मरकुस 10:10
पाठ
फरीसियों के साथ तलाक पर हुई खुली बहस खत्म हो चुकी है। यीशु ने भीड़ के सामने उत्पत्ति की पहली पंक्तियाँ खोलकर कहा था, "जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।" और फिर वे घर के भीतर चले जाते हैं। वहाँ, दरवाज़ा बंद होने के बाद, चेले उसी विषय को दोबारा उठाते हैं: "और घर में चेलों ने इसके विषय में उससे फिर पूछा।" यह पद अपने आप में कोई शिक्षा नहीं देता; यह एक दृश्य है। बारह आदमी, जिन्होंने अभी-अभी सार्वजनिक उत्तर सुना है, चुपचाप उसी बात को फिर से पूछने बैठ जाते हैं, क्योंकि जो बात भीड़ में साफ़ लगी थी, वह अपने घर की चौखट के भीतर अचानक भारी हो गई।
मूल बात
मरकुस बार-बार यही ढाँचा दिखाता है: बाहर दृष्टांत, भीतर व्याख्या। पर यहाँ मामला दृष्टांत का नहीं, आज्ञा का है, और इसी में इस पद की धार छिपी है। फरीसियों के लिए तलाक एक बहस का विषय था, "क्या यह उचित है?" जैसे कोई कानूनी पेचीदगी सुलझानी हो। चेलों के लिए, घर के भीतर, वही सवाल अपनी पत्नी, अपने ससुराल, अपने पड़ोसी के टूटे रिश्ते का सवाल बन जाता है। परमेश्वर का वचन तब तक नैतिक शक्ति नहीं बनता जब तक वह चौक से उठकर रसोई तक न पहुँचे। और ध्यान दीजिए कि यीशु उन्हें डाँटते नहीं कि "अभी तो बताया था।" दोबारा पूछना यहाँ अविश्वास नहीं, बल्कि गंभीरता का चिह्न है: वे सचमुच इसे जीना चाहते हैं, इसलिए और साफ़ सुनना चाहते हैं।
सूत्र
यीशु ने बहस का उत्तर व्यवस्था से नहीं, सृष्टि से दिया। मूसा की अनुमति को वे रद्द नहीं करते, पर उसे उसकी जगह पर रख देते हैं: "तुम्हारे मन की कठोरता के कारण उसने तुम्हारे लिये यह आज्ञा लिखी।" यानी व्यवस्था का वह हिस्सा मनुष्य के टूटेपन के साथ किया गया एक समझौता था, आदर्श नहीं। और जो सृष्टि के आरम्भ में था, उसी की ओर राज्य लौटा रहा है। यही पूरी मुक्ति-कहानी का आकार है: परमेश्वर सिर्फ़ नुकसान की भरपाई नहीं करते, वे शुरुआत को बहाल करते हैं। इसलिए यीशु का उत्तर कठोर नहीं, आशाभरा है। वे यह नहीं कह रहे कि "नियम और सख़्त कर लो," बल्कि यह कि "जिस चीज़ को कठोर हृदय ने तोड़ा, उसे मैं जोड़ने आया हूँ।" और कुछ ही पदों बाद वही मसीह यरूशलेम की ओर बढ़ते हैं, जहाँ वे "बहुतों के छुटकारे के लिये अपना प्राण" देंगे। कठोर हृदय का इलाज क्रूस है, नया कानून नहीं।
दर्पण
पद 10 आपसे पूछता है: आप कौन सी शिक्षा सुनकर सिर हिला देते हैं, पर घर लौटकर उस पर दोबारा नहीं सोचते? रविवार को तलाक पर, पैसे पर, क्षमा पर कही गई बात सच लगती है; सोमवार को जब आपका जीवनसाथी तीसरी बार वही बात दोहराता है, या जब आपकी बेटी का विवाह टूटने के कगार पर है, या जब दफ़्तर में किसी के अलग हुए जीवन पर लोग चटखारे ले रहे हों, तब वही बात या तो जीवन बनती है या बेकार शोर। चेले भीतर जाकर फिर पूछते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि यह विषय उनके अपने बिस्तर तक जाता है। हममें से ज़्यादातर उल्टा करते हैं: हम कठिन शिक्षा को सार्वजनिक स्तर पर मान लेते हैं और निजी स्तर पर उससे बचकर निकल जाते हैं। यहीं असली अवज्ञा पलती है, बहस में नहीं, चुप्पी में।
आज दरवाज़ा बंद कीजिए और दस मिनट में, ज़ोर से बोलकर, प्रभु से वह एक सवाल पूछिए जो आप किसी समूह में पूछने से कतराते हैं, अपने विवाह, अपने घर या अपने टूटे रिश्ते के बारे में।
कठिन प्रश्न
पर जो पहले ही तलाक ले चुका है, उसका क्या? यीशु का अगला वाक्य कोमल नहीं है: दूसरा विवाह करने वाले को वे "व्यभिचार" कहते हैं। इस पद को मीठा बनाने की कोशिश ईमानदारी नहीं होगी। यीशु यहाँ कोई नया पारिवारिक कानून नहीं गढ़ रहे; वे उस संस्कृति के सामने खड़े हैं जहाँ पुरुष कागज़ के एक टुकड़े से स्त्री को सड़क पर छोड़ सकता था और खुद को धर्मी कह सकता था। उनकी धार उसी ढाल पर पड़ती है। फिर भी वाक्य अपनी कठोरता खोता नहीं, और जिसने तलाक भोगा है वह इसे पत्थर की तरह महसूस करता है। मैं इसे हल करने का दिखावा नहीं करूँगा। इतना ज़रूर कहूँगा: यही मरकुस अगले ही दृश्य में यीशु को बच्चों को गोद में लेते हुए दिखाता है, और कुछ पंक्तियों बाद कहता है, "मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है।" वही मुँह जो मानक ऊँचा रखता है, क्षमा भी उसी ऊँचाई से देता है।
अंतर-पाठ
मरकुस में यह "भीतर जाकर फिर पूछना" पहली बार नहीं हो रहा। अध्याय चार में, बीज के दृष्टांत के बाद, चेले अकेले में यीशु से उसका अर्थ पूछते हैं, और वहीं उन्हें राज्य का भेद खुलता है। मरकुस के लिए घर वह जगह है जहाँ शिष्य बनते हैं; भीड़ सुनती है, शिष्य पूछते हैं। दूसरी ओर व्यवस्थाविवरण 24, जिसे फरीसी ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, तलाक की अनुमति नहीं बल्कि तलाकशुदा स्त्री की रक्षा के लिए बनी एक सीमा थी। फरीसियों ने सुरक्षा के नियम को स्वतंत्रता का लाइसेंस बना लिया। यह हमारे साथ भी होता है: बाइबल की जो बात कमज़ोर को बचाने के लिए दी गई थी, उसे हम अपनी सुविधा का औज़ार बना लेते हैं।
संदर्भ
दृश्य यहूदिया की सीमा और यरदन के पार का है, यानी हेरोदेस अंतिपास का इलाका, वही शासक जिसने अपने भाई की पत्नी से विवाह किया और उस पर उँगली उठाने वाले यूहन्ना का सिर कटवा दिया था। तलाक का सवाल यहाँ पूछना निर्दोष जिज्ञासा नहीं, जाल है: यीशु का उत्तर उन्हें या तो राजा का शत्रु बना सकता था या लोकप्रिय राय का। उस समय के धर्मगुरुओं में यह बहस चल रही थी कि पुरुष किन कारणों से पत्नी को त्याग सकता है, कुछ केवल गंभीर विश्वासघात पर, कुछ मामूली नाराज़गी पर भी। अधिकार पूरी तरह पुरुष के पास था; स्त्री के पास त्याग-पत्र के सिवा कोई सुरक्षा नहीं थी। और घर, जहाँ चेले पूछते हैं, कोई निजी बंगला नहीं था, बल्कि किसी का उधार लिया हुआ छोटा कमरा, जहाँ बारह थके हुए आदमी एक कठिन बात को पचाने की कोशिश कर रहे थे।
चिंतन
पिछले महीने आपने कौन सी बाइबल की बात सुनकर सहमति में सिर हिलाया, पर उसे अपने घर की चौखट के भीतर लाने से बचते रहे?
आप किन लोगों के लिए यीशु का यह वचन ढाल बनेगा, और किनके लिए तलवार, और आप उस अंतर को पहचानते कैसे हैं?
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Mark 10:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Mark 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, पतरस की तरह कभी मेरे मन में भी हिसाब चलता है कि मैंने तेरे लिए क्या क्या छोड़ा। पर तू जानता है कि जो कुछ मैंने छोड़ा, वह तेरे प्यार के सामने कुछ भी नहीं। मेरे दिल से गिनती मिटा दे, और बस तेरे पीछे चलने की खुशी भर दे।
यीशु यरूशलेम की ओर आगे आगे चल रहे थे, और पीछे चलनेवाले डर रहे थे। "वे अचम्भित हुए और जो पीछे-पीछे चलते थे वे डरने लगे।" ध्यान दे, उसने उनका डर मिटने तक इंतज़ार नहीं किया, वह चलता रहा और फिर से बताने लगा कि आगे क्या होगा। तेरे रास्ते पर भी वह पहले से चल चुका है। डरते हुए ही सही, तू बस पीछे चलता रह।
यीशु आगे आगे चल रहे थे, और शिष्य डरे हुए पीछे। तब उन्होंने कहा, "देखो, हम यरूशलेम को जाते हैं, और मनुष्य का पुत्र प्रधान याजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा।" वे जानते थे कि आगे क्या है, फिर भी कदम नहीं रुके। तुम्हारे लिए यह रास्ता उन्होंने आँखें खोलकर चुना, अनजाने में नहीं।
चेले अचम्भित थे, और यीशु ने उन्हें डाँटा नहीं। उसने कहा, "हे बालको," जैसे कोई पिता घबराए हुए बच्चे को गोद में लेता है। फिर कठोर सच्चाई: "जो धन पर भरोसा रखते हैं, उनके लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!" समस्या पैसा नहीं, भरोसा है। आज तेरी सुरक्षा किस पर टिकी है?
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