मरकुस 14
पाठ
फसह से दो दिन पहले प्रधान याजक यीशु को छल से पकड़वाकर मार डालने की योजना बना रहे हैं; उसी बीच बैतनिय्याह में एक स्त्री बहुमूल्य इत्र का पात्र तोड़कर उनके सिर पर उँडेल देती है, और यहूदा रुपयों का सौदा कर लेता है। ऊपरी अटारी में यीशु रोटी तोड़कर और कटोरा देकर वाचा की घोषणा करते हैं, गतसमनी में "अब्बा" कहकर कटोरा टालने की विनती करते हैं, पकड़वाए जाते हैं, और महासभा के सामने खुलकर स्वयं को मसीह मानते हैं, जबकि नीचे आँगन में पतरस आग तापते हुए तीन बार मुकर जाता है।
मर्म
इस अध्याय के केंद्र में एक वाक्य है जो सब कुछ बदल देता है: "यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये बहाया जाता है।" उस रात यरूशलेम में हज़ारों मेमने काटे जा रहे थे, और उन सबके बीच यीशु मेज़ पर रोटी उठाकर कहते हैं कि असली बलिदान वे स्वयं हैं। वाचा परमेश्वर और मनुष्य के बीच कोई अनुबंध नहीं है जिसे दोनों पक्ष निभाते हैं; वह लहू से बाँधा गया रिश्ता है, जिसमें परमेश्वर अपनी ओर से पूरी कीमत चुका देते हैं। और ध्यान दें कि कटोरा किसे दिया जाता है: उन बारहों को, जिनमें एक पकड़वानेवाला है और बाकी सब भागनेवाले। "उन सब ने उसमें से पीया।" अनुग्रह का यही चेहरा है, यह पात्र की योग्यता नहीं देखता।
सूत्र
फसह की रात मेमने का लहू दरवाज़े की चौखट पर लगा था, ताकि मृत्यु गुज़र जाए। सीनै पर मूसा ने लहू छिड़ककर कहा था, "देखो, यह वाचा का लहू है" (निर्गमन 24)। यीशु दोनों धागों को अपने हाथ में उठा लेते हैं: वे मेमना हैं और वे वाचा बाँधनेवाले भी। इसीलिए जब महायाजक पूछता है और वे उत्तर देते हैं, तो वे दानिय्येल 7 की भाषा बोलते हैं, "तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे।" जिसे न्याय के कटघरे में खड़ा किया गया है, वही न्यायी बनकर लौटेगा। और अंत में वह भोजन पूरा नहीं होता; वह स्थगित रहता है, "जब तक परमेश्वर के राज्य में नया न पीऊँ।" क्रूस राज्य का द्वार है, अंत नहीं।
दर्पण
गौर करें कि उस स्त्री का विरोध करनेवाले गलत तर्क नहीं दे रहे थे। तीन सौ दीनार से गरीबों की सचमुच सेवा हो सकती थी। हमारी समझदारी अक्सर इसी तरह बोलती है: हिसाब, उपयोगिता, संतुलित बजट। मगर यीशु उसे "भलाई" कहते हैं, क्योंकि प्रेम कभी-कभी गणित से बाहर जाता है। दूसरी ओर पतरस है, जो साथियों के सामने बड़ी बात कहता है और नौकरानी के एक प्रश्न पर टूट जाता है। हमारा इनकार भी शायद यातना-गृह में नहीं, चाय के दौरान होनेवाली किसी हल्की बातचीत में होता है, जब विषय बदल देना आसान लगता है। और तीसरी बात: शिष्य सो गए, क्योंकि "शरीर दुर्बल है"। थकान पाप नहीं है, पर वह हमें उस घड़ी में अनुपस्थित कर देती है जब उपस्थिति ही सब कुछ होती।
आज ही, दिन ढलने से पहले, अकेले में यीशु का वह प्रश्न ऊँची आवाज़ में अपने ऊपर लगाइए: "क्या वह मैं हूँ?" और उसके बाद एक जगह का नाम लिखिए जहाँ इस सप्ताह आपने मसीह को अपनाने से कतराया, फिर उसी काग़ज़ पर हाथ रखकर क्षमा माँग लीजिए।
कठिन प्रश्न
गतसमनी की प्रार्थना खटकती है: "जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, पर जो तू चाहता है वही हो।" यदि पिता और पुत्र की इच्छा एक है, तो यहाँ दो इच्छाएँ किस तरह टकरा रही हैं? पाठ इसे सुलझाता नहीं। वह हमें एक ऐसा यीशु दिखाता है जो सचमुच मरने से पीछे हटता है, जिसका मन "बहुत ही अधीर और व्याकुल" है, और जो उसी क्षण पिता को "अब्बा" कहकर पुकारता है। इसी के साथ यहूदा की दोहरी सच्चाई खड़ी है: "मनुष्य का पुत्र तो, जैसा उसके विषय में लिखा है, जाता ही है; परन्तु उस मनुष्य पर हाय।" परमेश्वर की ठहराई गई योजना और मनुष्य का पूरा दोष, दोनों एक ही वाक्य में। मरकुस इसे समझाने की कोशिश नहीं करता। वह इसे हमारे सामने रख देता है, जैसे कोई पत्थर जिसे हटाया नहीं जा सकता।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का यीशु एक साथ सर्वज्ञ और चूर-चूर है। वह जानता है कि नगर में घड़ा उठाए एक मनुष्य मिलेगा, जानता है कि कौन उसके साथ थाली में हाथ डाल रहा है, जानता है कि मुर्गा कितनी बार बाँग देगा। वह अपने बिखराव की भविष्यवाणी भी स्वयं उद्धृत करता है और उसी साँस में गलील में फिर मिलने का वादा करता है। फिर भी वह भूमि पर गिर पड़ता है। यह नियंत्रण खोना नहीं, आज्ञाकारिता की कीमत है। महायाजक के सामने वह चुप रहता है जब झूठे गवाह बोलते हैं, और तब बोलता है जब सच बोलना उसकी मृत्यु का वारंट बन जाता है: "हाँ मैं हूँ।" यही पवित्रता है, जो अपनी रक्षा नहीं करती।
पहले सुननेवाले
मरकुस के पहले पाठक ऐसे विश्वासी थे जिनके लिए "इनकार" कोई सैद्धांतिक विषय नहीं था; उनके पड़ोसी, नौकर और सहकर्मी पूछ सकते थे, "तू भी तो उस नासरी यीशु के साथ था।" उन्होंने इस अध्याय में अपनी ही कायरता पढ़ी: चादर छोड़कर नंगा भागता जवान, आग के पास शपथ खानेवाला पतरस। और उन्होंने यह भी पढ़ा कि जिस पतरस पर उनकी कलीसिया खड़ी थी, वह "फूट फूटकर रोने" वाला आदमी था, टूटा हुआ और फिर बुलाया हुआ। जिन लोगों को यह डर था कि मसीह का अनुयायी होना अपमान है, उनके लिए यह पाठ कहता है: तुम्हारा प्रभु स्वयं थूका गया, घूँसे खाया, और वही बादलों पर लौटेगा।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन सी "बहुमूल्य" चीज़ है जिसे तोड़कर उँडेलना आपको आज भी सत्यानाश जैसा लगता है, और क्यों?
यीशु ने पतरस के गिरने की भविष्यवाणी की और फिर भी उसे कटोरा दिया; इससे आपके अपने बार-बार दोहराए जानेवाले पाप के बारे में क्या बदलता है?
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Mark 14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Mark 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कितनी बार मैं थककर सो जाता हूँ जब तू चाहता है कि मैं तेरे साथ जागकर प्रार्थना करूँ। मेरी कमजोरी तुझसे छिपी नहीं। मुझे संभाल, मेरे मन को जगा दे, ताकि जब तू पुकारे तो मैं तेरे पास मिलूँ।
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