मरकुस 1:38
मूल पाठ
भोर के अँधेरे में यीशु अकेले प्रार्थना करने निकल गए हैं, और शमौन उन्हें खोजता हुआ आ पहुँचता है, एक ऐसी खबर लेकर जो किसी भी सेवक के कान में मीठी लगती है: "सब लोग तुझे ढूँढ़ रहे हैं।" कफरनहूम का पूरा नगर कल शाम द्वार पर इकट्ठा था, बीमार चंगे हुए, दुष्टात्माएँ निकलीं, नाम फैल गया। पर यीशु उस भीड़ की ओर लौटते नहीं। उनका उत्तर है: "आओ; हम और कहीं आस-पास की बस्तियों में जाएँ, कि मैं वहाँ भी प्रचार करूँ, क्योंकि मैं इसलिए निकला हूँ।" सफलता के ठीक बीचोंबीच वे शहर छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि उनका काम माँग पूरी करना नहीं, बल्कि भेजे जाने का उद्देश्य निभाना है।
केंद्रीय बात
यहाँ यीशु अपने जीवन की दिशा किसी ज़रूरत से नहीं, बल्कि अपने भेजे जाने से तय करते हैं। "मैं इसलिए निकला हूँ" में एक ऐसा उद्देश्य बोलता है जो कफरनहूम की भीड़ से पुराना है, जो उस स्वर से जुड़ा है जिसने यरदन के किनारे कहा था, "तू मेरा प्रिय पुत्र है।" ध्यान दीजिए कि वे चंगाई को केंद्र नहीं बनाते, प्रचार को बनाते हैं; रोग मिटाना परमेश्वर के राज्य का चिह्न है, संदेश नहीं। और यह हमारे लिए काँटेदार है: हर पुकार परमेश्वर की पुकार नहीं होती। लोगों की माँग, तालियाँ, और यह एहसास कि "मेरी ज़रूरत है", हमें उस काम से भी भटका सकते हैं जिसके लिए हम वास्तव में भेजे गए हैं। यीशु दिखाते हैं कि आज्ञाकारिता कभी-कभी लौटने में नहीं, आगे बढ़ जाने में है।
सूत्र
मरकुस ने अपनी पुस्तक की शुरुआत ही एक चलती हुई आवाज़ से की थी: "जंगल में एक पुकारनेवाले का शब्द हो रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो।" यशायाह की वह भविष्यवाणी किसी स्थिर मंदिर की नहीं, एक बनते हुए रास्ते की तस्वीर है। परमेश्वर अपनी प्रजा के पास लौट रहे हैं, और उनका आना एक यात्रा है। इसलिए यीशु का कफरनहूम में न रुकना कोई मूड नहीं, बल्कि उसी मार्ग पर चलना है। यह गति गलील की बस्तियों से शुरू होकर यरूशलेम और क्रूस तक जाएगी, और वहीं नहीं रुकेगी: जो शिष्य आज "आओ" सुन रहे हैं, वही बाद में स्वयं भेजे जाएँगे। सुसमाचार का स्वभाव ही फैलना है; जहाँ कलीसिया अपने ही सफल कोने में जम जाती है, वहाँ वह अपने प्रभु से पीछे छूट जाती है।
दर्पण
"सब लोग तुझे ढूँढ़ रहे हैं" वाक्य में एक नशा है, और हम उसे अच्छी तरह पहचानते हैं। दफ्तर में वह प्रोजेक्ट जो केवल आप सँभाल सकते हैं, कलीसिया में वह ज़िम्मेदारी जिसे छोड़ना आपको अपराधी महसूस कराता है, वह रिश्तेदार जो हर संकट में सबसे पहले आपको फोन करता है। ज़रूरत पड़ना अच्छा लगता है, और धीरे-धीरे हम अपनी पहचान इसी में गाड़ देते हैं कि कोई हमें ढूँढ़ रहा है। तब हमारा कैलेंडर हमारी बुलाहट से नहीं, दूसरों की आपात स्थितियों से भरता है, और सबसे ज़रूरी काम, वह जिसे परमेश्वर ने हमारे हाथ में दिया है, हमेशा "अगले हफ्ते" के लिए टलता रहता है। ध्यान दीजिए, यीशु आलसी नहीं हो रहे; वे और कठिन काम की ओर जा रहे हैं। उद्देश्य से जीने का मतलब कम करना नहीं, सही काम करना है।
आज दस मिनट निकालिए और एक कागज़ पर एक ही वाक्य लिखिए: "मैं इसलिए निकला हूँ…" उसे अपने शब्दों में पूरा कीजिए, फिर नीचे उस एक माँग का नाम लिखिए जिसे आप इस हफ्ते विनम्रता से "नहीं" कहेंगे।
संदर्भ
यह सब एक ही लंबे दिन के बाद हो रहा है। सब्त के दिन आराधनालय में उपदेश, फिर शमौन के घर में उसकी सास की चंगाई, और सूर्य डूबते ही, जब सब्त समाप्त हुआ और लोग बीमारों को उठाकर ला सकते थे, "सारा नगर द्वार पर इकट्ठा हुआ।" कफरनहूम गलील की झील के किनारे एक मछुआरों का कस्बा था, चुंगी की चौकी वाला, जहाँ खबर तेज़ी से फैलती थी। ऐसे समाज में जहाँ मान-सम्मान सार्वजनिक पूँजी था, एक चंगा करनेवाले का आपके नगर में बस जाना पूरे कस्बे की प्रतिष्ठा बढ़ा देता। शमौन का उत्साह इसलिए स्वाभाविक है: यह उसका घर, उसका नगर, उसका अतिथि है। और यीशु भोर के अँधेरे में उसी नगर से बाहर, एक सुनसान जगह में, प्रार्थना करते मिलते हैं।
एक बारीकी
"मैं इसलिए निकला हूँ" पर रुकिए। मरकुस जो शब्द इस्तेमाल करते हैं वह सीधा-सादा "बाहर आना" है, और वह जानबूझकर खुला छोड़ा गया है। सतही पाठक समझेगा: मैं आज सुबह घर से निकला। पर वाक्य इससे ज़्यादा उठाता है। किस जगह से निकले? शमौन के घर से? कफरनहूम से? या उस भेजने से जिसने उन्हें पिता के पास से यहाँ तक पहुँचाया, वही आवाज़ जो यरदन पर सुनाई दी और वही आत्मा जिसने उन्हें जंगल की ओर भेजा? यीशु अपनी दिशा भीड़ के आकार से नहीं, अपने प्रस्थान-बिंदु से नापते हैं। यह हमारे लिए एक कसौटी है: हमारे निर्णय किस "इसलिए" से निकलते हैं? जहाँ शुरुआत साफ नहीं, वहाँ हर आमंत्रण बुलाहट जैसा लगने लगता है।
पहले सुननेवाले
मरकुस लिखते हैं ऐसे विश्वासियों के लिए जिनके लिए मसीही होना सामाजिक रूप से महँगा हो चुका था, जो दबाव में थे और जिनके अगुवे पकड़े जा चुके थे या मारे गए थे। उनके कानों में यह दृश्य अलग तरह से बजता। उन्होंने भी कभी चाहा होगा कि यीशु रुक जाएँ, कि चंगाई और आश्चर्यकर्म वाली वह शाम स्थायी हो जाए। पर उनका अनुभव उल्टा था: भीड़ छँट गई, नाम बदनाम हुआ, और सुसमाचार फिर भी एक शहर से दूसरे शहर बढ़ता गया। उन्हें यह सुनना ज़रूरी था कि यीशु का आगे बढ़ जाना असफलता नहीं, इरादा था। और यह भी कि उनका अपना बिखराव, घर छोड़ना, नई जगहों में जाना, उसी यात्रा का हिस्सा है जो गलील की बस्तियों में शुरू हुई थी।
चिंतन
पिछले महीने के आपके सबसे बड़े निर्णय किसने तय किए: आपका "इसलिए", या दूसरों की तत्काल ज़रूरतें?
कहाँ आप इसलिए टिके हुए हैं क्योंकि वहाँ आपको सराहा जाता है, जबकि परमेश्वर शायद आपको अगली बस्ती की ओर बुला रहे हैं?
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
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Mark 1:38 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 1:38 का क्या अर्थ है?
मरकुस 1:38 किस विषय में है?
मरकुस 1:38 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 1:38 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 1:38 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यरूशलेम में मंदिर था, याजक थे, बलिदान की सारी व्यवस्था थी। फिर भी लोग निकलकर सुनसान जंगल में गए, "और अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उससे बपतिस्मा लिया।" पाप मानने के लिए उन्हें शहर छोड़ना पड़ा। कहीं तुम भी तो धार्मिक भीड़ में छिपे नहीं हो? कुछ बातें कहने के लिए बाहर निकलना पड़ता है।
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