लूका 1:52
पाठ
मरियम का गीत यहाँ अचानक राजनीति की भाषा बोलने लगता है। एक गाँव की किशोरी, जो अभी-अभी गर्भवती हुई है और पहाड़ी देश में अपनी रिश्तेदार के घर खड़ी है, कहती है: "उसने शासकों को सिंहासनों से गिरा दिया; और दीनों को ऊँचा किया।" दो क्रियाएँ, दो दिशाएँ। ऊपर बैठे हुए नीचे उतार दिए गए; नीचे पड़े हुए उठा लिए गए। और ध्यान दीजिए, दोनों क्रियाएँ भूतकाल में हैं। मरियम यह नहीं कहतीं कि परमेश्वर ऐसा करेंगे, वे कहती हैं कि परमेश्वर ने ऐसा कर दिया है। जबकि हेरोदेस अब भी अपने सिंहासन पर बैठा है और रोम की सेनाएँ अब भी गलील की सड़कों पर चलती हैं। यह वाक्य उस दुनिया का वर्णन करता है जो अभी दिखाई नहीं देती।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के चरित्र के बारे में कुछ ऐसा कहा जा रहा है जिसे हम आसानी से रूपक बनाकर नरम कर देते हैं। मरियम किसी आंतरिक, आध्यात्मिक अनुभव की बात नहीं कर रहीं। सिंहासन असली होते हैं, और उनसे गिरना असली गिरना होता है। परमेश्वर की पवित्रता केवल पाप से घृणा नहीं है, वह सत्ता के उस ढाँचे से भी असहमति है जो कुछ लोगों को ऊँचा और बाकियों को अदृश्य बनाए रखता है। पर रुकिए: क्या यह केवल अदला-बदली है, ऊपरवाले नीचे और नीचेवाले ऊपर? तब तो सिंहासन बना ही रहता। शायद मरियम इससे गहरी बात कह रही हैं, कि परमेश्वर स्वयं एक गर्भ में उतरकर उस पूरे पैमाने को ही अर्थहीन कर रहे हैं जिससे हम ऊँचाई नापते हैं। अनुग्रह केवल पक्ष नहीं बदलता, वह तराजू तोड़ देता है।
सूत्र
यह गीत मरियम का अपना आविष्कार नहीं है। सदियों पहले हन्ना नाम की एक और स्त्री ने, जिसकी गोद खाली थी और जिसका उपहास होता था, लगभग यही शब्द गाए थे: परमेश्वर कंगाल को धूल से उठाते हैं और घमंडियों को तोड़ते हैं। मरियम उस पुरानी धुन को उठाकर आगे गाती हैं, मानो इस्राएल की स्मृति उनके गले से बोल रही हो। और यही पैटर्न आगे चलकर एक क्रूस पर अपने चरम पर पहुँचता है, जहाँ सिंहासन से गिरना और ऊँचा उठाया जाना एक ही व्यक्ति में, एक ही दिन में घटता है। जो सबसे ऊँचे थे वे सबसे नीचे उतरे, और इसी उतरने में परमेश्वर ने सारे सिंहासनों की हवा निकाल दी। मरियम को यह सब मालूम नहीं था। फिर भी उनका गीत ठीक उसी दिशा में इशारा कर रहा था।
दर्पण
यह पद हमें उस जगह छूता है जहाँ हम अपनी कीमत नापते हैं। आप जानते हैं वह पल: दफ़्तर में जब किसी और को वह ज़िम्मेदारी मिलती है जिसकी आपने तैयारी की थी; रिश्तेदारी में जब बातचीत उसी के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका मकान बड़ा है; चर्च में भी, जहाँ मंच पर खड़े होना और कुर्सियाँ लगाना दो अलग दर्जे बन जाते हैं। मरियम का गीत दोनों तरफ़ चुभता है। अगर आप नीचे हैं, तो यह कहता है कि परमेश्वर की दृष्टि आपसे नहीं हटी, भले ही किसी ने आपका नाम न लिया हो। अगर आप ऊपर हैं, तो यह पूछता है कि आपका सिंहासन कितना टिकाऊ है। आज कोई एक व्यक्ति चुनिए जिसे आप रोज़ देखते हैं पर जिसका नाम आप नहीं जानते, सफ़ाईकर्मी, चौकीदार, चाय लाने वाला, और आज ही उससे उसका नाम पूछकर उसे याद रखिए।
प्रश्न
पर वह भूतकाल अखरता है। यदि परमेश्वर ने शासकों को गिरा ही दिया, तो हेरोदेस कुछ ही महीनों बाद बेतलहम के बच्चों को क्यों मार सका? मरियम का अपना बेटा रोमी सूली पर क्यों चढ़ा? आज भी अत्याचारी बिस्तर पर, बुढ़ापे में, सम्मान के साथ मरते हैं। यह गीत झूठा लगता है, जब तक कि हम यह न मानें कि मरियम उस समय से बोल रही हैं जो परमेश्वर के यहाँ पहले ही पूरा हो चुका है और हमारे यहाँ अभी खुल रहा है। पर यह उत्तर दर्द कम नहीं करता, केवल उसे सहने योग्य बनाता है। शायद इसीलिए यह गीत उन्हीं लोगों के मुँह में सबसे सच्चा लगता है जिन्हें कुचला गया है। वे इसे प्रमाण की तरह नहीं, प्रतिज्ञा की तरह गाते हैं।
पृष्ठभूमि
यह लगभग ईसा पूर्व 6 का यहूदिया है। हेरोदेस, रोम का पिछलग्गू राजा, भव्य निर्माण और खूनी शक का साम्राज्य चला रहा है। मन्दिर की याजकीय व्यवस्था रोम के साथ समझौते में जी रही है। इस दुनिया में इज़्ज़त सब कुछ है और इज़्ज़त का हिसाब सार्वजनिक है। मरियम इस पैमाने पर लगभग शून्य हैं: गलील की, स्त्री, किशोरी, अविवाहित और गर्भवती, यानी बदनामी की तैयार सामग्री। एलीशिबा वर्षों तक बाँझपन के ताने सहती रही हैं। ये दोनों स्त्रियाँ, एक पहाड़ी गाँव के घर में, सत्ता के पलट जाने का गीत गा रही हैं, और उन्हें कोई सुन नहीं रहा। लूका इसी को आरम्भ कहता है।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र मरियम नहीं हैं। दोनों क्रियाओं का कर्ता परमेश्वर हैं: उन्होंने गिराया, उन्होंने ऊँचा किया। मरियम अपने बारे में एक शब्द नहीं कहतीं, वे केवल गवाह हैं। और जो परमेश्वर यहाँ सामने आते हैं, वे तटस्थ नहीं हैं। वे देखते हैं, और देखने के बाद हस्तक्षेप करते हैं। पर उनका हस्तक्षेप बिजली की तरह नहीं, गर्भ की तरह है: धीमा, छिपा हुआ, नौ महीने लम्बा। यह परमेश्वर का सबसे विचलित करने वाला पक्ष है। वे शक्तिशाली हैं, पर वे जल्दी में नहीं। वे न्याय करते हैं, पर अक्सर इतने धीरे कि हमें संदेह होने लगता है। और फिर भी, जिस दिन सब खुलेगा, कोई कहेगा कि उसने चेतावनी नहीं पाई? यह गीत तो गाया जा चुका है।
चिंतन
आपके भीतर कौन सा छोटा सिंहासन है जिस पर आप बैठे रहना चाहते हैं, और आप उसे छोड़ने से क्यों डरते हैं?
अगर आपको यह विश्वास करना पड़े कि परमेश्वर ने पहले ही कुछ कर दिया है जो अभी दिखता नहीं, तो आज आपके निर्णयों में क्या बदलेगा?
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Luke 1:52 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Luke 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
जकरयाह और इलीशिबा के बारे में लिखा है, "वे दोनों परमेश्वर के सामने धर्मी थे, और प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलनेवाले थे।" और फिर अगली ही आयत कहती है कि उनके कोई सन्तान न थी। धर्मी होना हर दरवाज़ा नहीं खोलता। तुम्हारी वफ़ादारी के बदले भी शायद सन्नाटा ही मिला हो। पर परमेश्वर गिन रहा था, वर्षों तक, चुपचाप।
फिर जब उसकी सेवा के दिन पूरे हुए, तो वह अपने घर चला गया।" जकर्याह मंदिर में स्वर्गदूत से मिला, पर इसके बाद भी उसने अपनी बाकी सेवा के दिन पूरे किए, और फिर चुपचाप घर लौट गया। कोई भीड़ नहीं, कोई गवाही नहीं, बस एक गूँगा मुँह और भीतर छिपा हुआ वादा। क्या तुम भी परमेश्वर के किसी वादे को चुपचाप घर तक ले जा रहे हो? वह वहाँ भी काम करता है, जहाँ कोई देख नहीं रहा।
मरियम कहती है, "उसने अपना भुजबल दिखाया, और जो अपने मन में घमण्ड करते थे, उन्हें तितर-बितर किया।" ध्यान दे, घमंड कहाँ पकड़ा गया? मन में। बाहर से कोई कुछ नहीं देख पाता, पर परमेश्वर वहीं हाथ डालता है। शायद तेरे भीतर भी कोई चुपचाप बना हुआ सिंहासन है, जिसे तूने किसी को नहीं दिखाया। वह उसे जानता है, और उसे गिराना उसकी दया है, दंड नहीं।
पिता, इलीशिबा की तरह मुझे भी हिम्मत दे कि जब सब लोग कुछ और कहें, तब भी मैं तेरी बात पर टिकी रहूँ। मेरे डर को दूर कर, और मुझे भरोसा दे कि तेरा चुना हुआ रास्ता ही सबसे भला है। तू जो नाम मुझे देता है, वही मेरी पहचान हो।
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