अय्यूब 7
पाठ
अय्यूब अपने मित्रों से मुँह मोड़कर सीधे परमेश्वर से बात करने लगता है, और जो निकलता है वह प्रार्थना कम, अभियोग अधिक है। पहले वह मनुष्य के जीवन का नक्शा खींचता है: बेगार में जुता हुआ मजदूर जो छाया के लिये तरसता है, रातें जो कटती नहीं, चमड़ी जो "कीड़ों और मिट्टी के ढेलों से ढकी हुई है", और दिन जो "जुलाहे की ढरकी से अधिक फुर्ती से" भागे जा रहे हैं। फिर वह चुप रहने से इनकार कर देता है और परमेश्वर से पूछता है कि आखिर उन्होंने उसे निशाना क्यों बनाया, और वे उससे नजर हटाकर उसे इतनी मोहलत क्यों नहीं देते कि वह अपना थूक ही निगल ले। अंत में एक तीखी माँग: क्षमा कर दीजिए, वरना कल मैं मिट्टी में होऊँगा और आप ढूँढ़ेंगे तो पाएँगे नहीं।
मूल बात
इस अध्याय की सबसे चुभनेवाली बात यह है कि अय्यूब परमेश्वर की उपस्थिति से नहीं, उनके ध्यान से पीड़ित है। "मनुष्य क्या है कि तू उसे महत्त्व दे, और अपना मन उस पर लगाए?" यह वही सवाल है जिसे भजनकार आश्चर्य और कृतज्ञता के साथ उठाता है, पर अय्यूब के मुँह में यह उलटकर शिकायत बन जाता है। जिस दृष्टि को विश्वासी सुरक्षा कहते हैं, वह उसे घेराबंदी लगती है, मानो वह "समुद्री अजगर" हो जिस पर पहरा बैठाना पड़े। यहाँ धर्मशास्त्र का एक असहज सत्य खुलता है: परमेश्वर का निकट होना अपने आप में सांत्वना नहीं है। जब दुख गहरा हो, तब वही निकटता जाँच जैसी लगती है। और शास्त्र इस शिकायत को सेंसर नहीं करता, बल्कि उसे प्रार्थना का दर्जा देता है, क्योंकि अय्यूब परमेश्वर के बारे में नहीं, परमेश्वर से बोल रहा है।
बड़ी कहानी का सूत्र
अय्यूब की माँग दो हिस्सों में टूटती है: "मुझे छोड़ दे" और "तू क्यों मेरा अपराध क्षमा नहीं करता?" वह चाहता है कि परमेश्वर या तो दूर हट जाएँ या पूरी तरह पास आकर दोष मिटा दें। बीच का यह असहनीय स्थान, जहाँ परमेश्वर देखते तो हैं पर छुड़ाते नहीं, पूरे पुराने नियम का खुला घाव है। मसीह में उत्तर वह नहीं आता जो अय्यूब माँगता है; उत्तर यह आता है कि परमेश्वर स्वयं उस जगह में उतर आते हैं। क्रूस पर वही ताकनेवाली दृष्टि हटती है, और जो व्यक्ति परित्यक्त पुकारता है वह निर्दोष है, ठीक अय्यूब की तरह। अय्यूब जिस अधोलोक को बिना लौटने की जगह कहता है, वहीं से लौटा हुआ एक जन इस पुस्तक का असली उत्तर है।
दर्पण
यह अध्याय उस आदमी का है जो रात के तीन बजे छत ताक रहा है और सुबह होने का इंतजार कर रहा है, यह जानते हुए कि सुबह कुछ नहीं बदलेगी। शायद आपके साथ भी कुछ ऐसा है: कोई रिपोर्ट जिसका नतीजा आना बाकी है, कोई शादी जो अंदर से खोखली हो चुकी है, कोई बच्चा जिससे बात करना अब लड़ाई है। और सबसे बुरा यह विचार कि परमेश्वर देख तो रहे हैं, पर हिल नहीं रहे। अय्यूब यहाँ हमें एक चीज सिखाता है जो कलीसिया में अकसर मना है: कड़वाहट को सजाकर मत बोलिए। "मैं अपना मुँह बन्द न रखूँगा" कोई पाप की स्वीकृति नहीं, विश्वास का एक कठोर रूप है। आज ही एक कागज पर अपनी सबसे कड़वी शिकायत एक ही वाक्य में लिखिए, "आप" कहकर परमेश्वर को सम्बोधित करते हुए, और उसे ऊँची आवाज में एक बार पढ़ दीजिए।
शास्त्र की गूँज
भजन 8 में यही सवाल, मनुष्य क्या है कि आप उसकी सुधि लें, आश्चर्य से भरा हुआ है: छोटा आदमी, और फिर भी महिमा से मुकुटित। अय्यूब उसी वाक्य को उठाकर उलट देता है, जैसे कोई प्रशंसा-गीत को अदालत में सबूत की तरह पेश कर दे। यह इत्तिफाक नहीं; बाइबल अपने ही भजनों पर जिरह करने से नहीं डरती। दूसरी ओर, भजन 139 का वह विश्वासी जो कहता है कि कहीं भी जाऊँ आप वहाँ हैं, अय्यूब के लिये सांत्वना नहीं, कैद का नक्शा है। दोनों सच्चे हैं, और शास्त्र दोनों को एक ही जिल्द में रखता है, ताकि दुख में पड़ा विश्वासी यह न सोचे कि उसकी भाषा नाजायज है।
सन्दर्भ
कल्पना कीजिए: गाँव के बाहर राख का ढेर, जहाँ कूड़ा जलाया जाता है और कुत्ते घूमते हैं। वहीं बैठा है वह आदमी जो कभी फाटक पर न्याय करता था, अब फोड़ों से भरा, खुजलाता हुआ, और उसकी चमड़ी सचमुच "सिमट जाती, और फिर गल जाती है"। सम्मान और लज्जा से चलनेवाले उस समाज में यह केवल बीमारी नहीं, सार्वजनिक फैसला है: परमेश्वर ने इसे छोड़ दिया। जुलाहे की ढरकी हर घर में खटखटाती थी, इसलिए उसकी गति सबको पता थी। और "समुद्र" तथा "समुद्री अजगर" उन कहानियों से आते हैं जिनमें देवता अराजकता के दैत्य को बाँधकर पहरा बिठाते हैं। अय्यूब कह रहा है: मैं कोई दैत्य नहीं, एक टूटा हुआ आदमी हूँ, फिर यह घेराबंदी क्यों?
कठिन प्रश्न
अय्यूब कहता है, "मैंने पाप तो किया होगा, तो मैंने तेरा क्या बिगाड़ा?" यह वाक्य खतरनाक है, क्योंकि इसमें पाप को छोटा बताया जा रहा है: मेरे किए से आपका क्या घटा? हम इसे तुरंत सुधारना चाहते हैं। पर ध्यान दीजिए, परमेश्वर अध्याय 42 में अय्यूब की इन बातों को उसके मित्रों की सही-सही धर्मशास्त्रीय बातों से ऊपर रखते हैं। तो क्या परमेश्वर गलत बात को स्वीकार कर लेते हैं? नहीं; वे उस आदमी को स्वीकार करते हैं जो उनके सामने खड़ा होकर बोल रहा है, बजाय उनके पीछे उनका बचाव करनेवालों के। इसका मतलब यह नहीं कि अय्यूब की हर बात सच है। इसका मतलब यह है कि परमेश्वर सच्चाई से बोले गए गलत वाक्य को झूठे भक्तिभाव से अधिक सह लेते हैं। यह राहत नहीं देता, पर दरवाजा खुला रखता है।
चिंतन के प्रश्न
आपकी प्रार्थनाओं में आखिरी बार कब कोई ऐसा वाक्य आया था जिसे आप किसी और के सामने दोहराने में झिझकते?
जब परमेश्वर की निकटता आपको सांत्वना नहीं, जाँच जैसी लगती है, तो आप आमतौर पर क्या करते हैं: चुप हो जाते हैं, या बोल देते हैं?
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