यूहन्ना 14:1
पाठ
यीशु अपने शिष्यों से विदा लेने की घड़ी में खड़े हैं। अभी-अभी उन्होंने कहा है कि उनमें से एक उन्हें पकड़वाएगा और पतरस उन्हें तीन बार अस्वीकार करेगा; कमरे की हवा भारी हो चुकी है। ठीक उसी क्षण वे कहते हैं: "तुम्हारा मन व्याकुल न हो, तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो मुझ पर भी विश्वास रखो।" यह कोई ठंडी सलाह नहीं, बल्कि एक आदेश है, और साथ ही एक निमंत्रण। घबराए हुए मन को वे शांत करने की कोशिश नहीं करते किसी सुखद खबर से, बल्कि अपनी ओर इशारा करके: जिस परमेश्वर पर तुम पहले से भरोसा करते आए हो, उसी भरोसे को अब मुझ पर भी टिका दो। संकट का हल परिस्थिति बदलने में नहीं, भरोसे की दिशा में है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यीशु क्या कर रहे हैं। वे अपने आपको परमेश्वर के बराबर विश्वास का पात्र बता रहे हैं। एक यहूदी के लिए भरोसा केवल एक ही के लिए सुरक्षित था, उसी परमेश्वर के लिए जिसने इस्राएल को मिस्र से निकाला। और अब यह गलील का बढ़ई कहता है: वही भरोसा मुझ पर भी रखो। या तो यह ईशनिंदा है, या फिर यीशु सचमुच वही हैं जो वे आगे कहते हैं, "जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है।" यहाँ मसीही विश्वास की नींव पड़ती है: परमेश्वर दूर का सिद्धांत नहीं, एक चेहरा है। और दूसरी बात, उतनी ही गहरी: विश्वास कोई भावना नहीं जो अपने आप उमड़ आए, वह एक निर्णय है जिसे आज्ञा के रूप में दिया जा सकता है। व्याकुल मन के बावजूद विश्वास किया जा सकता है।
सूत्र
"मन व्याकुल न हो" कोई नई आवाज़ नहीं है। लाल समुद्र के किनारे मूसा ने डरी हुई भीड़ से यही कहा था: डरो मत, खड़े रहो, परमेश्वर तुम्हारे लिए लड़ेंगे। यहोशू से, गिदोन से, निर्वासन में बैठे इस्राएल से परमेश्वर बार-बार यही कहते आए हैं, और हर बार यह ढाढ़स किसी परिस्थिति पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति के वादे पर टिका होता है। अब वही आवाज़ माँस और हड्डी में बैठी है, उसी मेज़ पर, रोटी तोड़ती हुई। और जो अगली साँस में कहा जाता है, वह पूरी कहानी का निशाना है: "मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं।" अदन से लेकर मिलापवाले तम्बू तक, मन्दिर से लेकर नये यरूशलेम तक, परमेश्वर की एक ही ज़िद रही है कि वे अपने लोगों के साथ बसें। विश्वास का आदेश इसी घर के न्योते पर खड़ा है।
दर्पण
यह वचन आपकी घबराहट को मूर्खता नहीं कहता। यीशु स्वयं कुछ ही क्षण पहले आत्मा में व्याकुल हुए थे; वे जानते हैं कि रात के दो बजे छत को घूरते हुए मन कैसा होता है। पर वे यह भी नहीं कहते कि चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा। वे नहीं कहते कि रिपोर्ट अच्छी आएगी, कि नौकरी बची रहेगी, कि बेटा लौट आएगा। वे कहते हैं: भरोसे का रुख़ बदलो। और यहीं हमारा असली अहंकार पकड़ा जाता है, क्योंकि हम भरोसा करने से पहले सफ़ाई माँगते हैं। हम चाहते हैं कि पहले हमें समझ आए कि यह सब क्यों हो रहा है, फिर हम समर्पण करेंगे। शिष्यों को कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला, केवल एक व्यक्ति मिला। आज रात सोने से पहले उस एक चीज़ का नाम कागज़ पर लिखिए जो आपके मन को सबसे ज़्यादा व्याकुल कर रही है, और उसके नीचे ये शब्द अपने हाथ से लिखकर ज़ोर से पढ़िए: "मुझ पर भी विश्वास रखो।"
अन्य वचनों की गूँज
भजन 42 में एक आदमी अपने ही प्राण को डाँटता है, पूछता है कि तू क्यों गिरा जाता है, और फिर स्वयं को परमेश्वर की आस पर लौटने को कहता है। वहाँ मनुष्य अपने आप से यह कहता है; यहाँ यीशु हमारे लिए यह कहते हैं, और इसी में सारा फ़र्क़ है। दूसरी गूँज इसी अध्याय के भीतर है। बातचीत के अंत में यीशु वही वाक्य दोहराते हैं, इस बार शांति के वरदान के साथ: "तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।" पहली और आख़िरी पंक्ति एक ही है, और बीच में जो कुछ है, पिता का घर, मार्ग, सहायक, वह सब उस आदेश को सम्भव बनाने के लिए दिया गया है। आदेश खोखला नहीं; उसके नीचे पूरा ढाँचा है।
संदर्भ
फसह की रात है, यरूशलेम तीर्थयात्रियों से भरा हुआ, रोमी सैनिक छतों पर तैनात, महायाजक की राजनीति सक्रिय। ऊपरी कमरे में तेरह लोग बैठे हैं, यहूदा अभी-अभी अँधेरे में निकल गया है, और यीशु ने अपने चेलों के पाँव धोए हैं, वह काम जो केवल दास करता था। ये आदमी तीन साल से सब कुछ छोड़कर उनके पीछे चले हैं; उनकी रोज़ी, उनकी इज़्ज़त, उनका भविष्य इस एक व्यक्ति से बँधा है। और वही व्यक्ति कह रहा है कि वह जा रहा है। प्राचीन दुनिया में विदाई-भाषण एक जानी-पहचानी चीज़ थी; पिता मरने से पहले बेटों को अंतिम वसीयत सुनाता था। शिष्य पहचान गए होंगे कि यह क्या हो रहा है, और उसी से उनका मन बैठ गया।
पहले सुनने वाले
यूहन्ना यह सब दशकों बाद लिखता है, उन विश्वासियों के लिए जिन्होंने यीशु को कभी नहीं देखा और जिन्हें अक्सर आराधनालय से निकाल दिया गया था। परिवार टूटे, धंधे बंद हुए, कुछ मारे गए। उनके लिए "मैं जाता हूँ" कोरा धर्मशास्त्र नहीं था, वह उनका रोज़ का अनुभव था: प्रभु दिखाई नहीं देते। इसलिए यह आदेश उन्हें सीधे छूता था। विश्वास तब भी माँगा जाता है जब चेहरा सामने न हो। और उन्हें यह भी सुनाई देता था जो हम अक्सर चूक जाते हैं: यीशु ने उन्हें अनाथ नहीं छोड़ा, क्योंकि पिता के घर में जगह पहले से तैयार की जा रही है। सताव में यह घर का वादा ही उनकी सबसे ठोस ज़मीन थी।
मनन के प्रश्न
आपका मन इस समय किस बात से व्याकुल है, और आप उस बात में परमेश्वर से समझ माँग रहे हैं या भरोसा दे रहे हैं?
यदि विश्वास एक भावना नहीं बल्कि एक आदेश है, तो आज आपके लिए उसे मानने का ठोस रूप क्या होगा?
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John 14:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 14:1 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 14:1 किस विषय में है?
यूहन्ना 14:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 14:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 14:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यहूदा का सवाल बहुत ईमानदार है, "हे प्रभु, क्या हुआ कि तू अपने आप को हम पर प्रगट करना चाहता है और संसार पर नहीं?" वह चाहता था कि यीशु सबके सामने चमक जाएँ, ताकि किसी को शक न रहे। पर यीशु का जवाब कोई तमाशा नहीं था, बल्कि एक घर था। वे उसी के पास आकर रहते हैं जो उनके वचन को मानता है। सोचो, आज तुम्हारे दिल का दरवाज़ा कितना खुला है?
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