मरकुस 6:5
पाठ
अपने ही नगर नासरत में, जहाँ लोग उसे बढ़ई के रूप में जानते थे और उसकी माँ और भाई-बहनों के नाम गिना सकते थे, यीशु ठोकर का कारण बन गए। और उसी जगह पर मरकुस एक ऐसा वाक्य लिखता है जो पढ़ते हुए अटक जाता है: "और वह वहाँ कोई सामर्थ्य का काम न कर सका, केवल थोड़े बीमारों पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया।" न यह कि उन्होंने करना नहीं चाहा, न यह कि अवसर नहीं मिला, बल्कि "न कर सका"। फिर भी वाक्य पूरी तरह बंद नहीं होता। एक दरार खुली रह जाती है: कुछ बीमार थे जिन पर उन्होंने हाथ रखा, और वे चंगे हुए। अविश्वास के बीचोंबीच भी अनुग्रह पूरी तरह चुप नहीं रहा।
मर्म
यह "न कर सका" परमेश्वर की सामर्थ्य की सीमा नहीं बताता, बल्कि उस सामर्थ्य का स्वभाव बताता है। यीशु जादूगर नहीं हैं जो भीड़ के ऊपर चमत्कार बरसा दें, चाहे लोग उन्हें कोई भी समझें। वे देहधारी परमेश्वर हैं, और देहधारण का अर्थ ही यह है कि उद्धार किसी दूरी से नहीं, बल्कि आमने-सामने के रिश्ते में आता है। जहाँ लोग उन्हें केवल "मरियम का पुत्र" मानकर अपने पुराने खाँचे में बंद कर देते हैं, वहाँ उनके पास देने को कुछ कम नहीं होता, पर लेने को कोई हाथ नहीं बढ़ता। मुक्ति थोपी नहीं जाती। और फिर भी ध्यान दीजिए: थोड़े बीमार आए, और उन्हें लौटाया नहीं गया। मसीह की करुणा नगर के सामूहिक अविश्वास से बड़ी निकली, भले ही वह थोड़े ही लोगों तक पहुँची।
सूत्र
नासरत का यह दृश्य पूरे सुसमाचार का लघु रूप है। जो अपने घर आया, उसे अपनों ने पहचानने से इनकार किया; यही अस्वीकार आगे चलकर क्रूस तक जाता है। और ध्यान दीजिए कि मरकुस इसी अध्याय में आगे यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर कटवाता है: परमेश्वर का भेजा हुआ व्यक्ति अपने ही लोगों के बीच मारा जाता है। यह कोई संयोग नहीं, यह पैटर्न है। भविष्यद्वक्ताओं से लेकर मसीह तक, परमेश्वर अपने लोगों के पास आते हैं और तिरस्कार सहते हैं। पर यहीं उद्धार की योजना की गहराई दिखती है: यीशु अस्वीकार से पीछे नहीं हटते, वे उसे झेलते हैं, और अंततः उसी अस्वीकृति के भीतर से मुक्ति निकालते हैं। नासरत में बंद दरवाज़ा क्रूस पर खुले हाथों में बदल जाता है।
दर्पण
हम भी यीशु को "जाने हुए" में बाँध देते हैं। आप उन्हें बचपन से जानते हैं, कहानियाँ याद हैं, रविवार की आदत बनी हुई है, और ठीक इसी परिचय के कारण वे आपके दफ़्तर के फ़ैसलों, आपके बैंक खाते, आपकी शादी की ठंडी पड़ती बातचीत में कुछ नया नहीं कह पाते। नासरत के लोगों ने चमत्कार से इनकार नहीं किया, उन्होंने व्यक्ति से किया: "क्या यह वही बढ़ई नहीं?" यही हमारा ख़तरा है, मसीह को उपयोगी तो मानना पर अधिकारी नहीं। फिर भी वे थोड़े बीमार हमें साहस देते हैं। वे तर्क जीतकर नहीं आए, वे बस आए। आज अपने जीवन का एक वह हिस्सा काग़ज़ पर एक वाक्य में लिखिए जिसे आपने कभी प्रभु के सामने नहीं रखा, और वह वाक्य ज़ोर से पढ़कर उन्हें सौंप दीजिए।
अंतर्पाठ
इसी अध्याय के अंत का विरोधाभास देखिए। गन्नेसरत में लोग बीमारों को खाटों पर उठा लाते हैं और विनती करते हैं "कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आँचल ही को छू लेने दे: और जितने उसे छूते थे, सब चंगे हो जाते थे।" वही यीशु, वही सामर्थ्य, पर एक जगह "थोड़े" और दूसरी जगह "सब"। फ़र्क़ मसीह में नहीं, पहुँचने वाले हाथों में है। और यूहन्ना के सुसमाचार की वह पंक्ति यहीं से समझ आती है कि वे अपने घर आए और अपनों ने उन्हें ग्रहण नहीं किया। मरकुस बिना टिप्पणी किए यही दिखाता है: विश्वास चमत्कार को ख़रीदता नहीं, पर वह वह खुला दरवाज़ा है जिसमें से अनुग्रह भीतर आता है।
श्रोता
मरकुस जिनके लिए लिख रहा था, वे संभवतः रोम के मसीही थे, सताव की आँच में जीते हुए, अपने ही पड़ोसियों और परिवारों से तिरस्कृत। उनके कानों में यह आयत चुभती नहीं, सांत्वना देती थी। अगर स्वयं प्रभु को अपने नगर में ठुकराया गया, तो उनका अस्वीकार विफलता का प्रमाण नहीं, बल्कि मसीह के साथ चलने का चिह्न था। और इसके ठीक बाद यीशु बारह को बिना रोटी, बिना झोली, बिना पैसे के भेजते हैं, यह चेतावनी देकर कि कुछ लोग ग्रहण नहीं करेंगे। यानी अस्वीकार मिशन को रोकता नहीं, वह मिशन का हिस्सा है। जो भाई-बहन अपने घर में अकेले पड़ गए थे, उन्होंने यहाँ पढ़ा कि उनका स्वामी उसी रास्ते से पहले गुज़र चुका है।
मुख्य पात्र
अगली आयत में मरकुस एक चौंकाने वाली बात कहता है: "उसने उनके अविश्वास पर आश्चर्य किया।" यीशु ने भीड़ के विश्वास पर भी आश्चर्य किया था, और यहाँ अविश्वास पर। यह आश्चर्य उदासीन परमेश्वर का नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का है जिसे अपनों का इनकार भीतर तक छूता है। यही मसीह की सबसे अनोखी बात है: वे दुःख उठाने से पहले निराश होना जानते हैं। और फिर भी वे वहीं रुककर कड़वाहट नहीं पालते; वे "चारों ओर से गाँवों में उपदेश करता फिरा।" ठुकराया गया प्रेम लौटकर और आगे बढ़ता है। जो परमेश्वर हमारी ठोकर से घायल होकर भी हमारी ओर चलते रहते हैं, उन्हीं को हम उद्धारकर्ता कहते हैं।
चिंतन
मैं यीशु के बारे में जो "पहले से जानता हूँ", वह कहाँ-कहाँ मुझे उन्हें नए सिरे से सुनने से रोक रहा है?
नासरत के वे "थोड़े बीमार" फिर भी आए। मेरे जीवन का कौन सा हिस्सा है जिसे मैं अब तक उनके हाथ के नीचे नहीं लाया, और क्यों नहीं?
Mark में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.
Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.
Mark: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Mark 6:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 6:5 का क्या अर्थ है?
मरकुस 6:5 किस विषय में है?
मरकुस 6:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 6:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 6:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तू थोड़े में से भी इतना देता है कि सब तृप्त हो जाएँ। मेरे हाथ में जो कम है, उसे तेरे हाथों में रखता हूँ। मेरी चिंता को शांत कर, और मुझे भरोसा दे कि तेरे पास मेरे लिए कमी नहीं। जो तू देता है, उसमें मुझे संतोष सिखा।
पिता, मुझे भी सच बोलने का साहस दे, तब भी जब सुनने वाला नाराज़ हो जाए। मैं अक्सर चुप रह जाता हूँ, क्योंकि डर लगता है कि कुछ खो दूँगा। मेरे भीतर वह हिम्मत जगा, जो तेरे प्रेम से आती है, और मेरी बातों में कठोरता नहीं, बस सच्चाई हो।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें