बाइबल व्याख्या

विलापगीत 4

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अध्याय शुरू होता है सोने से जो खोटा हो गया, और मंदिर के पवित्र पत्थर जो अब गली के मोड़ों पर पड़े हैं। फिर कवि उतरता है उस गली में: दूध पीते बच्चों की जीभ प्यास से तालू में चिपकी है, मखमल में पले लोग कूड़े के ढेर पर लेटे हैं, और "दयालु स्त्रियों ने अपने ही हाथों से अपने बच्चों को पकाया है।" अंत में दोष का नाम लिया जाता है, भविष्यद्वक्ता और याजक, और एदोम को दिखाया जाता है कि जो कटोरा सिय्योन ने पिया, वह उस तक भी पहुँचेगा।

मर्म

यह अध्याय परमेश्वर के क्रोध को कोई अमूर्त सिद्धांत नहीं रहने देता; वह उसे भूख का रूप देता है। ग्यारहवीं आयत सीधी है: "यहोवा ने अपनी पूरी जलजलाहट प्रगट की।" और तेरहवीं आयत बताती है कि यह मनमानी नहीं थी, यह न्याय था, जो धर्मियों के लहू के कारण आया। यहाँ परमेश्वर के विषय में एक कठोर सच्चाई है: वे अन्याय को अनदेखा नहीं करते, और जब वे उसका हिसाब लेते हैं, तो परिणाम अपराधियों के दफ्तर तक सीमित नहीं रहते, वे बच्चों की थाली तक पहुँचते हैं। पाप कभी निजी नहीं होता। नेताओं के निर्णय गलियों में शरीर बनकर दिखते हैं, और यही इस पुस्तक का नैतिक बोझ है।

मुख्य सूत्र

बीसवीं आयत सबसे मार्मिक है: "यहोवा का अभिषिक्त जो हमारा प्राण था… वह उनके खोदे हुए गड्ढों में पकड़ा गया।" जिस राजा की छाया में जीने की आशा थी, वह पकड़ा गया। दाऊद का वंश गड्ढे में है, और इस्राएल की आशा टूटी हुई पड़ी है। परमेश्वर की कहानी यहीं रुकती नहीं। एक और अभिषिक्त आएगा जो पकड़ा जाएगा, परन्तु अपने पाप के कारण नहीं। इक्कीसवीं आयत का "कटोरा" यहाँ एदोम की ओर बढ़ता है; सुसमाचार में वही कटोरा गतसमने में उस अभिषिक्त के हाथ में आता है जो उसे स्वेच्छा से पीता है। बाईसवीं आयत की घोषणा, "तेरे अधर्म का दण्ड समाप्त हुआ," क्रूस पर अपनी पूरी ध्वनि पाती है।

दर्पण

यह अध्याय हमारी उस धारणा पर चोट करता है कि हमारी सुविधा किसी की कीमत पर नहीं टिकी है। सत्रहवीं आयत विशेष रूप से चुभती है: "हम लगातार एक ऐसी जाति की ओर ताकते रहे जो बचा नहीं सकी।" यरूशलेम मिस्र की ओर देखता रहा। हम किसकी ओर देखते हैं? उस प्रमोशन की ओर, जिसके मिलने पर घर की तनातनी खुद ठीक हो जाएगी; उस बीमा पॉलिसी या बचत की ओर, जो बुढ़ापे को सुरक्षित कर देगी; उस एक व्यक्ति की ओर, जिसकी स्वीकृति से हमारा मूल्य तय होता है। आँखें धुँधली हो जाती हैं, और बचाव नहीं आता। दूसरी ओर चौथी आयत है: "बाल-बच्चे रोटी माँगते हैं, परन्तु कोई उनको नहीं देता।" यह वाक्य किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, एक व्यवस्था का वर्णन है जिसमें देने वाला कोई नहीं बचा।

आज यह करो: एक कागज़ पर उस एक चीज़ या व्यक्ति का नाम लिखो जिसकी ओर तुम्हारी आँखें बचाव के लिए ताक रही हैं, और उसे देखकर ज़ोर से कहो, "तू मुझे बचा नहीं सकती," और फिर वह कागज़ फाड़ दो।

मुख्य पात्र

इस अध्याय में केंद्रीय पात्र परमेश्वर हैं, परन्तु एक असहज रूप में। वे यहाँ बोलते नहीं; वे कार्य करते हैं। उन्होंने आग लगाई, उन्होंने तितर-बितर किया, उनका कोप भड़का। सोलहवीं आयत कहती है, "वह फिर उन पर दयादृष्टि न करेगा," और यह वाक्य पाठक के गले में अटक जाता है। फिर भी यही परमेश्वर बाईसवीं आयत में समय की एक सीमा खींचते हैं: दण्ड समाप्त हुआ। उनका क्रोध अनंत नहीं है, उनकी करुणा है। यहाँ परमेश्वर का चित्र किसी चिड़चिड़े देवता का नहीं, बल्कि उस न्यायी का है जो अन्याय को गंभीरता से लेता है, इतना गंभीरता से कि उसके अपने नगर को भी नहीं छोड़ता, और फिर भी अंत का ऐलान करता है।

एक बारीकी

पहली आयत का "पवित्रस्थान के पत्थर" सड़क के सिरे पर फेंके गए हैं। ध्यान दो, ये मूर्तियाँ नहीं, पवित्र पत्थर हैं। जो कभी अलग किए गए थे, वे अब धूल में हैं, किसी के ठोकर खाने की चीज़। और दूसरी आयत इसे लोगों पर लागू करती है: सिय्योन के पुत्र, जो कुन्दन जैसे थे, अब मिट्टी के घड़े गिने जाते हैं। यही पाप की असली कार्यशैली है, वह नष्ट नहीं करता, वह अवमूल्यन करता है। जो पवित्र था, वह सस्ता हो जाता है। अपने जीवन में देखो: कौन सी चीज़ पहले पवित्र थी, विवाह की निष्ठा, रविवार, शब्द की सच्चाई, और अब गली के मोड़ पर पड़ी है, किसी योजना से नहीं, बस लापरवाही से।

अंतर्पाठ

छठी आयत सदोम का नाम लेती है, और चुभती हुई तुलना करती है: सदोम एक क्षण में उलट गया, यरूशलेम की पीड़ा महीनों खिंची। उत्पत्ति में सदोम का न्याय अचानक था; यहाँ धीमी भूख है, और कवि कहता है कि यह अधिक भारी है। परमेश्वर के लोग होना सुरक्षा कवच नहीं, अधिक जवाबदेही है। दूसरा सूत्र इक्कीसवीं आयत का कटोरा है। नबियों में यह क्रोध के कटोरे का चित्र बार-बार आता है, और गतसमने में यीशु मसीह उसी कटोरे को टालने की प्रार्थना करते हैं, फिर पी जाते हैं। जो सिय्योन ने आंशिक रूप से पिया, वह उन्होंने पूरा पिया।

चिंतन

चौथी आयत में रोटी माँगने वाले बच्चे हैं और देने वाला कोई नहीं; तुम्हारे जीवन में इस समय कौन माँग रहा है, और तुम क्यों नहीं दे रहे?

सत्रहवीं आयत की "धुँधली आँखें" तुम्हारे किस इंतज़ार का वर्णन करती हैं, और उस इंतज़ार को छोड़ने में तुम्हें किस बात का डर है?

Lamentations में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Lamentations

Christopher Wright

Learning to grieve honestly with the Bible's own book of tears.

Jeremiah and Lamentations: An Introduction and Commentary

Hetty Lalleman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Jeremiah, Lamentations

J. Andrew Dearman

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Lamentations 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

विलापगीत 4 का क्या अर्थ है?
अध्याय शुरू होता है सोने से जो खोटा हो गया, और मंदिर के पवित्र पत्थर जो अब गली के मोड़ों पर पड़े हैं। फिर कवि उतरता है उस गली में: दूध पीते बच्चों की जीभ प्यास से तालू में चिपकी है, मखमल में पले लोग कूड़े के ढेर पर लेटे हैं, और "दयालु स्त्रियों ने अपने ही हाथों से अपने बच्चों को पकाया है।" अंत में दोष का नाम लिया जाता है, भविष्यद्वक्ता और याजक, और एदोम को दिखाया जाता है कि जो कटोरा सिय्योन ने पिया, वह उस तक भी पहुँचेगा।
विलापगीत 4 किस विषय में है?
बीसवीं आयत सबसे मार्मिक है: "यहोवा का अभिषिक्त जो हमारा प्राण था... वह उनके खोदे हुए गड्ढों में पकड़ा गया।" जिस राजा की छाया में जीने की आशा थी, वह पकड़ा गया। दाऊद का वंश गड्ढे में है, और इस्राएल की आशा टूटी हुई पड़ी है। परमेश्वर की कहानी यहीं रुकती नहीं। एक और अभिषिक्त आएगा जो पकड़ा जाएगा, परन्तु अपने पाप के कारण नहीं। इक्कीसवीं आयत का "कटोरा" यहाँ एदोम की ओर बढ़ता है; सुसमाचार में वही कटोरा गतसमने में उस अभिषिक्त के हाथ में आता है जो उसे स्वेच्छा से पीता है। बाईसवीं आयत की घोषणा, "तेरे अधर्म का दण्ड समाप्त हुआ," क्रूस पर अपनी पूरी ध्वनि पाती है।
विलापगीत 4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह करो: एक कागज़ पर उस एक चीज़ या व्यक्ति का नाम लिखो जिसकी ओर तुम्हारी आँखें बचाव के लिए ताक रही हैं, और उसे देखकर ज़ोर से कहो, "तू मुझे बचा नहीं सकती," और फिर वह कागज़ फाड़ दो।
विलापगीत 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहली आयत का "पवित्रस्थान के पत्थर" सड़क के सिरे पर फेंके गए हैं। ध्यान दो, ये मूर्तियाँ नहीं, पवित्र पत्थर हैं। जो कभी अलग किए गए थे, वे अब धूल में हैं, किसी के ठोकर खाने की चीज़। और दूसरी आयत इसे लोगों पर लागू करती है: सिय्योन के पुत्र, जो कुन्दन जैसे थे, अब मिट्टी के घड़े गिने जाते हैं। यही पाप की असली कार्यशैली है, वह नष्ट नहीं करता, वह अवमूल्यन करता है। जो पवित्र था, वह सस्ता हो जाता है। अपने जीवन में देखो: कौन सी चीज़ पहले पवित्र थी, विवाह की निष्ठा, रविवार, शब्द की सच्चाई, और अब गली के मोड़ पर पड़ी है, किसी योजना से नहीं, बस लापरवाही से।
विलापगीत 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
चौथी आयत में रोटी माँगने वाले बच्चे हैं और देने वाला कोई नहीं; तुम्हारे जीवन में इस समय कौन माँग रहा है, और तुम क्यों नहीं दे रहे?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Lamentations 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

यरूशलेम गिर चुका है, और जो याजक कभी आदर के योग्य थे, अब उनकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता। "यहोवा ने आप ही उन्हें तितर-बितर किया।" यह सबसे भारी वाक्य है। मनुष्य नहीं, परमेश्वर स्वयं। सोच, क्या तेरा पद तुझे बचा लेगा, या तेरा हृदय? आदर बाहर से मिलता है, पर परमेश्वर भीतर देखता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

जो स्वादिष्ट भोजन खाते थे, वे सड़कों पर व्याकुल पड़े हैं; जो बैंजनी वस्त्र पहने पले थे, वे राख के ढेर से लिपटे हैं।" यिर्मयाह सिर्फ मंदिर के गिरने का शोक नहीं कर रहा, वह बच्चों के चेहरे देख रहा है। जो सुख हमें सुरक्षित लगता है, वह एक घेराबंदी की दूरी पर है। आज जो थाली तुम्हारे सामने है, उसे हक नहीं, दया समझकर खाओ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

सिय्योन के बहुमूल्य पुत्र जो चोखे कुन्दन के तुल्य थे, वे अब कुम्हार के बनाए हुए मिट्टी के घड़ों के समान गिने जाते हैं!"

ध्यान दो, सोना बदला नहीं, लोगों की आँखें बदल गईं। विपत्ति में तुम्हारी कीमत घटती नहीं, बस लोग तुम्हें कम आँकने लगते हैं। और मिट्टी का घड़ा भी तो किसी के हाथों की रचना है। जो कुम्हार तुम्हें गढ़ता है, वही जानता है तुम कितने मूल्यवान हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

पृथ्वी के राजाओं को, वरन् जगत के किसी रहनेवाले को भी इसका विश्वास न था कि द्रोही और शत्रु यरूशलेम के फाटकों के भीतर घुसने पाएँगे।" किसी ने कल्पना तक न की थी। पर अगली आयत बताती है कि दीवार नहीं, भीतर का पाप टूटा था। जो चीज़ें तुम्हें अभेद्य लगती हैं, तुम्हारा घर, तुम्हारा विश्वास, वे बाहर से नहीं, भीतर से गिरती हैं। आज अपने भीतर झाँको।

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