रोमियों 10:15
पाठ
पौलुस की प्रश्नों की लड़ी यहाँ अपने आखिरी पायदान पर पहुँचती है। नाम लेने के लिये विश्वास चाहिए, विश्वास के लिये सुनना, सुनने के लिये कोई प्रचार करनेवाला, और अब सबसे नीचे की सीढ़ी: "और यदि भेजे न जाएँ, तो क्यों प्रचार करें?" यानी पूरी शृंखला किसी मनुष्य के उत्साह पर नहीं, बल्कि परमेश्वर के भेजने पर टिकी है। और इसी बिंदु पर पौलुस तर्क छोड़कर यशायाह का गीत उठा लेते हैं: "उनके पाँव क्या ही सुहावने हैं, जो अच्छी बातों का सुसमाचार सुनाते हैं!" धूल भरे, फटे, दौड़ते हुए पाँव, और उन्हें देखकर किसी की आँखें भर आती हैं। पद पंद्रह में दलील अचानक संगीत बन जाती है।
मूल बात
कल्पना कीजिए: यरूशलेम की दीवार पर एक पहरुआ खड़ा है, शहर उजड़ा हुआ, लोग बंधुआई में। दूर पहाड़ियों पर एक आकृति दौड़ती दिखती है। वह अभी कुछ बोला भी नहीं, पर पहरुआ जानता है, कोई खबर आ रही है। यही यशायाह का दृश्य है जिसे पौलुस उठाते हैं। और उसका धर्मशास्त्रीय भार यह है: उद्धार कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे इंसान अपने भीतर खोज ले। यह बाहर से आई खबर है, किसी घटना का समाचार, जिसे कोई लाकर सुनाता है। इसीलिए पौलुस पहले कह चुके हैं कि विश्वास सुनने से होता है। परमेश्वर ने अपने आप को हमारी भावनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा; उन्होंने भेजनेवाला बनकर काम किया। सुंदर पाँव इसलिये सुंदर हैं क्योंकि वे अपने नहीं, भेजे हुए हैं।
सूत्र
यशायाह का वह दूत जिस "अच्छी बात" को लेकर दौड़ता था, वह एक ही वाक्य थी: तेरा परमेश्वर राज्य करता है। बंधुआई खत्म, कर्ज़ चुका, राजा लौट आया। पौलुस उस पुरानी दौड़ को उठाकर सीधे अपने समय में रख देते हैं, क्योंकि उनके लिये वह खबर अब एक व्यक्ति में सिमट चुकी है। पद नौ में वे पहले ही कह चुके हैं कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया। यही समाचार है, यही "अच्छी बात"। ध्यान दीजिए, सुसमाचार कोई सलाह नहीं है, कोई जीवन-सूत्र नहीं जिसे आजमाया जाए। यह घोषणा है कि कुछ हो चुका है, बाहर, इतिहास में, हमारी सहमति से पहले। दूत उस पर बहस नहीं करता; वह उसे सुनाता है, हाँफते हुए, क्योंकि खबर उसके पैरों से बड़ी है।
दर्पण
हम में से अधिकांश खुद को उस दौड़ते दूत में नहीं, बल्कि दीवार पर खड़े थके पहरुए में पहचानते हैं। हमने खबरें बहुत सुनी हैं, ज़्यादातर बुरी। मेडिकल रिपोर्ट, दफ़्तर की छँटनी, वह फ़ोन जो रात को आया। और इसीलिये यह पद हमें दो जगह चुभता है। पहला: तुम्हारा उद्धार तुम्हारे भीतर की धार्मिकता से नहीं आया, किसी ने चलकर तुम तक पहुँचाया, और यह बात अहंकार को चुपचाप मार देती है। दूसरा: तुम्हारे आसपास लोग उसी दीवार पर खड़े हैं, और तुम भेजे हुए हो। पौलुस के तर्क में कोई पद खाली नहीं छोड़ा जा सकता, वरना शृंखला टूट जाती है। आज ही किसी एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसने आपसे यह खबर कभी नहीं सुनी, और उस काग़ज़ को अपनी जेब में रखकर दिन भर उसके लिये प्रार्थना कीजिए।
बारीकी
"पाँव" पर रुकिए। शरीर का सबसे कम सम्मानित हिस्सा, धूल, छाले, चोट। पूर्वी संस्कृति में पाँव अशुद्धता से जुड़े थे; मेहमान के आते ही पहले उन्हीं को धोया जाता था। और यशायाह ठीक उन्हीं को "सुहावने" कहते हैं। यह सौंदर्यशास्त्र का उलटफेर है: पाँव अपने कारण नहीं, अपने गंतव्य के कारण सुंदर हैं। जो नज़र सिर्फ़ पाँव देखती है, उसे मैल दिखता है; जो नज़र खबर सुन चुकी है, उसे प्रेम दिखता है। यही बात प्रचार करनेवालों पर भी लागू होती है। पौलुस खुद पिटे हुए, कैद किए गए, गलियों से भगाए गए आदमी थे। उनके पाँव सचमुच सुंदर नहीं दिखते होंगे। पर वे भेजे गए थे, और यही उन्हें सुहावना बनाता है।
अंतर्पाठ
यशायाह 52 के ठीक बाद जो अध्याय आता है, उसे पौलुस अगली ही साँस में उद्धृत करते हैं: "हे प्रभु, किसने हमारे समाचार पर विश्वास किया है?" यह संयोग नहीं। सुंदर पाँवों वाला वही अध्याय आगे चलकर उस दास तक पहुँचता है जो कुचला जाता है। यानी खबर सुंदर है, पर उसकी कीमत घाव है, और उसका स्वागत अक्सर इनकार है। पौलुस दोनों सच एक साथ पकड़ते हैं और यह उनकी ईमानदारी है: वे उत्साह का वादा नहीं करते। दूसरी ओर पद तेरह की गूँज याद रखिए, "जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।" जो कोई। दूत इसीलिये दौड़ता है, क्योंकि दरवाज़ा उतना ही चौड़ा है जितनी दुनिया।
मुख्य पात्र
इस पद का असली मुख्य पात्र दूत नहीं, भेजनेवाला है। पूरी शृंखला में हर कड़ी किसी और पर निर्भर है, और आखिरी सिरा परमेश्वर के हाथ में जाकर रुकता है। यह वही परमेश्वर हैं जो इस अध्याय के अंत में कहते हैं कि उन्होंने सारे दिन अपने हाथ एक हठीली प्रजा की ओर पसारे रखे। यही उनका स्वभाव है: पहल करनेवाला, पुकारनेवाला, न थकनेवाला। वे चुप बैठकर हमारी खोज का इंतज़ार नहीं करते, वे लोग भेजते हैं, धूल भरे, आम, अपूर्ण लोग। और जब आप किसी को अपने विश्वास की बात करते सुनते हैं, तो आप सिर्फ़ एक इंसान को नहीं सुन रहे; आप उन पाँवों की आहट सुन रहे हैं जिन्हें परमेश्वर ने आप तक भेजा।
चिंतन
आपके जीवन में वे "सुहावने पाँव" किसके थे, और क्या आपने कभी उन्हें बताया कि उनकी बात आप तक पहुँची?
पौलुस की शृंखला में आप कहाँ खड़े हैं: सुननेवाले के रूप में, या भेजे हुए के रूप में, और आप किस पद से बचना चाहते हैं?
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Romans 10:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Romans 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तेरा वचन कहीं दूर नहीं, वह मेरे बहुत पास है, मेरे मन में और मेरे होंठों पर। कई बार मैं तुझे ढूँढ़ने के लिए दूर भागता हूँ, जबकि तू पहले से ही यहीं है। मुझे विश्वास दे कि मैं जो मानता हूँ, वही सच्चाई से बोलूँ और जीऊँ।
वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा था जो जाति और परंपरा के आधार पर खुद को दूसरों से ऊँचा समझते थे। परमेश्वर के पास कोई ऊँची पंक्ति नहीं है, कोई पिछड़ी कतार नहीं। तेरी जाति, तेरा गाँव, तेरा बीता हुआ जीवन उसकी उदारता की सीमा तय नहीं करते। तू पुकार, वह सुनता है। सवाल यह है कि जिन्हें तू अपने से छोटा मानता है, उनके लिए भी तेरा दिल इतना ही खुला है?
मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर बढ़ाए रहा।" सोचो, हाथ फैलाए रखना कितना थका देता है। परमेश्वर सारे दिन ऐसे ही खड़ा रहा, बुलाता रहा, और लोग मुँह फेरते रहे। तुम्हारी ओर भी वे हाथ अब तक फैले हैं। सवाल यह नहीं कि वह कब तक रुकेगा, सवाल यह है कि तुम कब तक टालोगे।
पिता, आपका धन्यवाद कि आपका शब्द सारी पृथ्वी पर और आपके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं। आपने चुप नहीं रहे, बल्कि मेरे कानों तक भी सुसमाचार पहुँचाया। धन्यवाद उन जनों के लिए जो इसे सुनाते रहे, और इसलिए कि मैंने सुना और विश्वास किया।
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