बाइबल व्याख्या

यूहन्ना 15:16

बाइबल
यह वचन Kingdom Grace Fellowship द्वारा समर्पित है

पाठ

वाक्य एक इनकार से शुरू होता है, और यही इसकी चुभन है: "तुम ने मुझे नहीं चुना।" यीशु उन्हीं लोगों से यह कह रहे हैं जिन्हें वे अभी-अभी मित्र कह चुके हैं, उसी रात जिस रात वे पकड़वाए जाएँगे। वे कहते हैं कि पहल उनकी ओर से हुई: मैंने तुम्हें चुना, और केवल चुना ही नहीं, ठहराया भी, एक काम के लिए नियुक्त किया। वह काम है जाना और फल लाना, ऐसा फल जो टिके, मौसमी नहीं। और इस पूरी व्यवस्था के साथ एक वचन जुड़ा है: जो कुछ तुम उनके नाम से पिता से माँगोगे, पिता तुम्हें देंगे। चुनाव, नियुक्ति, फल, और प्रार्थना का अधिकार, सब एक ही साँस में।

मर्म

हम अपनी आत्मिक कहानी प्रायः अपने निर्णय से शुरू करते हैं: मैंने विश्वास किया, मैंने समर्पण किया, मैंने प्रभु को चुना। यीशु उस क्रम को उलट देते हैं, और यह केवल धर्मसिद्धांत की बारीकी नहीं है, यह आपकी सुरक्षा का आधार है। रब्बियों के ज़माने में शिष्य गुरु को चुनता था; यहाँ गुरु ने शिष्य को चुना। इसका अर्थ यह है कि आपके बने रहने का भार आपकी पकड़ पर नहीं, उनकी पकड़ पर टिका है। साथ ही यह चुनाव आराम के लिए नहीं, भेजे जाने के लिए है: "ताकि तुम जाकर फल लाओ।" अनुग्रह यहाँ मीठी निष्क्रियता नहीं बनता, वह नियुक्ति बन जाता है। और जो नियुक्त किया गया है, उसे पिता से माँगने का हक़ दिया गया है, क्योंकि जिस काम के लिए वह भेजा गया है, उसके संसाधन भी उसी भेजनेवाले के ज़िम्मे हैं।

सूत्र

चुनाव की भाषा इस्राएल की भाषा है। परमेश्वर ने एक छोटे, बेमेल समूह को चुना, इसलिए नहीं कि वह योग्य था, बल्कि इसलिए कि वे प्रेम करते हैं, और उस चुनाव का उद्देश्य हमेशा दूसरों तक पहुँचना रहा। यीशु उसी धारा में खड़े होकर बोलते हैं, पर अब चुननेवाला स्वयं वे हैं। और ध्यान दीजिए कि यह वचन दाखलता के चित्र के ठीक बाद आता है: "सच्ची दाखलता मैं हूँ।" पुराने नियम में इस्राएल परमेश्वर की दाखलता कहलाया था, एक ऐसी दाखलता जिससे फल की आशा की गई और निराशा मिली। यीशु कहते हैं कि असली बेल वे हैं, और उनसे जुड़ी डालियों से फल आएगा ही। चुनाव, रोपण, फल: यह वही पुरानी कहानी है, अब मसीह में पूरी होती हुई।

दर्पण

यहाँ आपकी दो विपरीत बीमारियों पर एक साथ चोट पड़ती है। पहली, वह थकान जो सिद्ध करने से आती है। आप कलीसिया में सेवा करते हैं, घर में टिके रहते हैं, काम पर ईमानदार रहने की कोशिश करते हैं, और भीतर कहीं एक आवाज़ चलती रहती है: काफ़ी नहीं है, और करो, वरना तुम्हें हटा दिया जाएगा। यह वचन कहता है कि आपको नियुक्त किया गया है; नियुक्ति आपकी कार्यक्षमता पर नहीं, नियुक्त करनेवाले के निर्णय पर टिकी है। दूसरी बीमारी उलटी है: चुने जाने की सुविधा में बैठ जाना। "मैंने तुम्हें चुना" के तुरंत बाद "जाकर" आता है। आपके मोहल्ले में, आपकी कक्षा में, आपके दफ़्तर में कोई है जिसके लिए कोई प्रार्थना नहीं करता।

आज एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए और उसे अपनी जेब या पर्स में रख दीजिए, और अभी एक वाक्य कहिए: "पिता, यीशु के नाम से, इस जीवन में ऐसा फल लाइए जो बना रहे।"

प्रश्न

"जो कुछ पिता से माँगो, वह तुम्हें दे।" आपने माँगा है। बीमार माता-पिता के लिए, बिगड़ते विवाह के लिए, उस बच्चे के लिए जो विश्वास छोड़ चुका है। और उत्तर नहीं आया। इस वाक्य को मीठा करके निगलना बेईमानी होगी। दो बातें सच हैं और दोनों को साथ रखना पड़ता है। पहली, यह वचन खुली चेक-बुक नहीं है; यह उस व्यक्ति को दिया गया है जो भेजा गया है, और यह उस काम से जुड़ा है जिसके लिए वह भेजा गया है। दूसरी, फिर भी बहुत कुछ ऐसा रह जाता है जो ठीक उसी फल से जुड़ा था और फिर भी नहीं मिला। इसका हिसाब मेरे पास नहीं है। जिन्होंने यह वचन पहली बार सुना, उनमें से अधिकांश मारे गए; और फल बना रहा।

श्रोता

कल्पना कीजिए: ग्यारह आदमी, रात, फसह का भोजन अभी-अभी ख़त्म, और उनमें से एक अँधेरे में निकल चुका है। जो बचे हैं वे कुछ ही घंटों में भाग जाएँगे। उस क्षण में उन्हें "मैंने तुम्हें चुना" सुनना कैसा लगा होगा? उनकी दुनिया में शिष्य ही गुरु चुनता था; रब्बी के पीछे जाना एक करियर-निर्णय था। यीशु वह पूरा ढाँचा उलट देते हैं। और यूहन्ना का सुसमाचार जिन पाठकों तक पहुँचा, उनमें से कई आराधनालय से निकाले जा चुके थे, अपने परिवार और समाज से कटे हुए। जिन्हें समुदाय ने अस्वीकार किया, उन्हें यह वाक्य सँभालता है: तुम्हें छाँटा गया नहीं, तुम्हें चुना गया है।

विवरण

"तुम्हारा फल बना रहे।" यह वही शब्द है जो कुछ ही वाक्य पहले आया था: "तुम मुझ में बने रहो।" एक ही क्रिया, दो जगह। डाली बेल में बनी रहती है, और इसीलिए उसका फल बना रहता है। यानी फल का टिकाऊपन आपके परिश्रम की गुणवत्ता से नहीं, आपके जुड़े रहने से निकलता है। यह बात आपके काम को नापने के तरीक़े को बदल देती है। जो तालियों के लिए किया गया वह सीज़न के साथ सूख जाता है; जो उनमें बने रहकर किया गया, वह आपके जाने के बाद भी किसी के जीवन में साँस लेता रहेगा। आप शायद उसे कभी देखेंगे नहीं। बना रहना देखे जाने पर निर्भर नहीं करता।

चिंतन

आपकी अपनी आत्मिक कहानी किस क्रिया से शुरू होती है, आपके निर्णय से या उनके चुनाव से, और इस फ़र्क़ ने पिछले सप्ताह आपके मन को कहाँ थकाया?

जिस फल की आप आज कामना करते हैं, क्या वह आपके जाने के बाद भी बना रहेगा, या वह इसी मौसम की फ़सल है?

पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें

आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

संत अगस्तीन

अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।

उद्देश्य भरा जीवन

उद्देश्य भरा जीवन

रिक वॉरेन

चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

भाई लॉरेन्स

रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।

जंगल का छिपने का स्थान

जंगल का छिपने का स्थान

कोरी टेन बूम

नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।

जीसस कॉलिंग

जीसस कॉलिंग

सारा यंग

प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

John 15:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यूहन्ना 15:16 का क्या अर्थ है?
वाक्य एक इनकार से शुरू होता है, और यही इसकी चुभन है: "तुम ने मुझे नहीं चुना।" यीशु उन्हीं लोगों से यह कह रहे हैं जिन्हें वे अभी-अभी मित्र कह चुके हैं, उसी रात जिस रात वे पकड़वाए जाएँगे। वे कहते हैं कि पहल उनकी ओर से हुई: मैंने तुम्हें चुना, और केवल चुना ही नहीं, ठहराया भी, एक काम के लिए नियुक्त किया। वह काम है जाना और फल लाना, ऐसा फल जो टिके, मौसमी नहीं। और इस पूरी व्यवस्था के साथ एक वचन जुड़ा है: जो कुछ तुम उनके नाम से पिता से माँगोगे, पिता तुम्हें देंगे। चुनाव, नियुक्ति, फल, और प्रार्थना का अधिकार, सब एक ही साँस में।
यूहन्ना 15:16 किस विषय में है?
चुनाव की भाषा इस्राएल की भाषा है। परमेश्वर ने एक छोटे, बेमेल समूह को चुना, इसलिए नहीं कि वह योग्य था, बल्कि इसलिए कि वे प्रेम करते हैं, और उस चुनाव का उद्देश्य हमेशा दूसरों तक पहुँचना रहा। यीशु उसी धारा में खड़े होकर बोलते हैं, पर अब चुननेवाला स्वयं वे हैं। और ध्यान दीजिए कि यह वचन दाखलता के चित्र के ठीक बाद आता है: "सच्ची दाखलता मैं हूँ।" पुराने नियम में इस्राएल परमेश्वर की दाखलता कहलाया था, एक ऐसी दाखलता जिससे फल की आशा की गई और निराशा मिली। यीशु कहते हैं कि असली बेल वे हैं, और उनसे जुड़ी डालियों से फल आएगा ही। चुनाव, रोपण, फल: यह वही पुरानी कहानी है, अब मसीह में पूरी होती हुई।
यूहन्ना 15:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए और उसे अपनी जेब या पर्स में रख दीजिए, और अभी एक वाक्य कहिए: "पिता, यीशु के नाम से, इस जीवन में ऐसा फल लाइए जो बना रहे।"
यूहन्ना 15:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए: ग्यारह आदमी, रात, फसह का भोजन अभी-अभी ख़त्म, और उनमें से एक अँधेरे में निकल चुका है। जो बचे हैं वे कुछ ही घंटों में भाग जाएँगे। उस क्षण में उन्हें "मैंने तुम्हें चुना" सुनना कैसा लगा होगा? उनकी दुनिया में शिष्य ही गुरु चुनता था; रब्बी के पीछे जाना एक करियर-निर्णय था। यीशु वह पूरा ढाँचा उलट देते हैं। और यूहन्ना का सुसमाचार जिन पाठकों तक पहुँचा, उनमें से कई आराधनालय से निकाले जा चुके थे, अपने परिवार और समाज से कटे हुए। जिन्हें समुदाय ने अस्वीकार किया, उन्हें यह वाक्य सँभालता है: तुम्हें छाँटा गया नहीं, तुम्हें चुना गया है।
यूहन्ना 15:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी अपनी आत्मिक कहानी किस क्रिया से शुरू होती है, आपके निर्णय से या उनके चुनाव से, और इस फ़र्क़ ने पिछले सप्ताह आपके मन को कहाँ थकाया?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

John 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

यदि तुम मुझमें बने रहो, और मेरे वचन तुम में बने रहें, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।"

ध्यान दो, पहले शर्त है, फिर वादा। जब उसका वचन तुम्हारे भीतर बसने लगता है, तो तुम्हारी माँगें भी बदलने लगती हैं। दाखलता से जुड़ी डाली अपनी मर्ज़ी का फल नहीं माँगती।

तुम्हारी आज की प्रार्थना बताती है कि तुम किससे जुड़े हो।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 24

पिता, तूने मेरी आँखों के सामने ऐसे काम किए हैं जो कोई और नहीं कर सकता था, फिर भी कई बार मेरा मन कठोर रह जाता है। मुझे देखने की सच्ची नज़र दे, ताकि तेरे कामों को पहचानकर तुझसे और तेरे बेटे से प्रेम करूँ, न कि मुँह फेर लूँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 27

और तुम भी गवाही दोगे, क्योंकि तुम आरम्भ से मेरे साथ रहे हो।" यीशु ने उन्हें कोई भाषण याद नहीं कराया। उनकी गवाही की एक ही बुनियाद थी, वे उसके साथ रहे थे। आज भी लोग तुम्हारे तर्कों से नहीं, तुम्हारे साथ बिताए समय की महक से पहचानते हैं कि तुम किसके साथ रहे हो। सवाल यह है, तुम उसके साथ कितना रुकते हो?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 17

पिता, धन्यवाद कि आपने प्रेम को हमारी मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा, बल्कि आज्ञा दी: "तुम एक दूसरे से प्रेम रखो।" धन्यवाद उन भाई बहनों के लिए जिन्हें आपने मेरे जीवन में रखा, और इस सामर्थ्य के लिए कि मैं उन्हें क्षमा करके फिर से गले लगा सकूँ।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

कंपनी?