विलापगीत 3:23
पाठ
राख में बैठा वह आदमी, जिसने अभी-अभी कहा था कि उसका बल नष्ट हो गया और यहोवा पर रखी आशा टूट गई, अचानक रुकता है। एक शब्द सब कुछ मोड़ देता है: "परन्तु मैं यह स्मरण करता हूँ, इसलिए मुझे आशा है।" और फिर वह पद आता है जिसे हम गीतों में गाते हैं, पर जिसकी जड़ मलबे में है: परमेश्वर की करुणा हर भोर के साथ नई होकर आती है, जैसे रोज़ का ताज़ा मन्ना, और उनकी सच्चाई, उनकी भरोसेमंदी, इतनी विशाल है कि उसे नापा नहीं जा सकता। तेईसवाँ पद बाईसवें की साँस है: हम मिटे नहीं, क्योंकि उनकी दया चुकती नहीं; और वह दया बासी नहीं पड़ती, हर सुबह नए सिरे से दरवाज़े पर खड़ी मिलती है।
मूल
ध्यान दीजिए कि यहाँ भाषा बदल जाती है। बाईस पदों तक वह परमेश्वर के बारे में बोलता रहा, "उसने मुझे", "उसका हाथ", "वह मेरे लिये घात में बैठे रीछ के समान है"। तीसरे पुरुष में बोलना दूरी की भाषा है, शिकायत की भाषा है। पर तेईसवें पद में वह मुड़कर सीधे कहता है: "तेरी सच्चाई महान है।" यही इस पद का धर्मशास्त्रीय हृदय है। आशा उसे तब नहीं मिली जब हालात बदले; यरूशलेम अब भी खण्डहर है, लाशें अब भी गलियों में हैं। आशा तब लौटी जब उसने परमेश्वर के चरित्र को स्मरण किया और उन्हें फिर से संबोधित करना शुरू किया। करुणा का "नया" होना कोई भावुक तसल्ली नहीं, यह वाचा की ठोस सच्चाई है: परमेश्वर की निष्ठा हमारी हालत पर नहीं, उनके अपने वचन पर टिकी है।
सूत्र
इस अध्याय की शुरुआत एक अकेले आदमी से होती है: "उसके रोष की छड़ी से दुःख भोगनेवाला पुरुष मैं ही हूँ।" एक व्यक्ति पूरे नगर का दुःख अपने शरीर में उठाए खड़ा है, तीरों से बिंधा हुआ, लोगों की हँसी का निशाना, और फिर भी वही व्यक्ति आशा की घोषणा करता है। यह छवि बाइबल में अधूरी नहीं रहती। गोलगोथा पर एक और पुरुष खड़ा हुआ, जिसने अपनी प्रजा के बदले क्रोध की छड़ी सही, जिस पर लोग सिर हिलाकर हँसे, और जिसके बाद तीसरे दिन एक भोर हुई जिसने "प्रति भोर वह नई होती रहती है" को इतिहास में गाड़ दिया। मैं यहाँ ज़बरदस्ती रूपक नहीं गढ़ रहा; विलापगीत मसीह की भविष्यवाणी नहीं है। पर परमेश्वर का काम करने का ढंग एक ही है: दुःख के बीचोंबीच से, न कि उससे बचकर, वे अपनी वाचा की सच्चाई निभाते हैं। और जब यीशु ने सिखाया कि "हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे", तो वही रोज़ाना निर्भरता फिर से हमारे मुँह में रख दी जो यहाँ हर भोर की नई करुणा है।
दर्पण
आप जानते हैं वह पल, जब सुबह चार बजे नींद टूटती है और छत को देखते हुए वही हिसाब फिर से चलने लगता है: महीने का अंत, बच्चे का नतीजा, रिपोर्ट जो अगले हफ्ते आनी है, वह रिश्ता जो पिछले साल से ठंडा पड़ा है। सुबह हमारे लिए अक्सर राहत नहीं, नया बोझ उठाने का समय होती है। यह पद उस डर को झुठलाता नहीं। यह यह नहीं कहता कि कल कुछ बुरा नहीं होगा। यह कहता है कि कल की भोर में जो चीज़ आपसे पहले पहुँच चुकी होगी, वह परमेश्वर की करुणा है, ताज़ा, बासी नहीं, कल के इस्तेमाल से घिसी हुई नहीं। हमारा गर्व यही मानने से इनकार करता है कि हमें रोज़ नए सिरे से दया चाहिए; हम एकमुश्त गारंटी चाहते हैं ताकि फिर माँगना न पड़े। पर मन्ना जमा नहीं होता था। आज रात सोने से पहले एक कागज़ पर ये पाँच शब्द लिखिए, "तेरी सच्चाई महान है", और उसे अपने फोन के ऊपर रख दीजिए, ताकि कल सुबह फोन उठाने से पहले आपकी आँख उसी पर पड़े और आप उसे ज़ोर से बोलें।
संदर्भ
ईसा से लगभग 586 वर्ष पहले, बेबीलोन की घेराबंदी के बाद यरूशलेम गिर चुका है। दीवारें टूटी हैं, मंदिर जल चुका है, राजा अंधा करके ले जाया गया है, और जो बचे हैं वे भूख के उन दिनों की स्मृति ढो रहे हैं जब माएँ अपने बच्चों को खा गईं। विलापगीत उसी मलबे पर गाया गया शोकगीत है, और यह कोई बिखरा हुआ रुदन नहीं, बल्कि कड़ी शिल्प में गढ़ा हुआ है: हर अध्याय इब्रानी वर्णमाला के क्रम में, और तीसरा अध्याय तीन गुना, हर अक्षर पर तीन पंक्तियाँ। दुःख को ढाँचा दिया गया है, क्योंकि बिना ढाँचे के दुःख आदमी को पागल कर देता है। इसी शिल्प के बीचोंबीच, ठीक बीच में, पद 22 और 23 बैठे हैं। जहाँ सबसे गहरा अंधेरा था, वहीं कवि ने जान-बूझकर रोशनी का दीया रखा।
श्रोता
पहले सुननेवाले वे लोग थे जिनका सारा धर्मशास्त्र मंदिर के साथ जल गया था। उन्हें सिखाया गया था कि सिय्योन अजेय है, कि यहोवा वहाँ बसते हैं। अब सिय्योन राख है। ऐसे कानों में "हम मिट नहीं गए" कोई हल्की तसल्ली नहीं थी, बल्कि एक चौंकाने वाला दावा: हम अभी भी यहाँ हैं, और यह हमारी ताकत नहीं, उनकी करुणा है। जिस शब्द का अनुवाद "दया" या "महाकरुणा" हुआ है, वह इब्रानी हेसेद है, वाचा में बँधी हुई निष्ठा, वह प्रेम जो वादे के कारण चलता रहता है, मूड के कारण नहीं। निर्वासितों ने इसे सुना और समझा: परमेश्वर ने हमें दण्ड दिया, पर उन्होंने वाचा नहीं तोड़ी। यह वाक्य उन्होंने आपस में दोहराया होगा, जैसे लोग मलबे में एक-दूसरे का नाम पुकारते हैं।
मुख्य पात्र
इस पद का असली पात्र परमेश्वर हैं, पर हम उन्हें एक टूटे हुए आदमी की आँख से देखते हैं, और यही इसे इतना भरोसेमंद बनाता है। यह वही आदमी है जिसने कुछ पंक्तियाँ पहले परमेश्वर को घात लगाए बैठा रीछ और सिंह कहा था। वह अपने उन शब्दों को वापस नहीं लेता। वह यह नहीं कहता कि मैं गलत था, दुःख असली नहीं था। वह दोनों सच्चाइयों को एक ही साँस में पकड़े रहता है: वही हाथ जिसने मुझे मारा, वही हाथ हर भोर मुझे सँभालता है। यही पक्की आस्था का चेहरा है, इनकार का नहीं। और परमेश्वर का चरित्र जो यहाँ उभरता है वह नरम नहीं है, पर वह चुकता भी नहीं; उनकी निष्ठा हमारे उतार-चढ़ाव से बड़ी है, इतनी बड़ी कि उसे केवल "महान" कहा जा सकता है।
चिंतन
आपने पिछली बार कब परमेश्वर से शिकायत और परमेश्वर पर भरोसा, दोनों एक ही प्रार्थना में कहे थे, और यदि नहीं, तो आप किसे बचा रहे हैं?
कल की भोर में जो करुणा आपसे पहले पहुँच चुकी होगी, उसे पहचानने के लिए आपको अपनी सुबह की पहली दस मिनट में क्या बदलना होगा?
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Lamentations 3:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
विलापगीत 3:23 का क्या अर्थ है?
विलापगीत 3:23 किस विषय में है?
विलापगीत 3:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
विलापगीत 3:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
विलापगीत 3:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Lamentations 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे यहोवा, मैंने गहिरे गड्ढे में से तेरा नाम लिया।" ध्यान दे, वह गड्ढे से निकलने के बाद नहीं पुकारता। पानी सिर के ऊपर से बह चुका था, वह कह चुका था कि सब खत्म हो गया, और वहीं से उसके होंठों पर परमेश्वर का नाम आया। तेरी प्रार्थना को सुनने के लिए परमेश्वर यह शर्त नहीं रखता कि पहले तू ऊपर आ जा। जहाँ तू आज है, उसी गहराई से नाम ले।
पिता, धन्यवाद कि जब दर्द ऐसा लगता है मानो तूने "अपने तरकश के तीरों" से भीतर तक बेध दिया हो, तब भी मैं तुझसे मुँह मोड़कर नहीं, तुझी से बात कर सकता हूँ। धन्यवाद कि तू मेरी कड़वी सच्चाई सुनता है और मुझे छोड़ता नहीं।
तूने अपने को क्रोध से ढाँप लिया और हमारा पीछा किया; तूने बिना तरस खाए हमें घात किया है।" यही लिखने वाला कुछ ही पंक्तियाँ पहले कह चुका था कि उसकी करुणा हर सुबह नई होती है। दोनों बातें एक ही मुँह से निकलीं। तेरी प्रार्थना में भी दोनों रह सकती हैं। परमेश्वर को अपनी शिकायत सुनाने से मत डर, वह तेरे सच से नहीं भागता।
यरूशलेम जल चुका था, मन्दिर राख था, और उसी मलबे के बीच बैठकर यिर्मयाह लिखता है, "यहोवा से उद्धार पाने की आस रखकर चुपचाप रहना भला है।" चुप रहना हार मानना नहीं है। यह वह भरोसा है जो चिल्लाना बंद करके सुनना शुरू करता है। तेरी वह प्रार्थना जिसका उत्तर अब तक नहीं आया, क्या तू उसे परमेश्वर के हाथ में शान्ति से छोड़ पाएगा?
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