भजन संहिता 103:7
पाठ
एक ही वाक्य में दो सुनने वाले खड़े हैं। "उसने मूसा को अपनी गति, और इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए।" मूसा को परमेश्वर ने अपने चलने का ढंग बताया, अपना स्वभाव, अपनी दिशा; और पूरी जाति ने वे काम अपनी आँखों से देखे जो उस स्वभाव से निकले थे। कल्पना कीजिए: पहाड़ की तलहटी में धूल, भेड़-बकरियों की गंध, बच्चों का रोना, और ऊपर बादल में एक आदमी जो लौटकर बताएगा कि यह परमेश्वर कैसा है। नीचे वालों ने समुद्र का फटना देखा, ऊपर वाले ने यह सुना कि वह क्यों फटा। यही अंतर इस पद की धड़कन है, और अगला पद (8) मानो मूसा की उस सुनी हुई बात को शब्दों में खोल देता है: "यहोवा दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है।"
मूल बात
चमत्कार देखना और परमेश्वर को जानना एक ही चीज़ नहीं है। मिस्र से निकली भीड़ ने जितने अद्भुत काम देखे, उतने हमने कभी नहीं देखे; फिर भी वही भीड़ जंगल में बार-बार भरोसा तोड़ती रही, क्योंकि काम देखने से डर पैदा होता है, पर गति जानने से भरोसा। परमेश्वर की "गति" यानी उनका चलने का तरीका: वे कैसे न्याय करते हैं, कब रुकते हैं, किसे उठाते हैं। भजनकार यह इसलिए कहता है कि पद 6 में उसने अभी कहा है, "यहोवा सब पिसे हुओं के लिये धर्म और न्याय के काम करता है।" यह कोई नियम नहीं, यह एक चरित्र है। और परमेश्वर इस चरित्र को छिपाकर नहीं रखते; वे उसे प्रगट करते हैं। कृपा यहाँ पहले सूचना बनकर आती है, फिर अनुभव बनकर।
सूत्र
मूसा को जो मिला वह एक अधूरा वरदान था। वह परमेश्वर की गति जान गया, पर उनका चेहरा नहीं देख सका; उसे चट्टान की दरार में रखा गया और पीछे से गुज़रती महिमा दिखाई गई। इस्राएल को काम दिखे, मूसा को स्वभाव सुनाई दिया, पर दोनों के बीच अब भी एक पर्दा था। यूहन्ना इसी कमी पर उँगली रखता है जब वह कहता है कि व्यवस्था मूसा के द्वारा दी गई, पर अनुग्रह और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। मसीह में परमेश्वर की गति और परमेश्वर के काम एक ही व्यक्ति में मिल जाते हैं: जो चंगा करता है वही समझाता भी है कि क्यों चंगा करता है। भजन 103 का "दयालु और अनुग्रहकारी" अब देह पहनकर गलील की गलियों में चलता है।
दर्पण
हममें से बहुत लोग परमेश्वर के "काम" इकट्ठा करते रहते हैं। नौकरी समय पर मिल गई, रिपोर्ट साफ़ आ गई, बच्चा ठीक हो गया; हम गवाही देते हैं और सच में कृतज्ञ होते हैं। पर जिस दिन रिपोर्ट साफ़ नहीं आती, हमारे पास परमेश्वर के बारे में कहने को कुछ नहीं बचता, क्योंकि हमने कभी उनकी गति नहीं सीखी, केवल उनके परिणाम गिने थे। परिणाम बदलते हैं, स्वभाव नहीं। जब आपका बॉस अन्याय करता है, जब पैसा हाथ से फिसलता है, जब शरीर धोखा देने लगता है, तब आपको यह जानना पड़ेगा कि वे "विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय" हैं, वरना हर देरी आपको सज़ा जैसी लगेगी।
आज ही पद 8 को ज़ोर से, धीरे-धीरे तीन बार पढ़िए, और तीसरी बार में "हम पर" की जगह अपना नाम रखकर पढ़िए।
प्रसंग
भजन 103 का दाऊदी स्वर मंदिर की उपासना का है, पर इसकी हड्डियाँ मरुभूमि से आती हैं। जिस समाज में यह गाया गया, वहाँ राजा की "गति" जानना जीवन-मरण का प्रश्न था: दरबारी लोग वर्षों लगाते थे यह समझने में कि राजा किस बात पर खुश होता है और किस बात पर सिर कटवा देता है। साधारण किसान राजा के काम देखता था, कर, सेना, सड़कें, पर उसके मन तक कभी नहीं पहुँचता था; वह पहुँच केवल दरबार के भीतरी लोगों को मिलती थी। इस पद ने वह दरवाज़ा तोड़ दिया। स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे राजा (पद 19) ने अपना भीतरी मन एक भगोड़े चरवाहे को बताया, और उस चरवाहे के ज़रिये पूरी जाति को।
अंतर्पाठ
पद 8 का वाक्य कोई नई कविता नहीं है; यह निर्गमन 34 में सीनै पर्वत पर परमेश्वर की अपनी घोषणा का उद्धरण है, ठीक उस मौके पर जब इस्राएल सोने के बछड़े के बाद क्षमा का पात्र नहीं रह गया था। यानी भजनकार पद 7 में जिस "गति" की बात करता है, वह विशेष रूप से टूटी हुई वाचा के बाद प्रगट हुई करुणा है। और भजन 147:19, जिसका संकेत यहाँ दिया गया है, कहता है कि यही परमेश्वर अपने वचन याकूब को बताते हैं। परमेश्वर का तरीका यही रहा है: पहले बोलना, फिर करना; पहले अपने आप को समझाना, फिर अपने हाथ चलाना।
श्रोता का चेहरा
जो लोग यह भजन पहली बार गा रहे थे, वे निर्वासन की स्मृति या उसके बाद की गरीबी में जी रहे थे। उनके लिए "इस्राएलियों पर अपने काम" कोई पुरानी कहानी नहीं, बल्कि एक शिकायत का उत्तर था: तब आपने किया था, अब क्यों नहीं? और भजन उन्हें चतुराई से खींचकर काम से चरित्र की ओर ले जाता है। वे यह सुनते थे कि उनका इतिहास बेतरतीब नहीं था; उसके पीछे एक जाना-पहचाना स्वभाव था, जो पद 10 में खुलकर कहता है, "उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया।" यह उन लोगों की राहत की साँस है जो जानते थे कि उन्हें जो मिला, वह उनके कर्मों से बहुत कम था।
चिंतन
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