यूहन्ना 1:1
पाठ
तीन छोटे वाक्य, और हर वाक्य पिछले वाले से एक कदम आगे: "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।" पहला वाक्य बताता है कि वचन कब से है, दूसरा बताता है कि वह किसके साथ है, तीसरा बताता है कि वह कौन है। यूहन्ना कोई जन्म-कथा नहीं सुनाते, न चरवाहे, न सितारा; वे सृष्टि से भी पीछे जाकर शुरू करते हैं।
मर्म
"आदि में" कहते ही यूहन्ना पाठक को बाइबल के पहले पन्ने पर खड़ा कर देते हैं। उत्पत्ति की पहली पंक्ति भी ठीक इन्हीं शब्दों से आरम्भ होती है, और वहाँ परमेश्वर बोलते हैं और सृष्टि होती है। यूहन्ना उसी बोलने को अब एक व्यक्ति के रूप में सामने रखते हैं। यहाँ जो कहा जा रहा है वह यह नहीं कि परमेश्वर के पास एक शक्तिशाली शब्द था, बल्कि यह कि परमेश्वर के भीतर सदा से एक ऐसा सम्बन्ध है जिसमें कोई "साथ" है और वह "साथ" स्वयं परमेश्वर है। इसीलिए पद 2 दोहराता है, "यही आदि में परमेश्वर के साथ था।" दोहराव लापरवाही नहीं, ताला लगाना है: यह कोई बाद में बना हुआ प्राणी नहीं।
मुख्य सूत्र
बाइबल में परमेश्वर का वचन कभी निष्क्रिय नहीं रहता। भजन संहिता कहती है कि आकाश यहोवा के वचन से बने; भविष्यद्वक्ताओं के पास वचन "आता" है, जैसे कोई अतिथि द्वार पर खड़ा हो। नीतिवचन में बुद्धि सृष्टि से पहले परमेश्वर के पास खड़ी बोलती है। यूहन्ना इन सब धाराओं को एक जगह मिला देते हैं और फिर वह करते हैं जो कोई यहूदी लेखक करने की हिम्मत नहीं करता: पद 14 में लिखते हैं, "और वचन देहधारी हुआ।" जो सृष्टि के पहले था, वही गलील की धूल में चलने लगा। पहले पद के बिना चौदहवाँ पद केवल एक भावुक वाक्य होता; चौदहवें पद के बिना पहला पद केवल एक दार्शनिक दावा।
दर्पण
हम अक्सर यीशु को अपनी कहानी के बीच में रखते हैं: जब बीमारी आई, जब नौकरी गई, जब बच्चा बिगड़ा, तब उन्हें बुलाते हैं। यह पद उस क्रम को उलट देता है। आप उनकी कहानी में हैं, वे आपकी में नहीं। यह पहले तो ठेस पहुँचाता है, क्योंकि हम अपने जीवन के केन्द्र में रहना चाहते हैं। पर सोचिए: जिस मसीह से आप सुबह जल्दी में प्रार्थना करते हैं, वह आपकी नौकरी, आपके माता-पिता, आपके शरीर और आपके समय से पहले का है। जो चीज़ आपको आज सबसे बड़ी लग रही है, वह उनके सामने नई है। यह छोटा करता है, और उसी छोटेपन में एक अजीब राहत है।
मुख्य पात्र
इस पद में परमेश्वर स्वयं मुख्य पात्र हैं, पर एक ऐसे रूप में जिसकी हमें आदत नहीं। वे अकेले नहीं हैं। "साथ था" वाला शब्द दूरी नहीं, आमने-सामने की निकटता कहता है, जैसे दो चेहरे एक-दूसरे की ओर मुड़े हों। यही परमेश्वर पद 18 में "पिता की गोद में" रहने वाले पुत्र के रूप में दिखते हैं। यानी परमेश्वर सृष्टि करने से पहले भी प्रेम कर रहे थे; उन्हें हमारी ज़रूरत नहीं थी कि कोई उन्हें प्रेम करे। इसलिए जब वे हमारी ओर मुड़ते हैं, तो वह कमी से नहीं, भरपूरी से निकला कदम है। पद 16 का "अनुग्रह पर अनुग्रह" कहीं और से नहीं, इसी भरपूरी से बहता है।
श्रोताओं का परिचय
यूहन्ना के पहले पाठक दो दुनियाओं में रहते थे। यहूदी पाठक हर सभागृह में सुनते थे कि परमेश्वर एक हैं, और उनके लिए "वचन परमेश्वर था" कान में काँटे की तरह चुभा होगा। यूनानी पाठकों ने "वचन" शब्द में वह सिद्धांत सुना जिससे उनके दार्शनिक ब्रह्मांड की व्यवस्था समझाते थे, कोई ठंडा, निर्वैयक्तिक नियम। यूहन्ना दोनों को असहज करते हैं: यहूदियों से कहते हैं कि एक परमेश्वर के भीतर यह "साथ" है, और यूनानियों से कहते हैं कि यह सिद्धांत माँस-मज्जा का बना और लोगों के बीच रहने आया। पहली सदी में यह वाक्य सुरक्षित नहीं था; यह किसी को भी घर से बेदखल करवा सकता था।
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि यूहन्ना नहीं लिखते "आदि में वचन हुआ" या "आदि में वचन उत्पन्न हुआ", बल्कि "वचन था"। यही अंतर पद 3 में साफ़ हो जाता है, जहाँ हर सृजी हुई वस्तु के लिए "उत्पन्न हुआ" शब्द आता है: "सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ।" एक ओर वह जो था, दूसरी ओर वह सब जो हुआ। इस बारीक क्रिया-भेद पर पूरी मसीही आस्था टिकी है। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने भी यही पकड़ा जब उन्होंने पद 15 में कहा कि जो मेरे बाद आ रहा है वह मुझसे बढ़कर है, "क्योंकि वह मुझसे पहले था" यद्यपि यीशु उम्र में उनसे छोटे थे। तर्क में यह उल्टा लगता है, पर पहले पद के प्रकाश में यह एकदम सीधा है।
चिंतन
आपके जीवन की कौन-सी परिस्थिति आज इतनी बड़ी लग रही है कि वह मसीह से भी पुरानी और स्थायी महसूस होती है? उसके सामने "आदि में वचन था" कहना आपके लिए क्या बदलेगा?
यदि परमेश्वर सृष्टि से पहले भी प्रेम के सम्बन्ध में थे, तो उनके पास आपके आने का कारण ज़रूरत नहीं बल्कि अनुग्रह है। क्या आप उनके पास कुछ चुकाने जाते हैं, या पाने?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
John 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 1:1 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 1:1 किस विषय में है?
यूहन्ना 1:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कई बार मैं भी नहीं पहचान पाता कि आप कहाँ काम कर रहे हैं। मुझे वह नज़र दीजिए जो आपके आत्मा के ठहरने को देख सके। पानी से बढ़कर मुझे भीतर से धो दीजिए, और अपना आत्मा मुझ पर बना रहने दीजिए, ताकि मेरा जीवन आपकी ओर इशारा करे।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें