विलापगीत 4:4
पाठ
दूध पीते शिशु की जीभ प्यास से तालू में चिपक गई है; वह रो भी नहीं पाता, क्योंकि रोने के लिए भी नमी चाहिए। और जो बच्चे चलना-बोलना सीख चुके हैं, वे रोटी माँगते हुए गली-गली घूमते हैं, पर कोई उनके हाथ में एक टुकड़ा भी नहीं रखता। घेराबंदी में पड़े यरूशलेम की भूख यहाँ किसी आँकड़े में नहीं, बल्कि एक सूखी हुई नन्ही जीभ में मापी गई है, और उससे भी भारी उस चुप्पी में जो माँगने वाले बच्चे को उत्तर में मिलती है।
मूल बात
यह पद परमेश्वर के विषय में कुछ ऐसा कहता है जिसे हम आसानी से निगल नहीं पाते। विलापगीत का लेखक इस भूख को संयोग नहीं कहता; अध्याय के आगे वह सीधे कहता है, "यहोवा ने अपनी पूरी जलजलाहट प्रगट की।" यानी वाचा तोड़ने का दण्ड केवल राजाओं और याजकों पर नहीं गिरता, वह उन गलियों तक उतरता है जहाँ बच्चे रोटी माँगते हैं। यही पाप की सामाजिक प्रकृति है: नेतृत्व का अधर्म सबसे पहले सबसे कमजोर की थाली खाली करता है। पर ध्यान दीजिए, लेखक इस दृश्य को छिपाता नहीं, न ही उसे धर्मशास्त्रीय सफाई से ढाँकता है। वह परमेश्वर के सामने उसे रखता है। शिकायत यहाँ अविश्वास नहीं, बल्कि विश्वास का सबसे कच्चा रूप है: जो न्याय करते हैं, उन्हीं के सामने पीड़ा रखी जाती है, क्योंकि और कहीं रखने से कुछ बदलता नहीं।
साझा सूत्र
रोटी और पानी बाइबल की कहानी की रीढ़ हैं। जंगल में परमेश्वर ने भूखी भीड़ के लिए मन्ना गिराया और चट्टान से पानी निकाला; वाचा का अर्थ ही यह था कि जो प्रजा उनकी है वह भूखी न रहेगी। इसलिए यरूशलेम की गलियों में खाली हाथ लौटता बच्चा केवल एक मानवीय त्रासदी नहीं, वाचा के उलट जाने का चिह्न है। और यहीं से एक धागा आगे बढ़ता है: वह जो अपने आप को जीवन की रोटी कहते हैं, स्वयं भूखे होकर जंगल में परखे जाते हैं, और अन्त में क्रूस पर सूखी जीभ लिए कहते हैं कि उन्हें प्यास लगी है। विलापगीत की यह नन्ही चिपकी हुई जीभ मसीह के मुँह में लौटकर आती है। परमेश्वर इस दृश्य से दूर खड़े नहीं रहते; वे इसमें उतरते हैं।
दर्पण
यह पद हमारी सबसे सभ्य भूख को नंगा करता है: सुरक्षा की भूख। हम बीमा, बचत, नौकरी की स्थिरता, बच्चों का भविष्य, इन सबको इसलिए जोड़ते हैं ताकि कभी वह क्षण न आए जब हमारा बच्चा माँगे और हमारे पास देने को कुछ न हो। यह डर पापपूर्ण नहीं है, पर वह हमें अंधा कर सकता है, क्योंकि जिस गली में हमारा बच्चा भरा हुआ है, उसी शहर में कोई और बच्चा खाली हाथ लौट रहा है। विलापगीत उस चुप्पी पर उँगली रखता है, "कोई उनको नहीं देता।" वह चुप्पी हमेशा शत्रु की नहीं होती; अक्सर वह पड़ोसी की होती है। आज ही किसी एक ऐसे बच्चे या परिवार का नाम कागज़ पर लिखिए जिसे आप जानते हैं कि उनके घर में कमी है, और अभी, इसी घंटे, एक भोजन जितनी राशि या सामान उन तक पहुँचा दीजिए।
अन्तर्पाठ
दो जगहें इस पद के साथ टकराती हैं और उसे रोशन करती हैं। पहली, भजन 22, जहाँ पीड़ित कहता है कि उसकी जीभ तालू से चिपक गई है; वही चित्र, वही शब्द, पर वहाँ वह प्रार्थना बन जाता है, और सुसमाचार उसे क्रूस पर रखता है। दूसरी, मत्ती 7 में यीशु का प्रश्न: कौन पिता है जो अपने बेटे के रोटी माँगने पर उसे पत्थर थमा दे? यीशु इसे स्वर्गीय पिता की भलाई का प्रमाण मानकर पूछते हैं। पर विलापगीत 4:4 उसी प्रश्न को उल्टा खड़ा करता है: यहाँ बच्चे रोटी माँगते हैं और उन्हें पत्थर भी नहीं मिलता, केवल खाली हाथ। बाइबल इस तनाव को हल किए बिना दोनों वचन अपने भीतर रखती है, और यही उसकी ईमानदारी है।
कठिन प्रश्न
क्या ऐसा न्याय उचित है जिसमें दूध पीता बच्चा भुगते, जिसने न मूर्ति पूजी, न झूठी भविष्यवाणी की? पद 13 दोष स्पष्ट रूप से भविष्यद्वक्ताओं और याजकों पर डालता है, फिर भी मरता शिशु है। इसका कोई साफ-सुथरा उत्तर पाठ नहीं देता, और जो देते हैं वे पाठ से आगे बढ़ जाते हैं। हम इतना कह सकते हैं: पाप कभी निजी नहीं रहता, वह समुदाय के जल में फैले रंग की तरह है, और परमेश्वर के न्याय में इतिहास को उसके अपने परिणामों के हवाले कर देना शामिल है। पर यह व्याख्या दर्द को कम नहीं करती। विलापगीत इसे कम करना भी नहीं चाहता। वह दृश्य को खुला छोड़ देता है, परमेश्वर के सामने, और अध्याय के अन्त में केवल इतना कहता है कि दण्ड की एक सीमा है।
पृष्ठभूमि
समय लगभग 587 ईसा पूर्व। बेबीलोन की सेना ने यरूशलेम को लगभग डेढ़ वर्ष घेरे रखा। दीवारों के भीतर खेत नहीं थे, कुएँ सीमित थे, और अनाज पहले सैनिकों और कुलीनों तक पहुँचता था। प्राचीन पूर्व में बच्चे परिवार की सम्पत्ति और भविष्य माने जाते थे; उन्हें खिलाना पिता का सम्मान था और अतिथि को रोटी देना पवित्र कर्तव्य। इसलिए "कोई उनको नहीं देता" केवल भूख का नहीं, समाज के ढह जाने का बयान है। जो शहर स्वयं को परमेश्वर का निवास कहता था, वहाँ मानवता की सबसे बुनियादी रीति टूट चुकी थी। लेखक, जो सम्भवतः इस विनाश का चश्मदीद था, यह सब सुनी-सुनाई बात के रूप में नहीं, आँखों देखे हाल के रूप में लिखता है।
चिंतन
आपके अपने शहर या मोहल्ले में वह "चुप्पी" कहाँ है, जहाँ कोई माँग रहा है और उत्तर नहीं मिल रहा, और आप उस चुप्पी का हिस्सा कैसे बने हुए हैं?
जब आप परमेश्वर के सामने अपनी सबसे कड़वी शिकायत रखते हैं, तो क्या आप उसे शब्दों में कहते हैं, या उसे "उचित" बनाकर पहले नरम कर लेते हैं?
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Lamentations 4:4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
विलापगीत 4:4 का क्या अर्थ है?
विलापगीत 4:4 किस विषय में है?
विलापगीत 4:4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
विलापगीत 4:4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
विलापगीत 4:4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Lamentations 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यरूशलेम गिर चुका है, और जो याजक कभी आदर के योग्य थे, अब उनकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता। "यहोवा ने आप ही उन्हें तितर-बितर किया।" यह सबसे भारी वाक्य है। मनुष्य नहीं, परमेश्वर स्वयं। सोच, क्या तेरा पद तुझे बचा लेगा, या तेरा हृदय? आदर बाहर से मिलता है, पर परमेश्वर भीतर देखता है।
यरूशलेम की दीवारें बाहर से गिरीं, पर दरार भीतर से शुरू हुई थी। "यह उसके भविष्यद्वक्ताओं के पापों और उसके याजकों के अधर्म के कामों के कारण हुआ है।" जिनका काम था परमेश्वर की ओर से बोलना, उन्हीं के हाथ निर्दोषों के लहू से रंगे थे। सोचो, तुम्हें जो थोड़ा सा भी अधिकार मिला है, वह किसी की रक्षा कर रहा है या किसी को कुचल रहा है?
पिता, धन्यवाद कि कभी आपके लोग "हिम से अधिक निर्मल और दूध से अधिक उजले" दिखते थे, क्योंकि यह उजलापन उनका अपना नहीं, आपकी पवित्रता की देन था। धन्यवाद कि मसीह में आप आज भी मलिन हुए जीवनों को धोकर फिर से चमका देते हैं।
दयालु स्त्रियों ने अपने ही हाथों से अपने बच्चों को पकाया।" रुककर सोचिए, यिर्मयाह उन्हें फिर भी दयालु कहता है। ये क्रूर औरतें नहीं थीं, ये माँएँ थीं जिन्हें भूख ने भीतर से खोखला कर दिया। पाप सिर्फ शहर की दीवारें नहीं गिराता, वह कोमलता भी सुखा देता है। आपके भीतर कौन सा लंबा अकाल चल रहा है, जो धीरे धीरे आपकी करुणा छीन रहा है?
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