व्यवस्थाविवरण 32:35
पाठ
मूसा के गीत के बीचों-बीच परमेश्वर अपने बारे में एक बात कहते हैं जो सुनने में डरावनी है और साथ ही राहत देने वाली: "पलटा लेना और बदला देना मेरा ही काम है, यह उनके पाँव फिसलने के समय प्रगट होगा; क्योंकि उनकी विपत्ति का दिन निकट है, और जो दुःख उन पर पड़नेवाले हैं वे शीघ्र आ रहे हैं।" इससे ठीक पहले वाला पद तस्वीर पूरी करता है: यह सब परमेश्वर के भण्डार में जमा है, मुहरबन्द, अपने समय की प्रतीक्षा में। न्याय भूला नहीं गया; वह बस अभी खोला नहीं गया।
मर्म
प्राचीन संसार में "बदला" कोई असभ्य शब्द नहीं था, वह व्यवस्था का ढाँचा था। जिस समाज में पुलिस नहीं थी, वहाँ खून का बदला परिवार का कर्तव्य था। इसी पृष्ठभूमि में परमेश्वर कहते हैं: यह काम मेरा है। यह वाक्य दो दिशाओं में काटता है। एक ओर यह घोषणा करता है कि अन्याय अनदेखा नहीं रह जाएगा, संसार नैतिक रूप से खोखला नहीं है, हिसाब होगा। दूसरी ओर यह मनुष्य के हाथ से तलवार छीन लेता है। बदला परमेश्वर का विशेषाधिकार है, इसलिए वह मेरा अधिकार नहीं। और ध्यान दीजिए, यहाँ जिनके पाँव फिसलने की बात है वे विदेशी नहीं, परमेश्वर की अपनी बिगड़ी हुई प्रजा भी हो सकती है। परमेश्वर का न्याय पक्षपाती नहीं है।
जोड़ने वाला सूत्र
"पाँव फिसलने का समय" एक तीखी छवि है: चट्टानी ढलान पर चलता हुआ आदमी, जिसका पैर एक बार डगमगाया तो नीचे। पूरा गीत परमेश्वर को "चट्टान" कहता है, जिस पर पैर टिकते हैं; जो उस चट्टान को छोड़ता है, उसका फिसलना तय है। बहुत बाद में पौलुस रोमियों 12 में यही पद उद्धृत करते हैं, पर उलटी दिशा में: क्योंकि बदला परमेश्वर का है, इसलिए तुम अपने बैरी को खाना खिलाओ। मसीह के क्रूस पर वह मुहरबन्द भण्डार खुला, पर उसका बोझ दोषी पर नहीं, निर्दोष पर गिरा। इसी गीत का अन्तिम पद पहले ही उस दिशा में इशारा करता है: परमेश्वर "अपने देश और अपनी प्रजा के पाप के लिये प्रायश्चित देगा।" न्याय टला नहीं; वह किसी और के कंधे पर उतरा।
दर्पण
आपके भीतर भी कोई फाइल है जिसे आपने बन्द नहीं किया। वह सहकर्मी जिसने आपकी मेहनत का श्रेय ले लिया, वह रिश्तेदार जिसने पैसे के मामले में धोखा दिया, वह व्यक्ति जिसने आपके बच्चे को चोट पहुँचाई। हम कहते हैं कि हमने माफ कर दिया, पर मन में एक छोटी सी अदालत चुपचाप चलती रहती है, जहाँ हम वकील भी हैं, गवाह भी और न्यायी भी। यह पद उस अदालत को भंग नहीं करता, उसे परमेश्वर के हाथ में सौंप देता है। यह सस्ती सलाह नहीं है कि "जाने दो"। यह इससे कठिन है: भरोसा करो कि परमेश्वर तुमसे बेहतर हिसाब रखते हैं, और उनका हिसाब तुम्हारे हिसाब से ज्यादा सही और ज्यादा दयालु दोनों होगा।
श्रोताओं का चेहरा
कल्पना कीजिए मोआब के मैदान, यरदन के पूर्वी किनारे पर तम्बुओं का समुद्र, धूल, बकरियों की गंध, और चालीस साल से भटकती एक पीढ़ी जो अब पार जाने वाली है। सामने कनान है: पक्की दीवारों वाले नगर, अंगूर के बाग, जैतून के पेड़ जो उन्होंने नहीं लगाए। उनका नेता, एक सौ बीस साल का बूढ़ा आदमी, उन्हें विजय का गीत नहीं, चेतावनी का गीत सिखा रहा है। ये लोग जानते थे कि युद्ध में हारा हुआ राष्ट्र समझ लेता था कि उसका देवता कमजोर था। इसलिए इस गीत में यह बात चौंकाने वाली थी: अगर तुम हारोगे, तो इसलिए नहीं कि यहोवा कमजोर हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने ही "उनको दूसरों के हाथ में" कर दिया। हार भी परमेश्वर के नियंत्रण में है।
शास्त्र की गूँज
पद 34 का चित्र समझने लायक है: राजा के भण्डारगृह में मिट्टी की मुहर लगे मटके, जिन पर लिखा है कि भीतर क्या है, और जिन्हें केवल मालिक खोल सकता है। परमेश्वर का न्याय ऐसा ही संचित है। और गीत आगे बढ़कर दिखाता है कि वह भण्डार केवल क्रोध से नहीं भरा: "जब यहोवा देखेगा कि मेरी प्रजा की शक्ति जाती रही… तब यहोवा अपने लोगों का न्याय करेगा, और अपने दासों के विषय में तरस खाएगा।" वही हाथ जो घायल करता है, वही चंगा भी करता है, जैसा पद 39 खुलकर कहता है। यीशु ने जब यरूशलेम के लिये आँसू बहाए, तो वही स्वर था: काश ये अपने अन्त का विचार करते।
मुख्य पात्र
इस गीत का मुख्य पात्र मनुष्य नहीं, परमेश्वर हैं, और उनका चित्र सरल नहीं है। वे उकाब हैं जो अपने बच्चों को पंखों पर उठाता है, और वे तीर चलाने वाले योद्धा भी। वे पिता हैं जिन्होंने मोल लिया, और वे न्यायी जिनसे कोई छुड़ा नहीं सकता। पद 27 में तो वे लगभग अपने आप से बहस करते दिखते हैं: पूरी तरह मिटा देने का विचार उन्होंने रोक लिया, कहीं शत्रु यह न समझ बैठें कि यह उनके अपने बल से हुआ। यह ठंडे न्यायाधीश की छवि नहीं है। यह एक ऐसे परमेश्वर की छवि है जिसका क्रोध उनके प्रेम से निकलता है, न कि उसके विरुद्ध खड़ा है। वे जल्दबाजी में नहीं मारते; वे मुहर लगाकर प्रतीक्षा करते हैं, और उनकी प्रतीक्षा भी अनुग्रह है।
चिंतन
आपके मन के "भण्डार" में कौन सा हिसाब मुहरबन्द रखा है, जिसे आप परमेश्वर के हाथ में सौंपने के बजाय खुद खोलना चाहते हैं?
अगर परमेश्वर का न्याय टलता है पर मिटता नहीं, तो उनकी देरी को आप कैसे पढ़ते हैं: उदासीनता के रूप में, या पश्चाताप के लिये दिए गए समय के रूप में?
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Deuteronomy 32:35 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
व्यवस्थाविवरण 32:35 का क्या अर्थ है?
व्यवस्थाविवरण 32:35 किस विषय में है?
व्यवस्थाविवरण 32:35 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
व्यवस्थाविवरण 32:35 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
व्यवस्थाविवरण 32:35 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Deuteronomy 32 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
मूसा के गीत में परमेश्वर कहता है, "मैं अपना मुख उनसे छिपा लूँगा, और देखूँगा कि उनका अन्त क्या होगा।" ध्यान दे, गुस्से में भी वह उन्हें "लड़के" कहता है। पिता का रिश्ता टूटा नहीं, बस उसका मुख छिप गया। आज तेरी प्रार्थनाओं में जो सन्नाटा लगता है, कहीं वह तुझे लौटाने की पुकार तो नहीं?
मूसा अपने जीवन के अंत में खड़ा है, और वह अपने शब्दों के लिए यही चाहता है: "मेरा उपदेश मेंह के समान बरसेगा, और मेरी बातें ओस के समान टपकेंगी, जैसे कि कोमल घास पर झींसी।" हथौड़े की तरह नहीं, ओस की तरह। घास को चीरा नहीं जाता, भिगोया जाता है। सोचो, परमेश्वर का वचन तुम पर कैसे उतरता है? और तुम्हारे शब्द दूसरों पर कैसे गिरते हैं, बरसात बनकर या ओले बनकर?
परमेश्वर कहते हैं, "मैंने कहा था, कि मैं उनको दूर-दूर तक तितर-बितर करूँगा, और मनुष्यों में से उनका स्मरण मिटा दूँगा।" पर वाक्य वहीं रुक जाता है। अगली आयत बताती है कि वे रुक गए, अपने नाम के कारण। सोचो, तुम्हारे जीवन में भी कितनी बार वह न्याय पूरा करने से रुके होंगे। जो नहीं हुआ, वह भी उनकी दया थी।
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