यूहन्ना 1:5
मूल पाठ
यूहन्ना एक ही वाक्य में दो चीज़ें कहते हैं, और दोनों वर्तमान की तरह लगती हैं: "ज्योति अंधकार में चमकती है; और अंधकार ने उसे ग्रहण न किया।" पहले वे यह नहीं कहते कि ज्योति अंधकार को हटा देती है, न यह कि अंधकार भाग जाता है। वे कहते हैं कि ज्योति वहीं चमकती है जहाँ अंधकार है, उसके भीतर, उसके बीचोंबीच। और दूसरी बात एक टकराव है: अंधकार ने उस ज्योति को न तो अपनाया, न बुझाया। दोनों बातें एक साथ सच हैं। पिछले पद में जो जीवन "मनुष्यों की ज्योति" था, वह अब खुले मैदान में उतर आया है, और मैदान अंधेरा है। यह वाक्य पूरे सुसमाचार की भूमिका है: यीशु आते हैं, अपने घर आते हैं, और उनके अपने उन्हें ग्रहण नहीं करते, फिर भी वे बुझते नहीं।
केंद्रीय सत्य
यूनानी क्रिया कातेलाबेन का अर्थ दोनों तरफ खिंचता है: "समझ लेना, अपना लेना" और "दबोच लेना, हरा देना"। यूहन्ना शायद जानबूझकर यह दोहरापन रखते हैं, क्योंकि अंधकार दोनों में असफल रहा। उसने ज्योति को न पहचाना और न मिटा सका। यहाँ परमेश्वर के बारे में जो कहा जा रहा है वह भावुक नहीं, कठोर रूप से यथार्थवादी है: परमेश्वर अंधकार से बचकर नहीं रहते, वे उसके भीतर जाकर चमकते हैं, और वहाँ हारते नहीं। और मनुष्य के बारे में भी एक असुविधाजनक बात कही जा रही है: हमारी समस्या केवल यह नहीं कि हमें रोशनी नहीं मिली; समस्या यह है कि रोशनी आने पर भी हमने उसे नहीं अपनाया। यही इस पद की धार है। यह हमें दिलासा भी देता है और कठघरे में भी खड़ा करता है, एक ही साँस में।
जोड़ने वाला धागा
यूहन्ना का "आदि में" उत्पत्ति की पहली पंक्ति को जानबूझकर छूता है। वहाँ गहरे जल पर अंधकार था, और परमेश्वर ने कहा कि उजियाला हो। लेकिन ध्यान दीजिए, यूहन्ना सृष्टि की उस कहानी को दोहराते नहीं, आगे बढ़ाते हैं: तब ज्योति ने अंधकार को अलग कर दिया था, अब ज्योति अंधकार के भीतर उतरकर चमकती है। यही अवतार का पूरा तर्क है, जो पद चौदह में खुलकर सामने आता है, "वचन देहधारी हुआ।" और यही धागा क्रूस तक जाता है, जहाँ दोपहर में अंधेरा छा गया और लगा कि ज्योति बुझ गई, पर तीसरे दिन वह वाक्य फिर सच निकला: अंधकार उसे दबोच न सका। बाइबल की पूरी कहानी इसी क्रम में चलती है, परमेश्वर अंधेरे से दूरी नहीं बनाते, वे उसमें प्रवेश करते हैं।
आईना
यह पद हमें एक असुविधाजनक जगह पर खड़ा करता है। हम अक्सर वहीं चमकना चाहते हैं जहाँ पहले से रोशनी है: उस दोस्ती में जो आसान है, उस चर्च समूह में जहाँ सब सहमत हैं, उस काम में जहाँ ईमानदारी की कीमत नहीं चुकानी पड़ती। पर मसीह की ज्योति अंधकार में चमकती है, और उसके पीछे चलने का मतलब है वहाँ बने रहना जहाँ हमारा मन कहता है, निकल चलो। उस सहकर्मी के पास, जिसका डिप्रेशन थका देता है। उस रिश्तेदार के साथ, जिसकी शराब ने सब खोखला कर दिया। उस खाते में, जहाँ थोड़ी सी चुप्पी बहुत मुनाफ़ा दिला सकती है। और आईने का दूसरा पहलू और चुभता है: जिन जगहों पर हमने रोशनी को अंदर नहीं आने दिया, वे भी हमारी अपनी हैं, वह पुराना गुस्सा, वह हिसाब जो हम बताते नहीं। आज शाम होने से पहले उस एक व्यक्ति को फ़ोन कीजिए जिससे आप इसलिए बचते रहे हैं क्योंकि उसकी ज़िंदगी में अंधेरा है, और सिर्फ़ इतना पूछिए, "तुम सच में कैसे हो?" फिर चुप रहकर सुनिए।
श्रोता
जिन लोगों के लिए यह लिखा गया, उनके लिए यह वाक्य कोई काव्य नहीं, आत्मकथा था। पहली सदी के अंत में मसीह पर विश्वास करने वाले यहूदी अपने ही आराधनालयों से निकाले जा रहे थे। "अंधकार ने उसे ग्रहण न किया" उन्होंने अपनी चौखट पर पढ़ा था, अपने परिवारों की ठंडी नज़रों में। साथ ही वे उस यूनानी-रोमी दुनिया में रहते थे जहाँ ज्योति और अंधकार धर्मों की आम शब्दावली थी, जहाँ लोग गुप्त ज्ञान से उजाले तक पहुँचना चाहते थे। यूहन्ना उनके सामने एक चौंकाने वाला दावा रखते हैं: यह ज्योति कोई विचार नहीं, एक व्यक्ति है, जो इतिहास में आया और जिसे ठुकराया गया। और तीसरी बात, जो हमसे अक्सर छूट जाती है, उनके लिए यह हार की व्याख्या था और हिम्मत का आधार भी।
अंतर्पाठ
इसी अध्याय में यूहन्ना अपनी ही बात खोलते हैं: "वह अपने घर में आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।" पद पाँच की अमूर्त भाषा वहाँ चेहरा और पता पा लेती है। और तीसरे अध्याय में यीशु इस अस्वीकार का कारण बताते हैं: ज्योति जगत में आई, पर लोगों ने अंधकार को अधिक प्रिय जाना, क्योंकि उनके काम बुरे थे। यह इस पद की सबसे सख़्त व्याख्या है। अंधकार सिर्फ़ हमारे साथ होने वाली कोई दुर्घटना नहीं, कई बार वह हमारी पसंद है, क्योंकि उजाले में कुछ चीज़ें दिखने लगती हैं जो हम दिखाना नहीं चाहते। इसीलिए बाद में यीशु स्वयं कहेंगे कि वे जगत की ज्योति हैं, और उनके पीछे चलने वाला अंधेरे में नहीं चलेगा।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र वह वचन है, जो अब ज्योति कहलाता है। उसका स्वभाव इस एक क्रिया में खुलता है: वह चमकता है, लगातार, वर्तमान काल में। वह गरजता नहीं, धमकाता नहीं, अंधकार से बहस नहीं करता। वह बस उपस्थित रहता है और अपनी उपस्थिति से सब कुछ उजागर कर देता है। यूहन्ना के सुसमाचार में यही यीशु आगे दिखाई देंगे: वे कब्र के सामने रोते हैं, अपने पकड़वाने वाले के पैर धोते हैं, पीलातुस के सामने ज़्यादातर चुप रहते हैं। कोई हिंसा नहीं, फिर भी कोई पीछे हटना भी नहीं। यही परमेश्वर का चरित्र है, धीरज से भरी अटलता। और यही वह ज्योति है जिसे हमें अपने भीतर आने देना है, इससे पहले कि हम उसे दूसरों तक ले जाने की सोचें।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी जगह है जहाँ आप इसलिए नहीं जाते क्योंकि वहाँ अंधेरा बहुत गाढ़ा है, और वहाँ बने रहना आज आपके लिए किस रूप में संभव है?
"अंधकार ने उसे ग्रहण न किया" यह वाक्य किस हद तक दूसरों के बारे में है और किस हद तक आपके अपने भीतर के किसी कोने के बारे में?
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John 1:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 1:5 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 1:5 किस विषय में है?
यूहन्ना 1:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 1:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 1:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
धन्यवाद यीशु, कि तू मुड़कर देखता है। जब हम झिझकते हुए तेरे पीछे चलते हैं, तू हमें अनदेखा नहीं करता, बल्कि पूछता है, "तुम किस की खोज में हो?" धन्यवाद कि तू हमारे मन की प्यास जानता है और अपने घर का पता बताकर हमें पास बुलाता है।
पिता, अंद्रियास ने सबसे पहले अपने भाई को ढूँढ़ा और उसे तुझ तक ले आया। मुझे भी वैसा ही दिल दे। जिन्हें मैं हर दिन देखता हूँ, उनसे तेरे बारे में कहने का साहस दे। मेरी बातें बड़ी न हों, बस सच्ची हों।
पिता, कई बार मैं भी नहीं पहचान पाता कि आप कहाँ काम कर रहे हैं। मुझे वह नज़र दीजिए जो आपके आत्मा के ठहरने को देख सके। पानी से बढ़कर मुझे भीतर से धो दीजिए, और अपना आत्मा मुझ पर बना रहने दीजिए, ताकि मेरा जीवन आपकी ओर इशारा करे।
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