यहोशू 23
पाठ
बहुत साल बीत चुके हैं। युद्ध थम गए हैं, देश बँट चुका है, और यहोशू अब बूढ़ा है। वह इस्राएल के पुरनियों, न्यायियों और सरदारों को बुलाकर एक विदाई भाषण देता है: देखो, तुम्हारी ओर से लड़नेवाला यहोवा ही था, और वह आगे भी शेष जातियों को निकालेगा। इसलिए मूसा की व्यवस्था से न दाहिने मुड़ो न बाएँ, पराई जातियों के देवताओं का नाम भी मुँह पर न लाओ, उनसे विवाह-सम्बन्ध न जोड़ो। और फिर वह चेतावनी, जो सबसे कठिन है: जैसे परमेश्वर की भलाई की सब बातें पूरी हुईं, वैसे ही विपत्ति की बातें भी पूरी होंगी।
मर्म
पद 14 और 15 एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं, और उनका जोड़ा ही इस अध्याय का धर्मशास्त्रीय हृदय है। "जितनी भलाई की बातें… उनमें से एक भी बिना पूरी हुए नहीं रही" और "वैसे ही यहोवा विपत्ति की सब बातें भी तुम पर लाएगा"। यहाँ यहोशू यह नहीं कह रहा कि परमेश्वर का मूड बदल सकता है। वह कह रहा है कि परमेश्वर की सच्चाई एक ही है, और यही सच्चाई आशीष में भी और दण्ड में भी काम करती है। वाचा का परमेश्वर विश्वासयोग्य है, चाहे हम उसके वादों में खड़े हों या उसकी शर्तों को तोड़ें। अनुग्रह सस्ता नहीं होता, क्योंकि जो परमेश्वर इतनी गंभीरता से देता है, वह इतनी ही गंभीरता से पूछता भी है। भूमि उपहार थी, मगर उपहार को हल्के में लेना उसे खोने का रास्ता है।
जोड़नेवाला सूत्र
ध्यान दीजिए कि यहोशू "विश्राम" शब्द से शुरू होता है: यहोवा ने इस्राएल को शत्रुओं से विश्राम दिया। यह कनान का सबसे गहरा अर्थ है, केवल ज़मीन नहीं, बल्कि उस सृष्टि-विश्राम की झलक जिसमें परमेश्वर ने मनुष्य को रखना चाहा था। मगर यह विश्राम अधूरा है, क्योंकि जातियाँ अभी बची हैं और हृदय अभी डोलते हैं। इब्रानियों का लेखक ठीक इसी अधूरेपन पर हाथ रखता है जब वह कहता है कि यहोशू के बाद भी एक विश्राम बाकी रह गया। और वहीं मसीह खड़े होते हैं: जो हमारी ओर से लड़ा, जो शर्तों का पूरा बोझ स्वयं उठाया, और जिसमें वाचा की दोनों बातें, आशीष और श्राप, क्रूस पर मिलकर सुलझ गईं। यहोशू अपनी मृत्यु की घोषणा करता है; मसीह अपनी मृत्यु से विश्राम देते हैं।
दर्पण
यहोशू का डर यह नहीं था कि इस्राएल एक दिन खुलेआम यहोवा को नकार देगा। उसका डर धीमे घुलने का था: पड़ोसी जातियों से मेल, रिश्ते-नाते, और फिर बिना निर्णय लिए मन का फिर जाना। हमारे जीवन में यही धीमापन काम करता है। आप रविवार को चर्च में हैं, मगर पैसे के बारे में आपके निर्णय उसी तर्क पर चलते हैं जिस पर आपके दफ़्तर का हर आदमी चलता है। आप प्रार्थना करते हैं, मगर अपनी सुरक्षा की गणना बीमा, पद और सम्बन्धों पर टिकाते हैं। कोई नाटकीय धर्मत्याग नहीं, केवल एक "समधियाना रिश्ता" उन चीज़ों के साथ जो अन्त में "आँखों में काँटे" बन जाती हैं। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिस पर आप सचमुच भरोसा करके रात को चैन से सोते हैं, और उस नाम के नीचे लिखिए, "यहोवा मेरी ओर से लड़ता है", और उसे ऊँची आवाज़ में पढ़िए।
मुख्य पात्र
यहोशू इस भाषण में नायक बनने से इनकार करता है। जो व्यक्ति यरीहो के सामने खड़ा था, वह अपनी विजयों की सूची नहीं गिनाता; वह बार-बार वही एक वाक्य दोहराता है कि लड़नेवाला यहोवा था। और अपने बारे में वह सबसे सादा वाक्य कहता है: "मैं तो अब सब संसारियों की गति पर जानेवाला हूँ।" कोई आत्म-दया नहीं, कोई अमरता का दावा नहीं। एक बूढ़ा आदमी जानता है कि वह जा रहा है और उसका काम आगे किसी और के हृदय में जीएगा या मरेगा। इसी कारण उसकी आवाज़ में इतनी तीखी कोमलता है। वह डराने के लिए नहीं, प्रेम में बचाए रखने के लिए कहता है: "अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम रखने की पूरी चौकसी करना।" प्रेम की चौकसी, यह एक बुज़ुर्ग की भाषा है।
एक बारीकी
पद 8 का शब्द जो हिन्दी में "भक्ति में लवलीन" आया है, इब्रानी में दावक है, वही शब्द जो उत्पत्ति में पति-पत्नी के लिए प्रयोग होता है: "लिपट जाना", चिपक जाना, गोंद की तरह जुड़ जाना। यह आज्ञाकारिता की भाषा से ज़्यादा अन्तरंगता की भाषा है। और ठीक इसके विपरीत, चार पद बाद यहोशू विवाह-सम्बन्ध की चेतावनी देता है: जो जातियों से "चिपकेगा", वह यहोवा से "लिपटा" नहीं रह सकता। यानी मूर्तिपूजा का सवाल केवल गलत विचार का नहीं, बल्कि गलत लगाव का है। वाचा एक अनुबंध से बढ़कर एक बंधन है, और बेवफ़ाई उसका असली नाम है। यही समझ लीजिए तो पद 13 के कठोर शब्द कम मनमाने लगेंगे: टूटा भरोसा हमेशा घाव छोड़ता है।
पहला श्रोता
यह अध्याय उस पीढ़ी को लिखा गया जो अब खेत जोत रही थी, कुएँ खोद रही थी, और उन कनानी पड़ोसियों के बीच रह रही थी जिन्हें "काट डालना" अधूरा रह गया था। उनके कानों में पद 5 एक असहज वादा था: यहोवा उन्हें निकाल देगा, पर अभी नहीं। यानी उन्हें अपूर्ण विजय के बीच वफ़ादारी सीखनी थी। और बाद की पीढ़ियाँ, जो निर्वासन में यह पुस्तक पढ़ती थीं, पद 15 को भविष्यवाणी के रूप में नहीं, इतिहास के रूप में पढ़तीं: वे सचमुच "इस अच्छी भूमि के ऊपर से" उखाड़े गए थे। उनके लिए यह अध्याय आरोप-पत्र भी था और आशा भी, क्योंकि जो परमेश्वर अपनी चेतावनी में सच्चा निकला, वह अपने वादों में भी सच्चा ही होगा।
आपके जीवन में वह कौन-सा क्षेत्र है जहाँ आप परमेश्वर से "लिपटे" नहीं, केवल शिष्टाचार निभा रहे हैं?
यहोशू ने अपनी सारी उपलब्धियाँ छोड़कर केवल परमेश्वर की सच्चाई गवाही में दी। यदि आज आपको विदाई भाषण देना होता, तो आप किस बात को याद रखने योग्य कहते?
Joshua में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Vivid, pastoral and often funny, the best way into the conquest narratives.
Careful guidance through the land, the battles and the promises kept.
Joshua: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Joshua and the Flow of Biblical History
Schaeffer connects Joshua to the whole sweep of the Bible's story.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Joshua 23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यहोशू 23 का क्या अर्थ है?
यहोशू 23 किस विषय में है?
यहोशू 23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यहोशू 23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यहोशू 23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Joshua 23 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, मेरा मन बहुत जल्दी भटक जाता है। मुझे सावधान रहना सिखा, ताकि मेरा प्रेम तुझ पर ही टिका रहे। जब दूसरी चीज़ें मुझे खींचती हैं, तब याद दिला कि तेरे साथ चलना ही मेरे लिए सबसे बड़ी भलाई है।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
