मरकुस 15
पाठ
भोर होते ही महासभा यीशु को बाँधकर रोमी राज्यपाल पिलातुस के हवाले कर देती है; पिलातुस दोषी न पाकर भी भीड़ को खुश करने के लिए उन्हें कोड़े लगवाकर क्रूस पर सौंप देता है। सैनिक उन्हें बैंगनी वस्त्र और काँटों का मुकुट पहनाकर "यहूदियों का राजा" कहकर उपहास करते हैं, और गुलगुता पर दो डाकुओं के बीच उन्हें क्रूस पर चढ़ाया जाता है। दोपहर को अंधकार छा जाता है, यीशु परमेश्वर से त्यागे जाने की पुकार लगाकर प्राण छोड़ देते हैं, मन्दिर का परदा फट जाता है, और एक रोमी सूबेदार वह कहता है जो किसी यहूदी अगुवे ने नहीं कहा।
मर्म
प्रीटोरियुम के आँगन में जो हुआ, वह केवल क्रूरता नहीं, एक व्यंग्य-नाटक था। सैनिक जानते थे राजा को कैसे सलामी दी जाती है: बैंगनी चोगा, सिर पर मुकुट, झुककर प्रणाम, "नमस्कार!" वे यह सब करते हैं और साथ ही थूकते हैं। और मरकुस चाहता है कि आप हँसी में शामिल न हों, बल्कि काँप जाएँ, क्योंकि उनका मज़ाक सच है। यही परमेश्वर का राजत्व है: शक्ति जो अपने को नहीं बचाती। "इसने औरों को बचाया, पर अपने को नहीं बचा सकता" (पद 31) उपहास के रूप में कहा गया सबसे सच्चा धर्मशास्त्र है। यदि वे उतर आते, तो वे मसीह न होते। सिंहासन कील से जड़ा है, और मुकुट काँटों का।
जोड़नेवाला सूत्र
मरकुस बिना टिप्पणी के भजन 22 की पंक्तियाँ बुनता है: कपड़ों पर चिट्ठियाँ, सिर हिलाकर निन्दा, और फिर स्वयं यीशु के मुँह से उसकी पहली पंक्ति, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" यह निराशा का प्रलाप नहीं, इस्राएल की सबसे गहरी प्रार्थना है, जिसे वह व्यक्ति पूरा कर रहा है जिसके लिए वह लिखी गई थी। साथ में यशायाह की वह पंक्ति, कि "वह अपराधियों के संग गिना गया" (पद 28), दो डाकुओं के बीच शब्दशः पूरी होती है। पुराने नियम का पीड़ित धर्मी, बलि की भेड़, राजा का वंशज: तीनों धागे यहाँ एक ही लकड़ी पर मिलते हैं। मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फटना घोषणा करता है कि अब पहुँच का रास्ता माँस और लहू से खुल गया है।
दर्पण
पिलातुस को पहचानिए। वह जानता था (पद 10), उसने पूछा भी, "इसने क्या बुराई की है?", और फिर भी उसने भीड़ को प्रसन्न करने की इच्छा से सही को गलत के हाथ सौंप दिया। यह हममें से अधिकांश की कहानी है: हम सत्य को नहीं झुठलाते, हम केवल असुविधाजनक क्षण में चुप रह जाते हैं। दफ्तर की उस मीटिंग में जहाँ किसी अनुपस्थित सहकर्मी का चरित्र-हनन हो रहा था, परिवार के उस समूह में जहाँ एक कमज़ोर रिश्तेदार का मज़ाक बन रहा था, वहाँ आपके भीतर पिलातुस बैठा था, हाथ धोता हुआ। इसके उलट अरिमतियाह का यूसुफ है, जिसने "साहस करके" शव माँगा, जब साहस की कोई कीमत चुकानी पड़ती थी। आज ही, दस मिनट के भीतर, उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिसके बारे में आपने चुप्पी साधी थी, और उससे कहिए कि आपको उस दिन बोलना चाहिए था।
शास्त्र की गूँज
मरकुस अपनी पुस्तक के आरम्भ से यहाँ तक एक रस्सी खींचता है। बपतिस्मे के समय "आकाश फटता" है और स्वर्ग से आवाज़ आती है, "तू मेरा प्रिय पुत्र है।" यहाँ अन्त में मन्दिर का परदा "ऊपर से नीचे तक" फटता है, और आवाज़ ऊपर से नहीं, बल्कि एक रोमी सूबेदार के मुँह से आती है: "सचमुच यह मनुष्य, परमेश्वर का पुत्र था!" (पद 39) परमेश्वर दो बार पर्दा फाड़ते हैं, और दोनों बार पुत्र की पहचान घोषित होती है। भजन 22, जिसकी पहली पंक्ति यीशु पुकारते हैं, त्याग के रोने से शुरू होकर जाति-जाति के आराधना करने पर समाप्त होता है। सूबेदार उसी अन्त की पहली झलक है।
पहले सुननेवाले
मरकुस के पहले पाठक सम्भवतः रोम में रहते थे, वहाँ जहाँ क्रूस कोई आभूषण नहीं, सड़क किनारे का आतंक था। वे जानते थे कि कोड़े की चाबुक में हड्डी और धातु के टुकड़े बँधे होते थे, कि दोषी को अपनी तख्ती स्वयं ढोनी पड़ती थी, और कि सिपाही किसी भी राहगीर को बेगार में पकड़ सकता था, जैसे शमौन को पकड़ा गया। "सिकन्दर और रूफुस का पिता" लिखने का अर्थ यही है कि ये बेटे उस मण्डली में जाने-पहचाने थे; यह चश्मदीद का नाम है, कल्पना नहीं। और जब उन्होंने सुना कि एक रोमी अधिकारी ने, न कि महायाजक ने, सत्य पहचाना, तो सताव झेलते उन विश्वासियों ने समझा: हमारे साम्राज्य का सबसे क्रूर औज़ार ही वह मंच बना जहाँ परमेश्वर ने अपने पुत्र को प्रकट किया।
केंद्रीय व्यक्ति
इस पूरे अध्याय में यीशु लगभग चुप हैं। पिलातुस के सामने केवल एक वाक्य, फिर मौन, इतना कि "पिलातुस को बड़ा आश्चर्य हुआ।" गन्धरस मिला दाखरस, जो पीड़ा कुंद करने के लिए दिया जाता था, उन्होंने अस्वीकार किया; वे पूरी चेतना के साथ यह सहना चाहते थे। और फिर मरकुस में उनका आखिरी वाक्य कोई शान्त समर्पण नहीं, बल्कि एक चीख है: "तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" यह पन्ना हमें आसानी से भरने नहीं देता। यहाँ परमेश्वर का पुत्र वह अनुभव कर रहा है जिससे हम सबसे अधिक डरते हैं, परमेश्वर की अनुपस्थिति, और फिर भी वे उसी परमेश्वर को "मेरे परमेश्वर" कहकर पुकारते हैं। पकड़ छूटी नहीं, पर दिखाई भी नहीं देती। यही वह जगह है जहाँ आपका सबसे अंधेरा दिन पहले ही किसी के द्वारा जिया जा चुका है।
मनन के प्रश्न
किस स्थिति में आप इन दिनों पिलातुस की तरह "भीड़ को प्रसन्न करने की इच्छा" से सही बात दबा देते हैं, और उसकी कीमत कौन चुका रहा है?
यदि यीशु की सबसे गहरी पुकार त्यागे जाने की पुकार थी, तो यह आपकी उन प्रार्थनाओं को कैसे बदलता है जिनका कोई उत्तर आता नहीं दिखता?
Mark में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.
Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.
Mark: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Mark 15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 15 का क्या अर्थ है?
मरकुस 15 किस विषय में है?
मरकुस 15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 15 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
आने जानेवाले सिर हिलाकर उसकी निन्दा करते और कहते थे, वाह! मन्दिर के ढानेवाले, और तीन दिन में बनानेवाले!" वे ताना मार रहे थे, पर अनजाने में सच बोल रहे थे। तीसरे दिन वही हुआ। सोचो, जो लोग आज तुम्हारे विश्वास पर हँसते हैं, वे भी नहीं जानते कि परमेश्वर क्या कर रहा है। चुप रहकर सह लेना हार नहीं।
तब पिलातुस ने भीड़ को प्रसन्न करने की इच्छा से, बरअब्बा को उनके लिए छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए।"
पिलातुस जानता था कि यीशु निर्दोष है। फिर भी उसने सच नहीं, भीड़ को चुना। लोगों को खुश रखने की चाह कितनी महँगी पड़ती है।
और उस दिन एक दोषी आदमी बिना सज़ा के घर लौटा। बरअब्बा की जगह पर वह खड़ा हुआ, जो तेरी जगह भी खड़ा हुआ।
पिलातुस ने भीड़ से पूछा, "तो जिसे तुम यहूदियों का राजा कहते हो, उसके साथ मैं क्या करूँ?" वह फैसला अपने हाथ से निकालकर शोर के हवाले कर देता है। पर यह सवाल भीड़ पर नहीं रुकता, यह तुम तक आता है। यीशु के साथ तुम क्या करोगे? चुप रहना भी एक जवाब है, और पिलातुस ने वही चुना।
फसह ऐसा पर्व था जिसमें इस्राएल अपनी आज़ादी को याद करता था, और पिलातुस की रीति थी, "वह उस पर्व में किसी एक बन्दी को जिसे वे चाहते थे, उनके लिये छोड़ देता था।" सोचो, आज़ादी के पर्व पर एक द्वार खुला था, और भीड़ ने उसमें से बरअब्बा को निकाला और निर्दोष को भीतर छोड़ दिया। वह छूटा हुआ बन्दी तुम हो। तुम्हारी जगह कोई और खड़ा रहा।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
