मरकुस 10:25
पाठ
धूल भरी सड़क पर वह आदमी अभी-अभी मुड़ा है। उसकी पीठ दिख रही है, कंधे झुके हुए, और यीशु उसे जाता हुआ देख रहे हैं। चेले अब भी उसी खाली जगह को घूर रहे हैं जहाँ वह घुटने टेके खड़ा था। तभी यीशु की आवाज़ चुप्पी को चीरती है: "परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!" यानी: एक विशालकाय जानवर और एक नन्हा-सा छेद। यह अतिशयोक्ति नहीं, असंभवता है। धन मनुष्य को परमेश्वर के राज्य के द्वार तक ले जाता है और फिर उसे इतना चौड़ा कर देता है कि वह उस द्वार से भीतर नहीं समा सकता। चेलों के लिए यह वाक्य एक चोट थी, और यीशु ने उसे नरम करने की कोई कोशिश नहीं की।
मूल बात
हम इस वचन को नरम करना चाहते हैं। कोई कहता है सूई के नाके नाम का कोई छोटा फाटक रहा होगा; कोई कहता है ऊँट नहीं, रस्सी रही होगी। पर यीशु ठीक वही कहना चाहते हैं जो सुनने में असंभव लगता है, क्योंकि दो वचन बाद वे स्वयं इसकी व्याख्या करते हैं: "मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है।" यही इस वचन का धर्मशास्त्रीय हृदय है। उद्धार किसी के लिए भी स्वाभाविक रूप से संभव नहीं, पर धनी के लिए यह खास तौर पर कठिन है, क्योंकि धन एक झूठा सुरक्षा-कवच है। जो आदमी अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरी कर सकता है, वह भिखारी बनना भूल जाता है। और राज्य में प्रवेश केवल खाली हाथों से होता है, उसी तरह जैसे वह बालक जिसे यीशु ने गोद में उठाया: बिना किसी दावे के, बिना किसी भुगतान के, केवल ग्रहण करते हुए।
मुख्य धागा
इस्राएल की कहानी में धन लंबे समय तक आशीष का चिह्न था: अब्राहम धनी थे, अय्यूब धनी थे, सुलैमान धनी थे। इसीलिए चेलों की प्रतिक्रिया इतनी घबराई हुई है, "तो फिर किसका उद्धार हो सकता है?" अगर आशीष पाए हुए लोग भी भीतर नहीं जा सकते, तो बाकी किस आशा पर जिएँ? और ठीक यहीं से मरकुस की कहानी एक निर्णायक मोड़ लेती है। कुछ ही वचनों बाद यीशु यरूशलेम की ओर आगे-आगे चलते हैं, और बताते हैं कि मनुष्य का पुत्र "बहुतों के छुटकारे के लिये अपना प्राण दे।" जिस धनी से कहा गया था कि सब बेच दे, उसी के सामने वह व्यक्ति खड़ा था जिसने स्वर्ग की सारी सम्पत्ति छोड़कर स्वयं को दे दिया। ऊँट सूई के नाके से नहीं निकल सकता, पर क्रूस राज्य का द्वार चौड़ा कर देता है। यही सुसमाचार है।
दर्पण
आप शायद स्वयं को धनी नहीं मानते। धनी हमेशा कोई और होता है, एक स्तर ऊपर वाला। पर पूछिए: पिछली बार कब आपने ऐसा कुछ दिया जिससे आपके अगले महीने की योजना बदल गई? जिस दिन नौकरी असुरक्षित लगती है, आपका मन सबसे पहले कहाँ भागता है, प्रार्थना की ओर या हिसाब-किताब की ओर? बीमा, बचत, मकान, बच्चों की पढ़ाई, ये सब बुरे नहीं हैं; पर इनके पीछे एक चुपचाप आवाज़ होती है जो कहती है, "मैं संभाल लूँगा।" यही वह चर्बी है जो हमें द्वार में फँसा देती है। वह आदमी बुरा नहीं था, वह आज्ञाकारी था, उत्सुक था, दौड़ता हुआ आया था। फिर भी वह उदास होकर लौट गया, क्योंकि उसके पास वह था जिसे वह छोड़ नहीं सकता था।
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श्रोता
मरकुस जिनके लिए लिख रहा था, वे संभवतः रोम के मसीही थे, जिन्होंने दबाव में अपनी संपत्ति, काम और घर खोए थे। उनके कानों में यह वचन धमकी नहीं, राहत की तरह गिरा होगा। जिन पड़ोसियों के पास सब कुछ था और जो उन पर हँसते थे, उनके बारे में यीशु कह रहे हैं कि उनकी स्थिति ईर्ष्या के योग्य नहीं है। साथ ही यह वचन उन्हें चेतावनी भी देता था: जब सताव थमेगा और आराम लौटेगा, तब सबसे बड़ा खतरा तलवार नहीं, तिजोरी होगी। और यीशु का वादा, "सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहनों और माताओं", उनके लिए अमूर्त नहीं था, वह कलीसिया की साझा मेज़ थी, जहाँ जिसने घर खोया उसे दस घर मिल गए।
अंतर्पाठ
इसी अध्याय में दो चित्र आमने-सामने रखे गए हैं। पहला, बालक: "जो कोई परमेश्वर के राज्य को बालक की तरह ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।" बालक के पास कुछ नहीं होता, इसलिए वह ग्रहण करना जानता है। दूसरा, बरतिमाई, जो अध्याय के अंत में बैठा है। उसके पास सिर्फ एक बाहरी वस्त्र था, भिखारी की पूरी पूँजी, और जब यीशु ने बुलाया तो लिखा है: "वह अपना बाहरी वस्त्र फेंककर शीघ्र उठा।" धनी आदमी अपनी संपत्ति पकड़कर उदास लौटा; अंधा भिखारी अपनी इकलौती संपत्ति फेंककर दौड़ा और "मार्ग में उसके पीछे हो लिया।" मरकुस ने जानबूझकर इन दोनों को एक ही अध्याय में रखा है।
मुख्य पात्र
ध्यान दीजिए कि यीशु उस आदमी के पीछे नहीं दौड़ते। वे शर्तें नरम नहीं करते, "ठीक है, आधा दे दो" नहीं कहते। और फिर भी यह कठोरता नहीं है, क्योंकि उसी आदमी के बारे में मरकुस ने अभी-अभी लिखा था: "यीशु ने उस पर दृष्टि करके उससे प्रेम किया।" यह प्रेम ही था जिसने वह असंभव माँग रखी। यही यीशु का स्वभाव है: वे झूठी दिलासा देने से इनकार करते हैं, क्योंकि झूठी दिलासा किसी को बचाती नहीं। वे जानते हैं कि उस आदमी और जीवन के बीच जो चीज़ खड़ी है, उसे छूए बिना कोई उपचार नहीं। और चेलों की ओर मुड़कर वे उन्हें "हे बालकों" कहकर पुकारते हैं, जैसे कोई पिता डरे हुए बच्चों को गोद में खींच लेता है। कठोर सच्चाई और कोमल स्वर, दोनों एक ही मुँह से।
चिंतन
अगर यीशु आज आपकी ओर प्रेम से देखकर कहें, "तुझ में एक बात की घटी है," तो आपके भीतर कौन-सी चीज़ सबसे पहले सिकुड़कर अपनी रक्षा करने लगेगी?
आप अपनी सुरक्षा के लिए असल में किस पर भरोसा करते हैं, यह आपके पिछले तीन महीनों के खर्च और दान से क्या पता चलता है?
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Mark 10:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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मरकुस 10:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, पतरस की तरह कभी मेरे मन में भी हिसाब चलता है कि मैंने तेरे लिए क्या क्या छोड़ा। पर तू जानता है कि जो कुछ मैंने छोड़ा, वह तेरे प्यार के सामने कुछ भी नहीं। मेरे दिल से गिनती मिटा दे, और बस तेरे पीछे चलने की खुशी भर दे।
यीशु यरूशलेम की ओर आगे आगे चल रहे थे, और पीछे चलनेवाले डर रहे थे। "वे अचम्भित हुए और जो पीछे-पीछे चलते थे वे डरने लगे।" ध्यान दे, उसने उनका डर मिटने तक इंतज़ार नहीं किया, वह चलता रहा और फिर से बताने लगा कि आगे क्या होगा। तेरे रास्ते पर भी वह पहले से चल चुका है। डरते हुए ही सही, तू बस पीछे चलता रह।
यीशु आगे आगे चल रहे थे, और शिष्य डरे हुए पीछे। तब उन्होंने कहा, "देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं, और मनुष्य का पुत्र प्रधान याजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा।" वे जानते थे कि आगे क्या है, फिर भी कदम नहीं रुके। तुम्हारे लिए यह रास्ता उन्होंने आँखें खोलकर चुना, अनजाने में नहीं।
चेले अचम्भित थे, और यीशु ने उन्हें डाँटा नहीं। उसने कहा, "हे बालको," जैसे कोई पिता घबराए हुए बच्चे को गोद में लेता है। फिर कठोर सच्चाई: "जो धन पर भरोसा रखते हैं, उनके लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!" समस्या पैसा नहीं, भरोसा है। आज तेरी सुरक्षा किस पर टिकी है?
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