बाइबल व्याख्या

मरकुस 1:3

बाइबल

पाठ

मरकुस यशायाह की पुस्तक से एक पंक्ति उठाता है और उसे अपने सुसमाचार के द्वार पर टाँग देता है: जंगल में किसी की आवाज़ गूँज रही है, और वह आवाज़ चिल्लाकर कह रही है, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो।" कोई नाम नहीं दिया गया, कोई पद नहीं, केवल एक शब्द, एक पुकार, और वह भी बस्ती से बाहर, वहाँ जहाँ कोई सत्ता नहीं बसती। आगे की पंक्ति में हमें पता चलेगा कि यह आवाज़ यूहन्ना की है, ऊँट के रोम का वस्त्र पहने, टिड्डियाँ खाने वाला व्यक्ति। लेकिन इस पद में हमें केवल दो चीज़ें मिलती हैं: एक आवाज़, और एक आदेश। और वह आदेश निर्माण-कार्य का आदेश है, भावना का नहीं।

मूल बात

ध्यान दें कि आदेश क्या नहीं कहता। यह नहीं कहता, "प्रभु को बुलाओ" या "प्रभु के आने की प्रार्थना करो।" वह आ रहे हैं, यह तय है; उनका आना हमारी तैयारी पर निर्भर नहीं करता। तैयारी यह तय करती है कि जब वे आएँगे तो हमारे भीतर उनके पहुँचने का रास्ता होगा या मलबा। यहाँ अनुग्रह और नैतिकता एक-दूसरे के विरोध में नहीं खड़े होते, बल्कि एक क्रम में: परमेश्वर की पहल पहले, हमारा फावड़ा उसके बाद। और यह क्रम हमें बहाने से वंचित कर देता है। "सड़कें सीधी करो" एक ठोस, मापने योग्य काम है। जो मोड़ आपने अपने हिसाब-किताब में, अपने पारिवारिक झूठों में, अपनी काम की जगह की चुप्पियों में डाल रखे हैं, वे टेढ़े रास्ते हैं जिन पर राजा की गाड़ी नहीं चल सकती। सुसमाचार का आरम्भ सांत्वना से नहीं, सड़क-मरम्मत से होता है।

सूत्र

यशायाह की यह पंक्ति मूल रूप से निर्वासितों के लिए थी। बाबेल में बैठे लोगों को खबर मिलती है: परमेश्वर अपनी प्रजा को घर ले चलेंगे, और रेगिस्तान के आर-पार एक राजमार्ग बनेगा। प्राचीन संसार में यह चित्र जाना-पहचाना था; राजा के आने से पहले गाँव वालों को सड़क के गड्ढे भरने पड़ते थे। मरकुस उस पंक्ति को उठाकर यीशु पर लगा देता है, और इसी में उसका सबसे बड़ा दावा छिपा है: जिसका मार्ग तैयार करना है, वह "प्रभु" है, और वह गलील के नासरत से चलकर यरदन में आता है। सुसमाचार की पूरी कहानी इस एक जोड़ पर टिकी है। और यही कारण है कि यीशु का पहला उपदेश भी वही आदेश दोहराता है: "मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।" मन फिराव सड़क-मरम्मत का दूसरा नाम है।

आईना

सड़क बनाने में सबसे कठिन काम मोड़ हटाना है, क्योंकि हर मोड़ किसी वजह से बना था। आपने वेतन का वह हिस्सा छिपाया, क्योंकि खुलकर बताने पर झगड़ा होता। आपने अपने बच्चे से वह बात नहीं कही, क्योंकि टकराव से बचना आसान था। आपने दफ़्तर की उस बैठक में चुप रहना चुना, क्योंकि बोलने की कीमत आपको पता थी। ये सब तर्कसंगत मोड़ हैं, और हर एक ने आपके भीतर आने के रास्ते को थोड़ा और घुमावदार बना दिया। यह पद उस घुमाव को आध्यात्मिक भाषा में लपेटने की छूट नहीं देता। यह फावड़ा उठाने को कहता है, आज, वहीं जहाँ आप खड़े हैं।

आज उस एक व्यक्ति को छोटा संदेश भेजिए जिससे आपने पिछले दिनों आधा सच कहा था, और उसमें सच का बचा हुआ आधा हिस्सा जोड़ दीजिए। बस एक वाक्य।

एक बारीकी

मरकुस "पुकारनेवाले का शब्द" लिखता है, व्यक्ति नहीं, शब्द। यूनानी में यह फ़ोने है, यानी आवाज़, ध्वनि। यूहन्ना को यहाँ चेहरे तक सीमित नहीं किया गया, उसे आवाज़ तक घटा दिया गया है। यह अपमान नहीं, यह उसका पद है। आगे वह खुद कहेगा कि वह झुककर जूतों का फीता खोलने योग्य भी नहीं। आवाज़ का काम है सुनाई देना और फिर हवा में घुल जाना; कोई आवाज़ को याद नहीं रखता, संदेश याद रहता है। यह उन सबके लिए तीखा है जो परमेश्वर की सेवा करते हैं और साथ ही श्रेय भी गिनते हैं। जो पढ़ाता है, अगुवाई करता है, गाता है, प्रार्थना करता है, उसकी सफलता की माप यही है कि लोग उसके बाद किसे देखने लगे।

पहले सुनने वाले

मरकुस के पहले पाठक बहुत सम्भव है रोम में रहते थे, दबाव में, कुछ के परिवार बिखर चुके थे। सड़कों का मुहावरा उन्हें समझाने की ज़रूरत नहीं थी; वे साम्राज्य की सड़कों पर चलते थे, और उन्हें पता था कि जब कोई बड़ा अधिकारी नगर में आता है तो पहले दूत आते हैं और रास्ता ठीक कराया जाता है। ऐसे पाठक के लिए यह पंक्ति एक टकराव थी: कौन-सा प्रभु आ रहा है, कैसर या यीशु? और जो यहूदी पृष्ठभूमि से थे, उन्होंने यशायाह की उस आवाज़ में निर्वासन के बाद की सांत्वना सुनी। दोनों ने एक ही बात पकड़ी होगी, जो हम अक्सर चूक जाते हैं: यह घोषणा मंदिर में नहीं, जंगल में हुई, सत्ता के केन्द्रों से बाहर।

मुख्य पात्र

इस पद के पीछे असली कर्ता परमेश्वर हैं, और उनका चरित्र इस एक बात में दिखता है कि वे चुपचाप नहीं आते। वे पहले दूत भेजते हैं, पहले आवाज़ भेजते हैं, पहले चेतावनी देते हैं। जो न्याय करने आता है और बिना खबर आ जाए, उससे बचने का कोई उपाय नहीं; परन्तु ये परमेश्वर अपने आने की सूचना खुद पहले भिजवाते हैं, ताकि लोग तैयार हो सकें। चेतावनी अनुग्रह का ही एक रूप है। और ध्यान दें कि वे इस पुकार के लिए न याजक चुनते, न राजधानी। एक जंगल, एक अकेली आवाज़, ऊँट के रोम का वस्त्र। जो इतने बड़े काम के लिए इतना छोटा साधन चुनते हैं, वे आपके छोटे, अनदेखे सुधार को भी गम्भीरता से लेंगे।

चिंतन

आपकी ज़िंदगी में वह एक मोड़ कौन-सा है जिसे आप वर्षों से "व्यावहारिकता" कहकर बचाए हुए हैं?

यदि आपकी सेवा का फल यह हो कि लोग आपको भूल जाएँ और मसीह को याद रखें, तो क्या आप उसे सफलता मानेंगे?

Mark में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

King's Cross

Timothy Keller

Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.

Mark For Everyone

N.T. Wright

Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.

The Message of Mark

Donald English

A clear companion to Mark's urgent good news.

Mark: An Introduction and Commentary

R. Alan Cole

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Mark

David Garland

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Mark 1:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मरकुस 1:3 का क्या अर्थ है?
मरकुस यशायाह की पुस्तक से एक पंक्ति उठाता है और उसे अपने सुसमाचार के द्वार पर टाँग देता है: जंगल में किसी की आवाज़ गूँज रही है, और वह आवाज़ चिल्लाकर कह रही है, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो।" कोई नाम नहीं दिया गया, कोई पद नहीं, केवल एक शब्द, एक पुकार, और वह भी बस्ती से बाहर, वहाँ जहाँ कोई सत्ता नहीं बसती। आगे की पंक्ति में हमें पता चलेगा कि यह आवाज़ यूहन्ना की है, ऊँट के रोम का वस्त्र पहने, टिड्डियाँ खाने वाला व्यक्ति। लेकिन इस पद में हमें केवल दो चीज़ें मिलती हैं: एक आवाज़, और एक आदेश। और वह आदेश निर्माण-कार्य का आदेश है, भावना का नहीं।
मरकुस 1:3 किस विषय में है?
यशायाह की यह पंक्ति मूल रूप से निर्वासितों के लिए थी। बाबेल में बैठे लोगों को खबर मिलती है: परमेश्वर अपनी प्रजा को घर ले चलेंगे, और रेगिस्तान के आर-पार एक राजमार्ग बनेगा। प्राचीन संसार में यह चित्र जाना-पहचाना था; राजा के आने से पहले गाँव वालों को सड़क के गड्ढे भरने पड़ते थे। मरकुस उस पंक्ति को उठाकर यीशु पर लगा देता है, और इसी में उसका सबसे बड़ा दावा छिपा है: जिसका मार्ग तैयार करना है, वह "प्रभु" है, और वह गलील के नासरत से चलकर यरदन में आता है। सुसमाचार की पूरी कहानी इस एक जोड़ पर टिकी है। और यही कारण है कि यीशु का पहला उपदेश भी वही आदेश दोहराता है: "मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।" मन फिराव सड़क-मरम्मत का दूसरा नाम है।
मरकुस 1:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज उस एक व्यक्ति को छोटा संदेश भेजिए जिससे आपने पिछले दिनों आधा सच कहा था, और उसमें सच का बचा हुआ आधा हिस्सा जोड़ दीजिए। बस एक वाक्य।
मरकुस 1:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस के पहले पाठक बहुत सम्भव है रोम में रहते थे, दबाव में, कुछ के परिवार बिखर चुके थे। सड़कों का मुहावरा उन्हें समझाने की ज़रूरत नहीं थी; वे साम्राज्य की सड़कों पर चलते थे, और उन्हें पता था कि जब कोई बड़ा अधिकारी नगर में आता है तो पहले दूत आते हैं और रास्ता ठीक कराया जाता है। ऐसे पाठक के लिए यह पंक्ति एक टकराव थी: कौन-सा प्रभु आ रहा है, कैसर या यीशु?
मरकुस 1:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी ज़िंदगी में वह एक मोड़ कौन-सा है जिसे आप वर्षों से "व्यावहारिकता" कहकर बचाए हुए हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Mark 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 37

सुबह अंधेरे में यीशु सुनसान जगह में प्रार्थना कर रहे थे, तभी शमौन उन्हें ढूँढ़ता हुआ आया और बोला, "सब लोग तुझे ढूँढ़ रहे हैं।" सुनने में यह अच्छी खबर लगती है, पर असल में यह एक दबाव था। यीशु ने भीड़ की माँग नहीं, पिता की इच्छा चुनी, और आगे दूसरे गाँवों को चल दिए। तुझे भी कोई आवाज़ खींच रही है? पहले एकांत में जा, फिर तय कर।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

यरूशलेम में मंदिर था, याजक थे, बलिदान की सारी व्यवस्था थी। फिर भी लोग निकलकर सुनसान जंगल में गए, "और अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उससे बपतिस्मा लिया।" पाप मानने के लिए उन्हें शहर छोड़ना पड़ा। कहीं तुम भी तो धार्मिक भीड़ में छिपे नहीं हो? कुछ बातें कहने के लिए बाहर निकलना पड़ता है।

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