लूका 16
पाठ
एक भण्डारी पकड़ा जाता है, नौकरी जाने ही वाली है, और वह आख़िरी घंटों में मालिक के देनदारों के खाते घटाकर अपने लिए दोस्त बना लेता है, "अपनी खाता-बही ले और बैठकर तुरन्त पचास लिख दे।" यीशु इस बेईमान आदमी की चतुराई की सराहना करते हैं, फिर बात मोड़ देते हैं: थोड़े में विश्वासयोग्यता, सच्चा धन, और वह दो टूक वाक्य कि "तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।" लोभी फरीसी हँसते हैं; यीशु उन्हें व्यवस्था, राज्य और विवाह की पवित्रता की याद दिलाते हैं। और फिर दूसरी कहानी आती है: बैंगनी कपड़े पहनने वाला धनवान और उसकी डेवढ़ी पर पड़ा घावों से भरा लाज़र, जिनकी स्थिति मृत्यु के बाद पूरी तरह उलट जाती है।
केंद्रीय सत्य
पूरे अध्याय की रीढ़ एक छोटा-सा शब्द है: "पराए धन।" भण्डारी के पास जो कुछ था, वह उसका कभी था ही नहीं, और यही हमारी भी सच्चाई है। सृष्टि परमेश्वर की है, हम किरायेदार हैं जिनसे एक दिन लेखा माँगा जाएगा। यहीं से धन एक धार्मिक प्रश्न बन जाता है, नैतिक भर नहीं: पैसा एक प्रतिद्वंद्वी स्वामी है जो भक्ति माँगता है, इसलिए यीशु "सेवा" शब्द इस्तेमाल करते हैं, प्रबंध नहीं। और लाज़र की कहानी दिखाती है कि परमेश्वर के राज्य में न्याय केवल अंत में जुड़ी हुई पूँछ नहीं, बल्कि वह दृष्टि है जिससे वर्तमान को पढ़ना है। धनवान का पाप क्रूरता नहीं थी; वह बस डेवढ़ी पर पड़े आदमी को रोज़ पार करके निकल जाता था। अनदेखी भी एक निर्णय है, और उसका लेखा होगा।
मुख्य सूत्र
अब्राहम का उत्तर पूरे अध्याय को उद्धार-इतिहास में जोड़ देता है: "उनके पास तो मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकें हैं, वे उनकी सुनें।" वाचा का परमेश्वर कभी चुप नहीं रहा। व्यवस्था में विधवा, अनाथ और परदेशी की चिंता कोई परिशिष्ट नहीं थी, वह वाचा की देह थी। इसलिए धनवान का दोष अज्ञान नहीं, अनसुनी है। और पद 31 का अंत लूका के पाठक के लिए बिजली की तरह गिरता है: "यदि मरे हुओं में से कोई भी जी उठे तो भी उसकी नहीं मानेंगे।" यह वाक्य ईस्टर की ओर इशारा करता है। जो मन व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के आगे बंद है, वह खुली कब्र के आगे भी बंद रहेगा। पुनरुत्थान विश्वास पैदा नहीं करता; वह उस विश्वास को पूरा करता है जो सुनने से जन्मा है।
दर्पण
यह अध्याय हमारी सबसे सम्मानजनक आदत पर उँगली रखता है: सुरक्षा को भक्ति समझ लेना। हम कहते हैं हम परमेश्वर की सेवा करते हैं, पर हमारा असली विचार-विमर्श ईएमआई, बीमा, बच्चों की फ़ीस और रिटायरमेंट के इर्द-गिर्द घूमता है, और वहाँ परमेश्वर से सलाह नहीं ली जाती। धनवान ने लाज़र को सताया नहीं; वह बस उसके ऊपर से नज़र फिसला देता था, जैसे हम सोसाइटी के गेट पर बैठे चौकीदार, कूड़ा उठाने वाली स्त्री, या दफ़्तर के उस सहकर्मी के ऊपर से फिसला देते हैं जिसकी परेशानी हमें असुविधाजनक लगती है। फरीसियों की हँसी भी हमारी है: हम लोभ को "समझदारी" कहकर धर्म के साथ बैठा लेते हैं। पर "परमेश्वर तुम्हारे मन को जानता है।"
आज घर या दफ़्तर से निकलते समय उस एक व्यक्ति से उसका नाम पूछिए जिसे आप रोज़ पार करके निकल जाते हैं, वह नाम कागज़ पर लिखिए और उसे लेकर प्रार्थना कीजिए।
शास्त्र-संवाद
व्यवस्थाविवरण 15 में इस्राएल को आदेश है कि वे अपने कंगाल भाई के लिए हाथ न मूँदें, और हर सातवें वर्ष कर्ज़ छोड़ दें। यह पृष्ठभूमि दोनों दृष्टान्तों को जोड़ती है: बेईमान भण्डारी अनजाने में वही करता है जो वाचा माँगती थी, कर्ज़ घटाना, जबकि धर्मपरायण दिखने वाला धनवान वही नहीं करता जो मूसा ने सीधे कहा था। दूसरा प्रतिध्वनि यूहन्ना 11 से आती है, जहाँ एक और लाज़र सचमुच कब्र से निकलता है, और उसका परिणाम विश्वास नहीं बल्कि यीशु को मार डालने का षड्यंत्र होता है। लूका 16:31 वहाँ अक्षरशः पूरा होता है। शास्त्र स्वयं गवाही देता है कि चमत्कार कठोर हृदय को नहीं पिघलाते; सुनना पिघलाता है।
पृष्ठभूमि
यीशु यरूशलेम की ओर बढ़ रहे हैं, और अध्याय 15 के तीन खोए हुओं के दृष्टान्तों के तुरंत बाद यह शिक्षा आती है, उन्हीं फरीसियों की उपस्थिति में जिन्हें लूका सीधे "लोभी" कहता है। गलील की अर्थव्यवस्था में बड़े ज़मींदार अक्सर अनुपस्थित रहते थे और भण्डारी पूरे तंत्र को चलाता था: वह पट्टे तय करता, तेल और गेहूँ में कर्ज़ लिखता, और मालिक के नाम पर हस्ताक्षर करता। सौ मन तेल या गेहूँ छोटे किसान का नहीं, पूरे गाँव जितना कर्ज़ था। इसलिए खाता घटते ही देनदार भण्डारी के आजीवन कृतज्ञ हो जाते। दूसरी ओर बैंगनी कपड़ा और मलमल आयातित विलासिता थे, राजाओं की पोशाक; और कुत्ते अशुद्ध जानवर थे। लाज़र को मेज़ की जूठन नहीं मिली, कुत्तों की लार मिली।
एक बारीकी
यीशु के किसी दृष्टान्त में किसी पात्र का नाम नहीं है, केवल यहाँ। कंगाल का नाम है लाज़र, जो इब्रानी "एलीआज़ार" का रूप है, अर्थात "परमेश्वर सहायता करता है", और धनवान अंत तक बेनाम रहता है। धरती पर यह उल्टा था: धनवान का नाम हर दावत में लिया जाता होगा, कंगाल केवल "वह भिखारी" था। पर स्वर्ग की पंजिका दूसरी है। जिसे कोई नहीं जानता था, उसे स्वर्गदूत नाम से उठा ले जाते हैं; जो सबका जाना-पहचाना था, वह पीड़ा में केवल "हे पिता अब्राहम" पुकारता है, और तब भी लाज़र को नाम लेकर बुलाता है, मानो वह अब भी नौकर हो। मृत्यु ने उसकी हालत बदल दी, उसकी दृष्टि नहीं।
चिंतन के प्रश्न
आपके पैसे के फ़ैसलों में कौन-सा फ़ैसला ऐसा है जिसे आप "समझदारी" कहते हैं पर परमेश्वर के सामने रखने में झिझकते हैं?
आपकी "डेवढ़ी" पर कौन पड़ा है, यानी वह कौन है जिसकी ज़रूरत आपको दिखती तो है पर जिसे आप रोज़ पार कर जाते हैं?
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