाता है, इस डर से कि "कदाचित् मेरे बच्चों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो।" फिर दृश्य अचानक बदलता है: स्वर्ग में परमेश्वर के पुत्र उपस्थित होते हैं, शैतान भी उनके बीच आता है, और एक प्रश्न उछाला जाता है जो पूरी पुस्तक का इंजन बन जाता है, "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?" अनुमति मिलती है, सीमा के साथ। फिर चार दूत, एक के पीछे एक, बिना साँस लिए: पशु लुट गए, सेवक मारे गए, आग गिरी, आँधी आई, सब बच्चे मर गए। अय्यूब बागा फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, भूमि पर गिरता है और आराधना करता है।
मर्म
इस अध्याय का असली प्रश्न अय्यूब का दुःख नहीं, बल्कि प्रेम की सच्चाई है। शैतान यह नहीं कहता कि अय्यूब बुरा है; वह कहता है कि अय्यूब का भक्तिभाव खरीदा हुआ है, कि बाड़े के भीतर की भक्ति भक्ति नहीं, सौदा है। यह आरोप सिर्फ़ अय्यूब पर नहीं, परमेश्वर पर है: कि परमेश्वर अपने आप में प्रेम के योग्य नहीं, केवल अपने वरदानों के कारण चाहे जाते हैं। इसलिए यहाँ दाँव पर परमेश्वर का नाम है। और उत्तर धुएँ और राख में से आता है: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।" यह वाक्य दुःख को छोटा नहीं करता, वह फटे कपड़ों और मुँड़े सिर के साथ बोला गया है। पर वह दिखाता है कि अनुग्रह से जन्मी भक्ति खाली हाथों में भी जीवित रहती है।
सूत्र
अय्यूब भोर में उठकर अपने बच्चों के लिये बलि चढ़ाता है, पर उसकी प्रार्थना एक "कदाचित्" पर टिकी है: शायद उन्होंने पाप किया हो। यह पिता एक पुरोहित है जिसे कभी पूरा निश्चय नहीं मिलता, इसलिये "इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।" यहाँ उस महायाजक की छाया पड़ती है जिसकी मध्यस्थता दोहरानी नहीं पड़ती, क्योंकि वह स्वयं बलि है। और स्वर्ग का वह दृश्य, जहाँ अभियोक्ता एक धर्मी जन के विरुद्ध मुकदमा खड़ा करता है, प्रकाशितवाक्य 12:10 में फिर खुलता है, जहाँ वह "भाइयों का दोष लगानेवाला" नीचे गिरा दिया जाता है। यीशु ने पतरस से कहा था कि शैतान ने उसे गेहूँ की तरह फटकने को माँग लिया है, पर वे उसके लिये विनती कर चुके थे। अय्यूब निर्दोष होकर भी दुःख उठाता है और परमेश्वर को धन्य कहता है; क्रूस पर वह निर्दोष खड़ा होता है जो सचमुच सब कुछ खोकर भी पिता के हाथों में अपनी आत्मा सौंप देता है।
दर्पण
शैतान का प्रश्न आपके लिये भी खुला रखा गया है। आपकी नौकरी, आपका स्वास्थ्य बीमा, आपके बच्चों की सुरक्षित दिनचर्या, ये सब एक बाड़ा हैं, और बाड़ा परमेश्वर का ही दिया हुआ है, इसमें शैतान झूठ नहीं बोल रहा। पर सवाल यह है कि जब कोई एक खूँटा उखड़ता है, तो आपकी प्रार्थना क्या बन जाती है, आराधना या शिकायत का बिल। हममें से अधिकांश को यह पता ही नहीं चलता कि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं या उस व्यवस्था से जो वे हमें देते हैं, जब तक वह व्यवस्था हिलती नहीं। अय्यूब का उत्तर भावशून्य नहीं है; उसने कपड़े फाड़े, सिर मुँड़ाया, और तब जाकर झुका। दुःख और आराधना एक ही घुटने पर बैठ सकते हैं।
आज वह एक चीज़ काग़ज़ पर लिखिए जिसके छिन जाने से आपका विश्वास सबसे ज़्यादा हिलेगा, और उस नाम के ऊपर ज़ोर से कहिए: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"
पृष्ठभूमि
कहानी इस्राएल के बाहर बैठी है। ऊस देश पूर्व में कहीं है, और अय्यूब "पूर्वी देशों में सबसे बड़ा" है, यानी वह एक कुलपति है जिसकी हैसियत भेड़-बकरियों, ऊँटों और दास-दासियों में गिनी जाती है। कोई मन्दिर नहीं, कोई याजक नहीं; वह स्वयं अपने घराने के लिये होमबलि चढ़ाता है, जैसे अब्राहम के दिनों में होता था। शेबा के लुटेरे दक्षिण से आते हैं, कसदी उत्तर-पूर्व से; मरुभूमि के किनारे बसा हर धनी आदमी इन छापों के डर में जीता था। स्वर्ग का दरबार भी उस समय के श्रोताओं के लिये परिचित चित्र था: राजा अपने दरबारियों के बीच, और उनमें एक जाँच-अधिकारी, "शैतान", यानी विरोधी या अभियोक्ता, जो पृथ्वी पर घूम-घूमकर रिपोर्ट लाता है। ध्यान दीजिए कि वह बिन बुलाए नहीं आता और बिना अनुमति कुछ नहीं कर सकता।
श्रोता
इस्राएली पाठक एक गहरे तर्क के साथ जीते थे: आज्ञा मानोगे तो आशीष, तोड़ोगे तो शाप। व्यवस्था की यह सीधी रेखा उनकी हड्डियों में थी। इसलिये अय्यूब की कहानी उन्हें चुभती थी। पहला झटका यह कि नायक इस्राएली है ही नहीं, खतना नहीं, वाचा नहीं, फिर भी परमेश्वर उसे "मेरा दास" कहते हैं, वही उपाधि जो मूसा और दाऊद को मिली। दूसरा झटका यह कि उसकी तबाही उसके पाप का परिणाम नहीं, उसकी खराई का परिणाम है। जो लोग निर्वासन में सब कुछ खो चुके थे, खेत, घर, बच्चे, वे इन चार दूतों की आवाज़ पहचानते थे। उनके लिये यह अध्याय एक दरवाज़ा खोलता है: हर विपत्ति दंड की रसीद नहीं होती। कभी-कभी वह उस लड़ाई का हिस्सा होती है जिसका पूरा नक्शा हमें कभी नहीं दिखाया जाता।
बारीकी
चार बार एक ही वाक्य लौटता है: "और मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।" और उससे भी तीखा वह छोटा-सा जोड़ है, "वह अभी यह कह ही रहा था, कि एक और भी आकर कहने लगा।" कथाकार जानबूझकर अय्यूब को साँस नहीं लेने देता। वाक्य एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हैं, जैसे वास्तविक संकट में फ़ोन की घंटियाँ बजती हैं, इससे पहले कि आप पिछली खबर को समझ भी पाएँ। यह शैली बताती है कि दुःख शालीनता से बारी-बारी नहीं आता। और तब, जब चौथा दूत चुप होता है, पाठ में एक खाली जगह बनती है, और उसी खाली जगह में अय्यूब उठता है। उसकी आराधना जल्दबाज़ी में दी गई प्रतिक्रिया नहीं, चुप्पी के बाद उठाया गया कदम है।
चिंतन
अगर शैतान आज परमेश्वर के सामने आपका नाम लेकर वही प्रश्न पूछे, तो आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा उसका सबसे मज़बूत सबूत बनेगा?
अय्यूब ने बागा फाड़ने के बाद ही आराधना की। आप अपने दुःख को परमेश्वर के सामने कितना कच्चा और बिना सजाए रखते हैं?
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Job 1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वह अब तक कह ही रहा था, कि" यही वाक्य चौथी बार दोहराया जाता है। दुख ने अय्यूब को साँस लेने का एक पल भी नहीं दिया। कभी तेरे साथ भी ऐसा हुआ है, कि एक बोझ उठाया नहीं और दूसरा आ गिरा? ध्यान दे, आखिरी खबर उन बच्चों के बारे में थी जो साथ बैठे खा-पी रहे थे। खुशी के बीच ही तूफान आया। फिर भी अय्यूब झुककर दंडवत करता है।
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