मत्ती 11:29
पाठ
जूआ। यीशु थके हुए लोगों को तकिया नहीं, बल्कि कंधे पर रखने के लिए लकड़ी देते हैं: "मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।" यानी वे कहते हैं: बोझ उतारकर खाली बैठ जाना मेरा वादा नहीं है; मेरे साथ एक ही जुएँ में जुत जाओ, मेरी चाल सीखो, मेरे स्वभाव के नीचे अपना स्वभाव रखो। और तब, काम के बीच में ही, तुम्हारे भीतर वह ठहराव आएगा जिसे तुम बाहर खोजते रहे हो। विश्राम काम के बाद नहीं, काम के साथ मिलता है, बशर्ते जोत किसके कंधे से बँधी है यह बदल जाए।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के राज्य की नैतिकता एक ही वाक्य में खुल जाती है: उद्धार का अर्थ मालिक बदलना है, मालिकहीन हो जाना नहीं। हम सब पहले से किसी न किसी जुएँ में जुते हैं, प्रदर्शन के, दूसरों की अपेक्षाओं के, पैसे के, अपनी ही छवि के; और वे सब हमें थकाते हैं क्योंकि उनका स्वामी निर्दयी है। यीशु अपने विषय में जो बताते हैं वह सिद्धांत नहीं, चरित्र है: "मैं नम्र और मन में दीन हूँ।" परमेश्वर का पुत्र, जिसे पिता ने सब कुछ सौंपा है (पद 27), अपनी सत्ता का उपयोग कुचलने के लिए नहीं करता। इसलिए उसके अधीन होना अपमान नहीं, राहत है। और इसका सीधा नैतिक नतीजा यह है कि जो उससे सीखता है, वह अपने नीचे वालों पर भारी जूआ नहीं रख सकता।
बड़ी कहानी का सूत्र
जूआ बाइबल में पहले से ही एक लदा हुआ शब्द है। मिस्र की गुलामी से छुड़ाकर परमेश्वर इस्राएल को आज़ाद हवा में नहीं छोड़ देते; वे उन्हें सीनै पर ले जाकर वाचा में बाँधते हैं। फ़िरौन की सेवा और परमेश्वर की सेवा, दोनों सेवा हैं; अन्तर स्वामी का है। यिर्मयाह ने भी यही शब्द बोले थे, कि पुराने अच्छे मार्ग पर चलो और अपने मन में विश्राम पाओ, और लोगों ने इनकार कर दिया था। यीशु अब वही वाक्य अपने ऊपर खींच लेते हैं: मार्ग कोई विचार नहीं, एक व्यक्ति है। जिस दीन दास की बात भविष्यद्वक्ताओं ने की थी, जो कुचले हुए सरकण्डे को नहीं तोड़ता, वह यहाँ खड़ा होकर अपना कंधा आगे बढ़ा रहा है। और कुछ ही अध्यायों बाद वही नम्र राजा गधे पर बैठकर यरूशलेम में आएगा, और अन्त में जूए की जगह क्रूस की लकड़ी उठाएगा।
दर्पण
यह पद आराम का तकिया लगता है, पर वास्तव में यह हमारी ज़िन्दगी के हर समझौते को छूता है। आप जिस रफ़्तार से काम करते हैं, वह किसने तय की? अगर उत्तर है "जो लोग मुझे आँक रहे हैं", तो आपका जूआ किसी और के कंधे से बँधा है, और वह स्वामी कभी नहीं कहता कि बहुत हुआ। जुएँ में जुते दो बैलों में आप अकेले दौड़ नहीं सकते; जो मसीह के साथ जुता है, उसे धीमा होना पड़ता है, और यह गर्व पर सबसे तीखी चोट है। घर में यह और चुभता है। हम अक्सर वही बोझ दूसरों पर लाद देते हैं जो हमें कुचल रहा है: बच्चे से वह अंक, पति या पत्नी से वह सफलता, कलीसिया के उस स्वयंसेवक से वह उपलब्धता जो हमने कभी माँगी नहीं पर हमेशा अपेक्षित रखी। "मैं नम्र और मन में दीन हूँ" कहने वाले का चेला बनकर आप किसी पर भारी जूआ नहीं रख सकते, यह बात आपके व्यवहार में चुपचाप पकड़ी जाएगी।
आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिस पर आपने कोई अनकही अपेक्षा लाद रखी है, और आज ही उसे सन्देश भेजकर साफ़ शब्दों में वह एक माँग वापस ले लीजिए।
संदर्भ
यह गलील है, और माहौल ठंडा पड़ चुका है। यूहन्ना बन्दीगृह में बैठकर शक कर रहा है, खुराजीन और बैतसैदा ने चमत्कार देखकर भी मन नहीं फिराया, और यीशु पिता को धन्यवाद देते हैं कि ये बातें "ज्ञानियों और समझदारों" से छिपी रहीं। उसी साँस में यह निमन्त्रण आता है। "जूआ" उस समय धार्मिक शब्दावली में आम था: रब्बी व्यवस्था के पालन को "व्यवस्था का जूआ" कहते थे, और शास्त्री उसकी व्याख्याओं को इतना बढ़ा चुके थे कि साधारण किसान और मज़दूर उसके नीचे हाँफते थे। साथ ही रोमी कर, मन्दिर का चन्दा और ज़मींदारों का दबाव असली, आर्थिक बोझ थे। यीशु इन दोनों बोझों से थके लोगों के बीच खड़े होकर कहते हैं कि बोझ ढोना बन्द नहीं होगा, पर जोत बदल सकती है।
एक बारीकी
"नम्र" के लिए यूनानी शब्द है प्राउस, और यह कमज़ोरी नहीं है। यह शब्द उस घोड़े के लिए इस्तेमाल होता था जिसे सधा लिया गया हो: ताक़त पूरी, पर लगाम में। यीशु यह नहीं कह रहे कि मुझमें दम नहीं; पिछले ही पद में उन्होंने कहा है कि पिता ने सब कुछ उनके हाथ में सौंपा है। वे कह रहे हैं कि उनकी असीम सामर्थ्य आपके विरुद्ध नहीं मुड़ेगी। और ध्यान दीजिए, पूरे सुसमाचार में यही एकमात्र जगह है जहाँ यीशु अपने हृदय का वर्णन करते हैं। वे अपनी शिक्षा का सारांश नहीं देते, अपना स्वभाव बताते हैं, क्योंकि "मुझसे सीखो" का अर्थ पाठ याद करना नहीं, किसी के साथ चलते-चलते उसकी चाल पकड़ लेना है।
शास्त्र की प्रतिध्वनि
यिर्मयाह छठे अध्याय में परमेश्वर थकी हुई प्रजा से कहते हैं कि चौराहे पर खड़े होकर पुराना मार्ग पूछो और चलो, तब तुम्हारे मन को विश्राम मिलेगा; वहाँ उत्तर था, हम न चलेंगे। यीशु वही वादा दोहराते हैं, पर मार्ग की जगह स्वयं को रखकर, और यही उनके दावे की ऊँचाई है। इसके बिल्कुल उलट मत्ती तेईसवें अध्याय में वे धर्मगुरुओं पर दोष लगाते हैं कि वे भारी बोझ बाँधकर लोगों के कंधों पर रख देते हैं और उन्हें उँगली तक नहीं लगाते। दो तरह का नेतृत्व, दो तरह का धर्म: एक जो कंधा देता है, दूसरा जो केवल बोझ देता है। हम रोज़ तय करते हैं कि हम किसकी नक़ल कर रहे हैं।
चिंतन
पिछले सप्ताह आपकी रफ़्तार किसने तय की, और उस स्वामी ने आपको क्या दिया?
आपके अधीन जो लोग हैं, वे आपकी नम्रता को महसूस करते हैं या केवल आपकी अपेक्षाओं को?
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Matthew 11:29 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 11:29 का क्या अर्थ है?
मत्ती 11:29 किस विषय में है?
मत्ती 11:29 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 11:29 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 11:29 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
In Matthew 11 Jesus says: come to me, all you who are weary and burdened. Not come once you have recovered, not come when you try harder, but come right now. Grace is not a reward for those who make it, it is a hand for those who don't.
मैं इस पीढ़ी की तुलना किस से करूँ?" यीशु बच्चों के एक खेल की याद दिलाते हैं, जहाँ कोई साथ देना ही नहीं चाहता। बाँसुरी बजी, कोई नाचा नहीं; विलाप हुआ, कोई रोया नहीं। यूहन्ना उपवास करता आया, तो दोष लगा; यीशु खाता पीता आया, तो भी दोष लगा। असल बात यह थी कि मन पहले ही तय कर चुका था। कहीं तू भी परमेश्वर से उत्तर नहीं, बहाने ही न ढूँढ़ रहा हो?
जूआ कभी अकेले के लिए नहीं बनता, वह दो बैलों को जोड़ता है। यीशु कहते हैं, "क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है।" हल्का इसलिए नहीं कि काम खत्म हो गया, बल्कि इसलिए कि तू अब अकेला नहीं खींच रहा। जो बोझ तुझे कल रात तक कुचल रहा था, क्या तूने उसे उनके साथ बाँटा है, या अब भी अपने ही कंधे पर ढो रहा है?
यूहन्ना, वही जिसने यरदन में यीशु पर स्वर्ग खुलते देखा था, अब जेल की कोठरी से पूछता है, "क्या आनेवाला तू ही है, या हम किसी दूसरे की प्रतीक्षा करें?" उसका सवाल पाप नहीं था, अंधेरे की सच्चाई थी। और यीशु ने उसे डाँटा नहीं। तेरे मन में भी अगर ऐसा सवाल उठता है, तो उसे दबा मत। उसे यीशु तक पहुँचा दे, जैसे यूहन्ना ने किया।
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