मत्ती 7
पाठ
पहाड़ी उपदेश का आखिरी हिस्सा एक के बाद एक चेतावनी और वादा रखता है: दूसरों पर दोष लगाने से पहले अपनी ही आँख का लट्ठा देखो; पवित्र वस्तु कुत्तों के आगे मत डालो; माँगते रहो, ढूँढ़ते रहो, खटखटाते रहो, क्योंकि स्वर्गीय पिता अपने बच्चों को पत्थर नहीं देते। फिर यीशु दो रास्ते खोलकर रख देते हैं, संकरा और चौड़ा, दो तरह के पेड़ जिन्हें फल से पहचाना जाता है, दो तरह के लोग जो एक ही "हे प्रभु, हे प्रभु" कहते हैं पर जिनका अंजाम अलग है, और आखिर में दो घर, एक चट्टान पर और एक रेत पर, जिन पर एक ही आँधी टकराती है। भीड़ चुप रह जाती है, चकित, क्योंकि यह आदमी शास्त्रियों की तरह नहीं, अधिकारी की तरह बोलता है।
मूल बात
यहाँ दो चीज़ें एक साथ चलती हैं, और उन्हें अलग करना ही सबसे बड़ी भूल होगी। एक तरफ परमेश्वर वह पिता हैं जो देते हैं: रोटी माँगने वाले को पत्थर नहीं, मछली माँगने वाले को साँप नहीं। यीशु हमारी बुराई को मानकर भी तर्क करते हैं, "जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो", तो पिता कितना अधिक। दूसरी तरफ वही उपदेश कहता है कि हर कोई भीतर नहीं जाएगा, कि नाम लेना काफी नहीं, कि चमत्कार भी सबूत नहीं। जो चीज़ फ़ैसला करती है वह है सुनकर मानना, यानी इन बातों पर घर बना देना। कृपा कोई ढीली चीज़ नहीं; वह माँगने वालों को खुली मुट्ठी से मिलती है और फिर पूरा जीवन माँग लेती है। और ध्यान दीजिए कि अंतिम दिन जो कहेगा "मैंने तुम को कभी नहीं जाना", वह कोई और नहीं, यही उपदेशक है।
जोड़ने वाला सूत्र
यह उपदेश हवा में नहीं लटकता। "व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है" कहकर यीशु पूरे पुराने नियम को एक वाक्य में बाँध देते हैं: जो तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, वही तुम उनके साथ करो। सीनै पर्वत पर परमेश्वर ने पत्थर की पटियाओं पर लिखा था; यहाँ एक पहाड़ी पर बैठा आदमी अपने अधिकार से वही व्यवस्था खोलकर उसका हृदय दिखा रहा है। और वह घर की नींव अपनी बातों को बनाता है, न कि परंपरा को, न मंदिर को। पुराने नियम में चट्टान हमेशा परमेश्वर के लिए इस्तेमाल होने वाला नाम था। यीशु उस नाम को अपनी शिक्षा पर रख देते हैं। इसीलिए भीड़ चकित है: यह दावा या तो ईशनिंदा है, या फिर वे सचमुच वही हैं जो कहते हैं।
आईना
आपकी आँख का लट्ठा वह चीज़ है जिसे आप देख नहीं पाते, इसलिए नहीं कि वह छोटी है, बल्कि इसलिए कि वह इतनी पास है कि आपकी नज़र का हिस्सा बन चुकी है। जिस सहकर्मी की सुस्ती आपको खटकती है, जिस रिश्तेदार की कंजूसी पर आपने पिछले हफ़्ते टिप्पणी की, जिस मसीही भाई के बारे में आपने "चिंता" के नाम पर किसी तीसरे से बात की, उन सब में आपकी पैनी नज़र काम करती है। और वही नज़र अपने ऊपर मुड़ते ही धुँधली हो जाती है। यीशु इसे "कपटी" कहते हैं, नरम शब्द नहीं। साथ ही यह पाठ डराता है कि आप वर्षों से "हे प्रभु, हे प्रभु" कह सकते हैं, सेवा कर सकते हैं, समूह चला सकते हैं, और फिर भी सुनी हुई बात पर घर न बनाया हो। आँधी आपके विश्वास को नहीं बनाती, सिर्फ़ दिखा देती है।
आज एक कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी कमी आपने पिछले सात दिनों में किसी और के सामने बताई है, और उसके ठीक नीचे एक वाक्य में वह लट्ठा लिखिए जो आपकी अपनी आँख में है, फिर वह वाक्य ज़ोर से परमेश्वर के सामने बोलकर कागज़ फाड़ दीजिए।
प्रसंग
गलील की एक पहाड़ी ढलान, यीशु की सेवा का शुरुआती दौर, और सामने बैठी भीड़ ज़्यादातर किसान, मछुआरे, दिहाड़ी मज़दूर। इनके लिए रोटी और मछली कोई रूपक नहीं थे, वही रोज़ का खाना था; पत्थर और साँप वैसे ही दिखते थे जैसे गलील की झील किनारे गोल पत्थर और खेतों के साँप। घर बनाने की तस्वीर भी उनकी थी: सूखी घाटी में रेत पर बना घर गर्मियों में ठीक लगता है, पर बरसात में वहीं से बाढ़ का पानी बहता है। धार्मिक अधिकार शास्त्रियों के पास था, जो हमेशा किसी बड़े रब्बी का हवाला देकर बोलते थे। यीशु किसी का हवाला नहीं देते। यह उस समय के धार्मिक ढाँचे पर सीधा सवाल था, और वहाँ बैठे लोग यह बात तुरंत समझ गए।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु दो चेहरों के साथ खड़े हैं और दोनों असली हैं। एक तरफ वे पिता की उदारता के बारे में इतने आश्वस्त हैं कि तीन क्रियाएँ लगातार रख देते हैं: माँगो, ढूँढ़ो, खटखटाओ, जैसे कोई दरवाज़ा भीतर से खुलने को तैयार खड़ा हो। दूसरी तरफ वही व्यक्ति न्याय के दिन खुद न्यायी की कुर्सी पर बैठा दिखता है और कहता है, "मैंने तुम को कभी नहीं जाना।" ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि तुमने मुझे नहीं जाना। रिश्ता उनकी ओर से पहचाना जाता है। यह वह करुणा है जो नरम नहीं होती और वह अधिकार है जो क्रूर नहीं होता। जो आदमी थोड़ी देर बाद कोढ़ी को छूएगा, वही यहाँ रेत पर बने घर को गिरते हुए दिखाता है, बिना नज़र चुराए।
श्रोताओं का चेहरा
मत्ती जिनके लिए लिख रहे थे, वे ज़्यादातर यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, मंदिर के विनाश के आसपास के दशकों में, अपने ही समाज से कटते हुए। उनके बीच सचमुच ऐसे लोग घूम रहे थे जो भविष्यद्वाणी करते और चमत्कार का दावा करते थे, इसलिए "भेड़ों के भेष में फाड़नेवाले भेड़िए" उनके लिए मुहावरा नहीं, चेहरा था। "फलों से पहचान लोगे" उन्हें एक व्यावहारिक कसौटी देता था, बिना किसी संस्था के, बिना किसी प्रमाणपत्र के। और "थोड़े हैं जो उसे पाते हैं" उनके लिए हार का बयान नहीं, हिम्मत की बात थी: छोटी संख्या का मतलब गलत रास्ता नहीं। जो हम अक्सर व्यक्तिगत आत्मपरीक्षण के रूप में पढ़ते हैं, उन्होंने एक डरे हुए, सिकुड़ते समुदाय के लिए जीने का नक्शा समझा।
चिंतन
पिछली बार जब कोई आँधी आपके घर से टकराई, तो वह किस बात पर टिका रहा या डगमगाया: सुनी हुई बातों पर, या मानी हुई बातों पर?
आप जिन बातों के लिए परमेश्वर से माँगना बंद कर चुके हैं, क्या वह इसलिए है कि उन्हें छोड़ दिया है, या इसलिए कि आपको भीतर से लगता है कि वे पत्थर ही देंगे?
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Matthew 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 7 का क्या अर्थ है?
मत्ती 7 किस विषय में है?
मत्ती 7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु ने प्रार्थना सिखाते हुए हमें "बुरे" कहा, और उसी साँस में याद दिलाया कि बुरे होकर भी तुम अपने बच्चे को पत्थर नहीं, रोटी देते हो। "तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?" सोच, तेरा अधूरा, थका हुआ प्रेम भी बच्चे को भूखा नहीं रहने देता। फिर पिता का प्रेम तुझे कैसे भूल सकता है? आज माँगने से मत डर।
या तू अपने भाई से कैसे कह सकता है कि ला मैं तेरी आँख से तिनका निकाल दूँ और देख तेरी ही आँख में लट्ठा है?" ज़रा सोच, आँख में लट्ठा लिए कोई दूसरे की आँख के पास जाए तो वह मदद नहीं, चोट पहुँचाएगा। जिसे तू सुधारना चाहता है, कहीं तू उसे घायल तो नहीं कर रहा? पहले अपनी आँख साफ़ कर, फिर तेरा हाथ कोमल हो जाएगा।
पिता, धन्यवाद कि आप मुझे मेरी अपनी आँख का लट्ठा दिखाते हैं, न कि केवल भाई की आँख का तिनका। आपकी यह खरी बात मुझे शर्मिंदा नहीं, स्वतंत्र करती है। धन्यवाद कि आप मुझे दूसरों को आँकने से हटाकर अपनी दया के सामने झुकना सिखाते हैं।
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