बाइबल व्याख्या

मत्ती 6:26

बाइबल

पाठ

यीशु अपने सुननेवालों को एक काम सौंपते हैं जो बहुत सरल लगता है और वास्तव में बहुत कठिन है: ऊपर देखो। "आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तो भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है।" खेती के तीनों चरण, बोना, काटना, भंडार में रखना, पक्षियों के पास नहीं हैं, फिर भी वे जीवित हैं। और इसके बाद वह प्रश्न आता है जो वाक्य का असली भार उठाता है: "क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते?" यीशु उत्तर नहीं देते। वे प्रश्न को खुला छोड़ देते हैं, ताकि वह सुननेवाले के भीतर काम करे।

केंद्रीय सत्य

यह पद प्रकृति की सुंदरता पर कोई कविता नहीं है, यह परमेश्वर के चरित्र पर एक दावा है। ध्यान दीजिए कि यीशु "सृष्टिकर्ता" नहीं कहते, बल्कि "तुम्हारा स्वर्गीय पिता" कहते हैं, वही शब्द जो इसी अध्याय में प्रार्थना सिखाते समय आया था, "हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है।" जो हाथ पक्षियों को खिलाता है, वही हाथ है जिससे हम रोटी माँगते हैं। यहाँ भजन संहिता की वह पुरानी गूँज सुनाई देती है जहाँ परमेश्वर पशुओं और कौवे के बच्चों को भोजन देते हैं, और अय्यूब की वह लंबी पूछताछ जहाँ परमेश्वर अय्यूब को जंगली गधों और बाज़ों की ओर इशारा करके चुप करा देते हैं। पर यीशु उस पुरानी छवि को एक नया मोड़ देते हैं: इस्राएल का परमेश्वर जो सृष्टि को पालता है, अब "तुम्हारा पिता" कहलाता है। चिंता इसलिए अविश्वास है, क्योंकि वह इस रिश्ते को झुठलाती है।

जोड़ने वाला धागा

पक्षी बाइबल की पहली कहानी से ही वहाँ हैं। उत्पत्ति में परमेश्वर उन्हें आकाश में भरते हैं और फिर मनुष्य को अपनी छवि में बनाकर उन्हीं पक्षियों की देखरेख सौंपते हैं। यीशु उस क्रम को उलटकर नहीं, बल्कि उसी पर खड़े होकर तर्क करते हैं: अगर तुम सृष्टि में उनसे ऊपर रखे गए हो, तो पालनेवाले के हृदय में भी तुम उनसे नीचे नहीं हो। दूसरा धागा और गहरा है। जंगल में इस्राएल को मन्ना मिला, हर दिन उतना ही जितना उस दिन चाहिए था, और जिन्होंने कल के लिए जमा किया उसमें कीड़े पड़ गए। वही कीड़ा इसी अध्याय में लौटता है, "जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं।" और वही लय प्रार्थना में भी है: "हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।" यीशु स्वयं इसी तरह जिए, बिना भंडार के, और अंत में अपना शरीर ही रोटी की तरह तोड़कर दे दिया।

दर्पण

चिंता शायद ही कभी खुद को चिंता कहती है। वह जिम्मेदारी कहलाती है, दूरदर्शिता कहलाती है, "बस थोड़ी सुरक्षा" कहलाती है। आप रात में बच्चों की फीस का हिसाब लगाते हैं, नौकरी की अफवाहों को तौलते हैं, मेडिकल रिपोर्ट के इंतज़ार में तीन दिन पहले ही मर चुके होते हैं। और यह सब करते हुए आप खुद को ज़िम्मेदार समझते हैं, यीशु आपको अल्पविश्वासी कहते हैं। यह कठोर लगता है, पर ध्यान दीजिए कि वे आपको कमाने से नहीं रोकते, केवल बोने, काटने और बटोरने को अपनी सुरक्षा की जड़ बनाने से रोकते हैं। असली प्रश्न यह नहीं कि आपके पास कितना है, बल्कि यह कि किसका वचन आपकी नींद तय करता है। आज, काम शुरू करने से पहले, बाहर या खिड़की पर खड़े होकर एक पक्षी को तब तक देखिए जब तक वह उड़ न जाए, और धीरे से ज़ोर से कहिए: "मेरा स्वर्गीय पिता इसे खिलाता है, और मैं इससे अधिक मूल्य रखता हूँ।"

श्रोताओं का चेहरा

जो लोग पहाड़ पर बैठे थे, उनके लिए यह उपदेश किसी आध्यात्मिक विलासिता का विषय नहीं था। गलील के अधिकांश लोग छोटे किसान, बटाईदार और दिहाड़ी मज़दूर थे, जिनके ऊपर रोम का कर, मंदिर का कर और ज़मींदार का हिस्सा एक साथ बैठा था। एक खराब फसल का मतलब कर्ज़ था, और कर्ज़ का मतलब ज़मीन खोना। उनके लिए "क्या खाएँगे" कोई अलंकार नहीं, कल की सचाई थी। और पक्षी? वे बाज़ार में सबसे सस्ती चीज़ थे, खेतों के चोर, गरीबों का मांस। यीशु सबसे सस्ती चीज़ उठाकर उनके सामने रखते हैं और कहते हैं: परमेश्वर उसे भी नहीं भूलते। एक ऐसे समाज में जहाँ आपकी कीमत आपकी ज़मीन और वंश से तय होती थी, यह वाक्य किसी के भी चेहरे को ऊपर उठा देता था।

कठिन प्रश्न

पर पक्षी भूखे भी मरते हैं। सूखे में घोंसले खाली हो जाते हैं, और इतिहास में विश्वासी लोग अकाल में मरे हैं, आज भी मरते हैं। तो क्या यीशु यहाँ कुछ ऐसा कह रहे हैं जो अनुभव झुठला देता है? मैं इसे चिकना नहीं करना चाहता। यीशु भूख से सुरक्षा का बीमा नहीं दे रहे; वे उसी उपदेश में सिखाते हैं कि रोटी माँगनी पड़ती है, एक दिन की, और यही माँगना बताता है कि वह स्वतः नहीं मिलती। उन्होंने कहीं और कहा कि एक गौरैया भी पिता के बिना ज़मीन पर नहीं गिरती, गिरती तो है, पर उनकी जानकारी के बाहर नहीं। और जिसने यह कहा, उसने स्वयं क्रूस पर प्यासे होकर प्राण दिए। जो वादा यहाँ है वह अछूतापन नहीं, उपस्थिति है: आप कभी भी ऐसे पिता के हाथ से बाहर नहीं हैं जो आपको अनमोल मानता है।

पृष्ठभूमि

यह पहाड़ी उपदेश का अंतिम बड़ा खंड है, खुले आसमान के नीचे, संभवतः वसंत में, जब गलील की पहाड़ियाँ फूलों से ढकी होती हैं और इसीलिए अगला उदाहरण सोसन के फूलों का है। पद 26 अपने आप खड़ा नहीं है; उसके ठीक पहले वह तीखा वाक्य है, "तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते," और फिर "इसलिए मैं तुम से कहता हूँ।" यानी चिंता पैसे की गुलामी का भीतरी चेहरा है। सुननेवाले मुख्यतः यीशु के शिष्य हैं, जिनमें कुछ ने अभी-अभी नाव और जाल छोड़े थे, और उनके पीछे भीड़। जिन लोगों ने अपनी आमदनी का ज़रिया छोड़ दिया हो, उनके लिए आकाश के पक्षी केवल दृष्टांत नहीं थे, वे अपने ही भविष्य की तस्वीर देख रहे थे।

चिंतन

आपकी चिंता का सबसे बार-बार लौटने वाला विषय क्या है, और वह आपके बारे में क्या मानकर चलती है जो पद 26 सीधे नकारता है?

"बोना, काटना, बटोरना" में से कौन सा आपके जीवन में इतना बड़ा हो गया है कि वह परमेश्वर की जगह ले बैठा है, और इस हफ्ते आप उसमें कौन सी एक सीमा खींच सकते हैं?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 6:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 6:26 का क्या अर्थ है?
यीशु अपने सुननेवालों को एक काम सौंपते हैं जो बहुत सरल लगता है और वास्तव में बहुत कठिन है: ऊपर देखो। "आकाश के पक्षियों को देखो!
मत्ती 6:26 किस विषय में है?
पक्षी बाइबल की पहली कहानी से ही वहाँ हैं। उत्पत्ति में परमेश्वर उन्हें आकाश में भरते हैं और फिर मनुष्य को अपनी छवि में बनाकर उन्हीं पक्षियों की देखरेख सौंपते हैं। यीशु उस क्रम को उलटकर नहीं, बल्कि उसी पर खड़े होकर तर्क करते हैं: अगर तुम सृष्टि में उनसे ऊपर रखे गए हो, तो पालनेवाले के हृदय में भी तुम उनसे नीचे नहीं हो। दूसरा धागा और गहरा है। जंगल में इस्राएल को मन्ना मिला, हर दिन उतना ही जितना उस दिन चाहिए था, और जिन्होंने कल के लिए जमा किया उसमें कीड़े पड़ गए। वही कीड़ा इसी अध्याय में लौटता है, "जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं।" और वही लय प्रार्थना में भी है: "हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।" यीशु स्वयं इसी तरह जिए, बिना भंडार के, और अंत में अपना शरीर ही रोटी की तरह तोड़कर दे दिया।
मत्ती 6:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
जो लोग पहाड़ पर बैठे थे, उनके लिए यह उपदेश किसी आध्यात्मिक विलासिता का विषय नहीं था। गलील के अधिकांश लोग छोटे किसान, बटाईदार और दिहाड़ी मज़दूर थे, जिनके ऊपर रोम का कर, मंदिर का कर और ज़मींदार का हिस्सा एक साथ बैठा था। एक खराब फसल का मतलब कर्ज़ था, और कर्ज़ का मतलब ज़मीन खोना। उनके लिए "क्या खाएँगे" कोई अलंकार नहीं, कल की सचाई थी। और पक्षी?
मत्ती 6:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यह पहाड़ी उपदेश का अंतिम बड़ा खंड है, खुले आसमान के नीचे, संभवतः वसंत में, जब गलील की पहाड़ियाँ फूलों से ढकी होती हैं और इसीलिए अगला उदाहरण सोसन के फूलों का है। पद 26 अपने आप खड़ा नहीं है; उसके ठीक पहले वह तीखा वाक्य है, "तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते," और फिर "इसलिए मैं तुम से कहता हूँ।" यानी चिंता पैसे की गुलामी का भीतरी चेहरा है। सुननेवाले मुख्यतः यीशु के शिष्य हैं, जिनमें कुछ ने अभी-अभी नाव और जाल छोड़े थे, और उनके पीछे भीड़। जिन लोगों ने अपनी आमदनी का ज़रिया छोड़ दिया हो, उनके लिए आकाश के पक्षी केवल दृष्टांत नहीं थे, वे अपने ही भविष्य की तस्वीर देख रहे थे।
मत्ती 6:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
"बोना, काटना, बटोरना" में से कौन सा आपके जीवन में इतना बड़ा हो गया है कि वह परमेश्वर की जगह ले बैठा है, और इस हफ्ते आप उसमें कौन सी एक सीमा खींच सकते हैं?
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Matthew 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

शरीर का दीपक आँख है: इसलिए यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा।" यीशु ने यह बात धन की चर्चा के बीच में कही। आँख का निर्मल होना यानी लालच से मुक्त, उदार दृष्टि। जिस चीज़ को तू देर तक देखता है, वही तेरे भीतर उतरती है। आज तेरी आँखें किस पर टिकी हैं?

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