विलापगीत 3:25
पाठ
विलापगीत के तीसरे अध्याय का यह छोटा-सा वाक्य खंडहरों के बीच से उठता है: "जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिये यहोवा भला है।" कहनेवाला वही व्यक्ति है जिसने कुछ ही पंक्तियाँ पहले कहा था कि उसकी आशा टूट गई है, कि परमेश्वर ने उसे अंधेरे में बसा दिया, कि चिल्लाने पर भी प्रार्थना नहीं सुनी जाती। और अब, उसी साँस में, वह घोषणा करता है कि परमेश्वर भले हैं। किसके लिये? उनके लिये जो प्रतीक्षा करते हैं और जो खोजते हैं। यह वाक्य कोई तर्क नहीं देता, कोई प्रमाण नहीं रखता; यह केवल एक गवाही है, और उस गवाही के नीचे अभी भी राख की गंध है।
मूल भाव
ध्यान दीजिए कि यहाँ यह नहीं कहा गया कि परिस्थिति भली है, न ही यह कि दुःख का कोई सुंदर अर्थ निकल आया है। कहा यह गया है कि परमेश्वर भले हैं। यह अंतर छोटा नहीं है। विश्वास यहाँ उन लोगों के हाथ में सौंपा जा रहा है जिनके पास देखने को कुछ भी अच्छा नहीं बचा, और फिर भी जो उस ओर मुड़े रहते हैं जिससे चोट लगी महसूस हुई थी। "बाट जोहना" का अर्थ है समय को परमेश्वर के हाथ में छोड़ देना, यह मान लेना कि उत्तर मेरी घड़ी के अनुसार नहीं आएगा। और "उसके पास जाना" का अर्थ है कि प्रतीक्षा निष्क्रिय नहीं, बल्कि एक दिशा है। यहाँ अनुग्रह का रूप यही है: परमेश्वर उन्हें भले लगते हैं जो उन्हें छोड़ नहीं पाते, भले ही समझ न पाएँ।
मुख्य सूत्र
यह वचन अकेला खड़ा नहीं है; इसके ठीक बाद वाली पंक्तियाँ बताती हैं कि प्रतीक्षा का चेहरा कैसा दिखता है: चुपचाप रहना, मुँह धूल में रखना, और "अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर" फेर देना। जब सुसमाचार लिखनेवाले यीशु मसीह के अंतिम घंटों का वर्णन करते हैं, तो वे ठीक इसी मुद्रा का चित्र खींचते हैं: एक व्यक्ति जो चुप रहता है, जो मार खाता है और मुँह नहीं फेरता, जो अंधकार में से पुकारता है और तुरंत उत्तर नहीं पाता। विलापगीत का यह गुमनाम दुःखी पुरुष उस दुःखी पुरुष की ओर इशारा करता है जो बाद में आएगा और इसी प्रतीक्षा को अंत तक जीएगा। क्रूस पर जो हुआ, वह इस वचन का प्रमाण नहीं है, बल्कि उसका गहरा पुनरुच्चार है: परमेश्वर भले हैं, और उनकी भलाई अंधेरे के पार से आती है, अंधेरे से बचकर नहीं।
दर्पण
हम प्रतीक्षा को समय की बर्बादी मानते हैं। जाँच की रिपोर्ट आने तक के दस दिन, वह बेटा जिसने विश्वास छोड़ दिया और अब फोन भी नहीं उठाता, वह नौकरी जिसके लिये तीसरी बार आवेदन भेजा है, वह विवाह जिसमें बातचीत ठंडी पड़ चुकी है। इन सबमें हमारा मन दो में से एक काम करता है: या तो जबरन कुछ करके परिणाम खींच लाना चाहता है, या फिर सुन्न होकर उम्मीद छोड़ देता है। यह वचन तीसरा रास्ता सुझाता है, जो दोनों से कठिन है: उसी की ओर मुड़े रहना जिसने अभी तक उत्तर नहीं दिया। यह कोई सकारात्मक सोच नहीं, यह एक निर्णय है, और अक्सर रोते हुए लिया गया निर्णय है।
आज पाँच मिनट का अलार्म लगाइए, बैठ जाइए, और उन पाँच मिनटों में परमेश्वर से कुछ भी मत माँगिए; केवल एक वाक्य कहिए, "मैं आपकी बाट जोह रहा हूँ," और फिर चुप रहिए जब तक अलार्म न बजे।
मुख्य पात्र
इस वचन का असली पात्र परमेश्वर हैं, और यही सबसे असहज बात है। इसी अध्याय में वही परमेश्वर धनुष चढ़ाए हुए हैं, घात में बैठे सिंह हैं, वही जिसने मार्ग को पत्थरों से रोक दिया। और उन्हीं के विषय में कवि कहता है कि वे भले हैं। पाठ इस विरोधाभास को सुलझाता नहीं; वह केवल आगे बढ़कर कहता है कि प्रभु "अपने मन से" दुःख नहीं देते, कि दया उनका स्वभाव है और दण्ड उनका अंतिम शब्द नहीं। यहाँ परमेश्वर का चित्र किसी शांत, दूरस्थ देवता का नहीं है, बल्कि उस जीवित परमेश्वर का है जिससे मनुष्य झगड़ता है, शिकायत करता है, और फिर भी जिसके सिवा कहीं और नहीं जाता। विश्वास यहाँ समझ से नहीं, लगाव से जीवित रहता है।
पहले श्रोता
जिन्होंने यह पहली बार सुना, उनके लिये यरूशलेम जल चुका था। मंदिर, जो इस बात का दृश्य प्रमाण था कि परमेश्वर उनके बीच रहते हैं, राख था। राजा बंदी था, भूमि छिन चुकी थी, और बहुत से लोग सचमुच भूख से मर रहे थे। "भला" शब्द उनकी शब्दावली में अब तक इन्हीं चीज़ों से जुड़ा था: भूमि, फसल, वंश, मंदिर। अब वे सब चले गए। इसलिए इस वचन ने उनके कानों में एक चौंका देनेवाला पुनर्निर्धारण किया: भलाई अब किसी वस्तु में नहीं, व्यक्ति में है। "यहोवा मेरा भाग है," कवि ने ठीक एक पंक्ति पहले कहा था, और भाग वह शब्द है जो ज़मीन के बँटवारे से आता है। जिनकी ज़मीन छिन गई, उनके लिये परमेश्वर स्वयं ज़मीन बन गए।
एक बारीकी
मूल इब्रानी में इस वचन में एक शब्द है जिसे हिन्दी अनुवाद "उसके पास जाने" में समेट देता है: नेफ़ेश, यानी प्राण, जीवन-साँस, पूरा भीतरी मनुष्य। शाब्दिक रूप से लिखा है, "उस प्राण के लिये जो उसे खोजता है।" और यही शब्द पाँच पंक्तियाँ पहले आ चुका है: "मैं उन्हीं पर सोचता रहता हूँ, इससे मेरा प्राण ढला जाता है।" वही ढलता, झुकता, डूबता प्राण अब खोजनेवाला प्राण है। बदला कुछ नहीं; थकान वहीं है, स्मृति वहीं है, घाव वहीं हैं। केवल दिशा बदली है। यह बड़ी राहत की बात है, क्योंकि इसका अर्थ है कि खोजने के लिये पहले स्वस्थ हो जाना ज़रूरी नहीं। ढला हुआ प्राण भी खोज सकता है, और उसे भी वही उत्तर मिलता है: यहोवा भला है।
चिंतन के प्रश्न
आप जिस बात के लिये इस समय प्रतीक्षा कर रहे हैं, उसमें आप परमेश्वर से उत्तर चाहते हैं या परमेश्वर को चाहते हैं? और क्या आप इस अंतर को ईमानदारी से शब्दों में रख सकते हैं?
अगर आपकी सारी "भली" चीज़ें, जैसे स्वास्थ्य, काम, परिवार, सुरक्षा, छिन जाएँ, तो किस आधार पर आप कह पाएँगे कि परमेश्वर भले हैं?
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Lamentations 3:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
विलापगीत 3:25 का क्या अर्थ है?
विलापगीत 3:25 किस विषय में है?
विलापगीत 3:25 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
विलापगीत 3:25 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
विलापगीत 3:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Lamentations 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे यहोवा, मैंने गहिरे गड्ढे में से तेरा नाम लिया।" ध्यान दे, वह गड्ढे से निकलने के बाद नहीं पुकारता। पानी सिर के ऊपर से बह चुका था, वह कह चुका था कि सब खत्म हो गया, और वहीं से उसके होंठों पर परमेश्वर का नाम आया। तेरी प्रार्थना को सुनने के लिए परमेश्वर यह शर्त नहीं रखता कि पहले तू ऊपर आ जा। जहाँ तू आज है, उसी गहराई से नाम ले।
पिता, धन्यवाद कि जब दर्द ऐसा लगता है मानो तूने "अपने तरकश के तीरों" से भीतर तक बेध दिया हो, तब भी मैं तुझसे मुँह मोड़कर नहीं, तुझी से बात कर सकता हूँ। धन्यवाद कि तू मेरी कड़वी सच्चाई सुनता है और मुझे छोड़ता नहीं।
तूने अपने को क्रोध से ढाँप लिया और हमारा पीछा किया; तूने बिना तरस खाए हमें घात किया है।" यही लिखने वाला कुछ ही पंक्तियाँ पहले कह चुका था कि उसकी करुणा हर सुबह नई होती है। दोनों बातें एक ही मुँह से निकलीं। तेरी प्रार्थना में भी दोनों रह सकती हैं। परमेश्वर को अपनी शिकायत सुनाने से मत डर, वह तेरे सच से नहीं भागता।
यरूशलेम जल चुका था, मन्दिर राख था, और उसी मलबे के बीच बैठकर यिर्मयाह लिखता है, "यहोवा से उद्धार पाने की आस रखकर चुपचाप रहना भला है।" चुप रहना हार मानना नहीं है। यह वह भरोसा है जो चिल्लाना बंद करके सुनना शुरू करता है। तेरी वह प्रार्थना जिसका उत्तर अब तक नहीं आया, क्या तू उसे परमेश्वर के हाथ में शान्ति से छोड़ पाएगा?
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